From mansion to office - 6 - 7 in Hindi Motivational Stories by prachi Gurjar books and stories PDF | हवेली से दफ्तर तक - 6 - 7

Featured Books
Categories
Share

हवेली से दफ्तर तक - 6 - 7

                  अध्याय 6: बुख़ार

अक्टूबर की शुरुआत थी जब आरव को पहली बार बुख़ार आया। छोटा सा, सिर्फ़ एक या दो दन का, या कम से कम वो ऐसा सोचता था।

“बस थकान है,” उसने कहा, जब गौरी ने चिंता जताई। “परीक्षा से पहले ऐसा होता है।”

पर बुख़ार नहीं गया। तीन दिन बाद भी वह 39 डिग्री पर था, और आरव की साँस तेज़ हो गई थी। गौरी ने पहली बार असली डर महसूस किया।

“अरे, ये तो ठीक नहीं है,” आरव की माँ ने कहा, उसके माथे पर हाथ रख कर। “हम डक्टर के पास चलें।”

सरकारी अस्पताल, भीड़ भरी गलियाँ, एक पुरानी इमारत जहाँ हज़ारों लोग आते हैं हर रोज़। डॉक्टर ने तेज़ी से परीक्षा की, कुछ सवाल पूछे।

“कुछ टेस्ट करवाने पड़ेंगे। खाँसी कितने दिन की है?”

“तीन चार हफ़,” आरव ने कहा, शायद यह भूल कर कि उसने पहले गौरी और अपनी माँ को नहीं बताया था।

गौरी की दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

टेस्ट के नतीजे दो दिन बाद आए। डॉक्टर का चहरा गंभीर था जब उसने कहा, “टबी है। आख़िरी स्टज पर। इलाज शुरू करना पड़ेगा तरंत।”

कमरा घूमने लगा गौरी के सामने। आरव की माँ बेहोश सी बैठ गई। आरव खुद जसे किसी और दुनिया में चला गया था।

“इलाज कितना महँगा होगा?” गौरी ने पूछा, आवाज़ काँपती हुई।

“कम से कम छह महीने का डिनिटी इलाज… दवाएँ, हर महीने चेकअप…” डॉक्टर कुछ नहीं कहना चाहता था, पर उसके चेहरे पर सब कुछ लिखा था।

रास भर गौरी ने हिसाब लगाया। उसकी सारी ट्यूशन की तनख़्वाह, आरव की माँ की मेहनत की कमाई, सब मिला कर भी महीने का खर्चा मश्किल से निकलता था। दवाइयों का खर्च? असंभव।

उस रात कई सो नहीं पाया। आरव की माँ रात भर रोती रहीं, अपने आप को कोसती रहीं, “मुझ से गलती हुई, बेटा को सही खाना नहीं खला सकी।”

गौरी ने उनके पैर छुए। “अंट, ये आपकी गलती नहीं है। आप जितना दे सकती हो, द रही हो। ये समाज की गलती है, जहाँ गरीबों के पास इलाज के लिए पैसे नहीं होते।”

पर बातें काम नहीं आती। पैसे चाहिए थे।

गौरी ने अपनी कन के झुमके बेच दिए। छोटे सोने के झुमके, जो माँ ने उसे जन्म के दिन पहना दिए थे। सुनार को दिखाया, “कितना दाम देंगे?”

सुनार ने तला। “पाँच हज़ार।”

गौरी के हाथ कँप रहे थे, पर उसने झुमके दे दिए। पाँच हज़ार, एक महीने की दवाइयों का एक हिस्सा।

फिर उसके पास और क्या था? उसके पास कुछ नहीं था अब। कोई गहना, कोई संपत्ति, कोई रिश्ता जो उसे पैसे द सके। सिर्फ़ ज़िंदगी थी, और उसे बचने के लिए तैयारी।

उसने और घर ढूँढ लिए, और भी ज़्यादा घंटों के लिए पढ़ाना शुरू किया। सुबह घर के काम, दिन भर टशन, रात को घर पर बैठ कर सिलई का काम सीख लिया, कुछ अतिरिक्त आय के लिए।

आरव जब रात को उसे बैठे देखता, सुई के साथ, तो कहता, “गरी, रुक जाओ न। तुम्हारे हाथों में छाले पड़ रहे हैं।”

और गौरी जवब देती, “तुम्हारी दवाइयों के लिए। इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कछ नहीं है।”

आरव को इस बात का अहसास था कि गौरी उसके लिए क्या कर रही है। एक रात, जब दर्द ज़्यादा था और नींद नहीं आ रही थी, उसने कहा, “गौरी, तुम यहाँ क्यों हो? तम्हारी अपनी परीक्षा है। तुम्हें पढ़ना चाहिए।”

“मैं पढ़ रही हूँ।”

“यूँ नहीं, गौरी। हर रात। सिर्फ़ मेरे इलाज के लिए। पैसे कमाने के लिए। तुम्हारा सपना भूल गई क्या?”

गौरी ने उसके हाथ को अपने हाथों में लिया। “मेरा सपना तुम हो, आरव। नहीं, ऐसा नहीं… मेरा सपना इंसाफ़ देना है। पर अगर जो इंसान मेरे पास है वो ही नहीं बचगा, तो किसे इंसाफ़ दूँग?”

आरव की आँखें भर आईं। “मैं यह नहीं सहना चहता, गौरी। मैं नहीं चाहता कि तुम मेरी ख़तिर अपने सपने को भूलो।”

“म नहीं भूल रही। सिर्फ़ मूलतबी कर रही हूँ। बीच में ही छोड़ दूँगी, और फिर से शुरू करूँगी। पर पहले तुम्हें ठीक होना ज़रूरी है।”

महीने बीतते गए, और आरव का दर्द बढ़ता गया। दवाइयाँ काम कर रही थीं, लेकिन धीरे। बहुत धीरे। डॉक्टर को हर बार जब गौरी से दवाइयों का खर्चा पूछा जाता, वह चुप रह जाती, सिर्फ़ नीचे देख लेती।

आरव की माँ एक दिन गौरी को रसई में रो रही पाया। “बेटा, क हुआ?”

“अंटी, मैं परीक्षा के लिए तैयार नहीं हूँ। महने भर पहले परीक्षा है, और मैंने कुछ भी नहीं पढ़ा। हर दिन सिर्फ़ काम, काम, और काम।”

माँ ने उसे गले से लगा लिया। “तू रोना मत, बेटा। अगर भगवान की मर्ज़ी हुई, तो सब ठीक हो जाएगा। और अगर नहीं हुई… तो भी त जीत जाएगी। क्योंकि तने जो काम किया, जो सहा है, वो किस परीक्षा से कहीं बड़ा है।”

गौरी को मा की बातें सांत्वना न देकर, और डर दलाने लगी। क्या अगर आरव ठीक नहीं हुआ? क्या अगर…

रात को डयरी में लिखा, “डर लगता है। बहुत डर लगता है। आरव के लिए, परीक्षा के लिए, अपने लए। पर अगर मैं टूट गई, तो आरव को कौन संभालेगा? मुझे मज़बूत रहना है। चाहे भीतर कितना भी टूटा हूँ।”

दिन बीतते रहे, आरव का इलाज जारी रहा, गौरी का काम जारी रहा। और परीक्षा की तारीख़ नज़दीक आती रही।

अध्याय 7: अंतिम स्वास....

दसंबर की रात थी। ठंड इतनी सख़्त कि हवा जमने लगती थी। आरव को बुख़ार फिर से चढ़ आया था, इस बार ऊँचा, बहुत ऊँचा। 40 डिग्री से ऊपर।

अस्पताल ले जाया गया, सायरन बजती गाड़ी में। गौरी उसके हाथ को पकड़े हुए, सारा रास्ता कुछ नहीं बोली। बस आरव की ठंडी हाथ को अपनी गर्म से भरने की कोशिश कर रही थी।

“गौरी,” आरव की बुख़ार में बड़बड़ाहट, “अगर… अगर मैं…”

“नहीं। ऐसा मत कहना। तुम ठीक हो जाओगे।”

“पर अगर नहीं हुआ? तो तुम्हें अपने लिए जीना है। हाँ?”

गौरी की आँखें भर आई। “तुम ठीक हो जाओगे।”

पर डॉक्टर के मुँह को देख कर उसे पता चल गया कि बात ग़लत है।

“उसे TB का दवा लेट दिया था, और पोषण की कमी… शरीर कमज़ोर हो गया,” डॉक्टर को डर था कि गौरी को ये बात बताए। “अब… अब कोई उम्मीद नहीं है।”

आरव की माँ बेहोश सी बैठ गईं, दीवार के सहारे, जैसे सब जान कर निकल गई हो। गौरी एक पत्थर की मूर्ति बन गई, अदर से सब कुछ टूट रहा था, पर बाहर से एक भी हरकत नहीं।

उस रात गौरी 13 दिन के लिए अस्पताल में रह। 13 दिन आरव के बिस्तर के पास, उसके हाथ को पकड़े, उसके कान में पढ़ाई, जो वह कर रहा था।

तीसरे दिन आरव ने पूछा, “संविधान का अनुच्छेद 14 क्या है?”

“समानता का अधकार,” गौरी ने कहा, आवाज़ में कोई लहर नहीं। “सब नागरिकों को कानून के सामने समान माना जाएगा।”

आरव मुस्कुराया, हल्का सा। “तुम्हारी आवाज़ में जादू है, जानती हो? जब तुम पढ़ाती हो, तो दर्द थोड़ा कम हो जाता है।”

गौरी ने और भी जोर से पढ़ना शुरू किया, रात भर, घंटों, जब तक आरव की आँखें बंद न हो जाएँ। जब आखें बंद हो जाएँ, तो गौरी सिर्फ़ देखती रहती, जसे अगर वह देखती रहे तो आरव ठीक हो जाएगा।

“क्या तुम सोच रही हो?” आरव ने एक बार पूछा, आधी नींद में।

“हा,” गौरी ने कहा।

“क्या सोच रही हो?”

“कि तम्हारी कुर्सी कभी खाली न रहे।”

आरव ने गौरी का हाथ अपने सीने पर रख दिया, अपने दिल पर। “तुम मेरी कुर्सी सँभाल लेना। ठीक है?”

गौरी ने हाँ में सर हिलाया, पर आवाज़ नहीं निकली।

बारहव दिन डॉक्टर ने कहा, “उसे शायद आज रात ही…” पर गौरी ने सुना नहीं। वह आरव के कमरे में चली गई।

आरव की सासें धीमी हो गई थीं, पर चेहरे पर एक शांति थी, जैसे वह सब समझ गया हो। गौरी उसके सिरहाने बैठ गई, उसके माथे पर हाथ रख कर।

“मैंने परक्षा की तैयारी पूरी कर ली,” गौरी बोली, जनती थी कि आरव सुन नहीं पा रहा, पर बोलना ज़रूरी था। “तुम्हारी वजह से मैंने परीक्षा के सवालों के जवाब जानते हुए अपने अंदर देखना सीखा। तुम्हारी वजह से मैंने समझा कि कानून सिर्फ़ किताबों में नहीं, लोगों के दिलों में होता है।”

आरव की आँख धीरे से खुली, और गौरी की तरफ़ देखा, जैसे आख़िरी बार।

“तुम्हें याद है, हमने कहा था?” गौरी की आवाज़ काप रही थी। “कि अगर मैं अफसर बनी, तो तेरा घर पक करवाऊँगी? और तुम कहे थे, कि अगर तुम अफ़सर बने तो मेरी हवेली के सामने साइकिल स्टैंड खोलोगे?”

आरव की लिप्स पर एक हल सी मुस्कान थी।

“मैं अफ़सर बन जऊँगी, आरव। तुम्हारा वादा परा करूँगी। तुम्हारे सपनों का कुछ हिस्सा मेरे ज़रिए पूरा होगा।” गौरी की आवाज़ अब सिर्फ़ एक फसफुसाहट रह गई थी। “तुम जाना मत। पर… पर अगर जाना है, तो जना। मैं यहाँ हूँ।”

आरव ने गौरी की उँगली पकड़ी, कमज़ोर हथ, और फिर जाने दी।

सासें रुक गई। धीरे धीरे, आख़िरी सास भी बाहर निकल गई।

गौरी सिर्फ़ बैठी रही, आरव का हाथ अपने हाथ में लिए, 13 घंटे तक कोई कुछ भी नहीं कह सका उससे।

उस रत जब घर वापस आई, तो गौरी के पास कुछ नहीं बचा। न आरव, न घर, न कोई रिश्तदार। सिर्फ़ एक डायरी, जिसमें आरव की लिखावट भी थी, और एक वाद।

घर की दीवार पर उसने एक लाइन लिखी, आरव के लिए, अपने आप के लिए:

“अब हार गई तो व जीतेगा नहीं।”

पर हार गई वह। पूरी रात रई, जब तक आँसू भ निकल गए। आरव की माँ के साथ रोई, दोनों अकेली, दोनों टूटी हई।

अगले दिन गौरी को याद आया, परीक्षा तीन हफ़्ते में है। ज़िदगी थम नहीं जाती किसी की मत पर। दुनिया अपने पर चलती रहती है।

वह किताबें खोली। पहली बार उसे आरव की खुशबू आई किताबों से, क्योंकि आरव इन किताबों को छता था। गौरी रो पड़ी।

पर फिर भी पढ़ती रही।

क्योंकि अब वह अकेली नहीं थी। आरव हर शब्द के साथ, हर सवाल के साथ, उसके साथ था।