अध्याय 8: इम्तहान
जनवरी आया, और गौरी के साथ परक्षा का वो समय भी आया जो वह हमेशा से चाहती थी, पर अब उसका सद बदल गया था। हर सपना अब आरव की याद में डूबा हुआ था।
परीक्षा हल में बैठते समय, गौरी ने डायरी निकाली जो वह अपने साथ लाई थी, और आरव के एक नट को देखा जो उसने आख़िरी दिनों में लिखा था:
“गौरी, तुम ये परीक्षा पास करोगी। तुम्हरे पास जो ताक़त है, वो किसी में नहीं है। न सिर्फ़ किताबों की, बल्कि ज़िंदगी की। जाओ, और जीतो। मेरी तरफ़ से भी जीतो।”
परीक्षा शुरू हुई। पहला पेपर इतिहास। गौरी की कलम तेज़ी से चली, जैसे कोई और लख रहा हो। हर सवाल पर आरव का चेहरा दिखता था, उसकी मुस्कान, उसके सवाल, “तुम यह सब क्यों सीखती हो?”
“क्योंकि ये सिर्फ़ इतिहास नहीं है, आरव। ये हर उस इंसान की कहानी है जिसे कोई सुनना नहीं चाहता।”
दूसरा पेपर राजनीति शास्त्र। गौरी ने संविधान के हर अनुच्छेद को जीवंत कर दिया अपने उदाहरणों से। भारतीय लोकतंत्र पर सवाल का जवाब देते समय, उसने लिखा:
“लोकतंत्र सिर्फ़ वोट देने का नाम नहीं है। ये हर इंसान को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार देना है। हर गरीब को, हर अनपढ़ को, हर उस लड़की को जिसके सपने को किसी ने कुचलना चाहा। असली लोकतंत् तब है जब कानून इन सब की रक्षा करता है।”
तीसरा पेपर अर्थशास्त्र। गौरी के हाथों में दर्द था, सिलाई के काम से, ट्यूशन पढ़ाने से, पर कलम चलती रही। गरीब, असमानता, सामाजिक न्याय, हर चीज़ को उसने अपनी और आरव की ज़िदगी से जोड़ा।
छह घंटे का पेपर, गरी ने छह घंटे बिना उठे लिखा।
बाक़ी परीक्षाएँ भ ऐसे ही हुई। कभी कभी हॉल में बठे हुए गौरी को रो आएगी, पर आँसू पोंछ लेती, और फिर से लिखती।
एक दिन परीक्षा के बीच में ही रक गई। हाथ में ऐंठन, आँखों में धुँधलापन। इन्विजिलेटर ने पछा, “ठीक हो?”
गौरी ने हाँ में सिर हिलाया, और फिर से लिखना शुरू किया।
परीक्षाएँ खत्म होने के बाद, गौरी को खालीपन का एहसास हुआ। कोई किताब नहीं, कोई लक नहीं सामने। सिर्फ़ इंतज़ार।
नतीजे का इंतज़ार।
तीन महने। तीन महीने जो साल जतना लंबा लगा। गौरी ने फिर से ट्यूशन शुरू किया, आरव की मा के साथ काम किया, पर दिमाग़ हमेशा उसी एक बात पर था। क्या वह पास हुई? कितना नंबर आएगा?
आरव की माँ हर दिन उससे पछती, “बेटा, क्या लगता है, निकल गई?”
गौरी कभ हाँ, कभी ना, कभी बस ख़ामोशी से जवाब देती।
एक दिन अखबार आया, और गौरी के नाम के साथ एक शीर्षक:
“सेठ की बेटी ने हवेली छोड़ कर रचा इतिहास — ज़िला में दूसरा स्थान”
गौरी को विश्वास ही नहीं हुआ। दूसरा स्थान। वह गौरी धरमचंद, जिसे घर से निकाल दिया गया था, जो सिलाई करती थी और ट्यूशन पढ़ाती थी, वह परीक्षा में दसरे स्थान पर थी।
अखबार के फोटो में उसका चेहरा था, और एक कैप्शन:
“गौरी धरमचंद, 22, सरकारी अफ़सर बनने की तैयारी कर रही हैं। अपने कथन में उन्होंने कहा, ‘ये जीत मेरी नहीं है। एक लड़के की है जो नहीं रह गया इसे देखने के लिए। मैं उसके सपनों को जीऊँ, ये मरा वचन है।’”
आरव की माँ को जब अखबार दखाया, तो वह रो पड़ी। पर इस बार खुशी के आँसू। “मेरे बेटे का सपना पूरा हो गया। तुम्हारे ज़रए।”
अध्याय 9: कुर्सी
साक्षात्कार जनवरी में था। गौरी को आखिर सप्ताह से ही कपड़े सिलवने शुरू कर दिए थे। पहली बार अपने लिए, खुद के पैसे से। एक साधारण सफ़ेद साड़ी, और एक सोने का पडेंट जो आरव की माँ ने उसे दिया था।
“ये रखो,” माँ ने कहा। “मेरा आरव ये पहनना चाहता था, जब वह अफ़सर बनता। अब तुम इसे पहन कर जाना। वो तुम्हारे साथ होगा।”
साक्षात्कार का दिन आया। सफद ईमारत, नीली पोशाक वले अफ़सर, और गौरी जो अंदर घुसी हर चीज़ को अपने ऊपर महसूस करते हुए।
सवाल पूछे गए, बहुत सारे। “तुम्हारी पृष्ठभूमि गरीब है, पर तुम एक समृद्ध परवार से हो। कैसे समझाती हो ये विरधाभास?”
गौरी ने सीधे देखा। “सर, पैसा और समृद्धि अलग चीज़ें हैं। मेरी हवेली के पास हरे हो सकते हैं, पर मेरे पास आज़ादी नहीं थी। अब मेरे पास खाने को कभ पर्याप्त नहीं है, पर मेरे पास अपनी पसंद की ताक़त है। मैंने समझा है कि गरीबी सर्फ़ पेट में भूख नहीं, ये दिल में आवाज़ न उठा पने का दर्द है। और मैंने दोनों को महसूस किया है।”
एक महिला अफ़सर मुस्कुरा दीं।
अगला सवाल, “तुम कहती हो कि तुम एक लड़के के सपनों को पूरा करने आई हो। अपने सपने के बारे में बताओ।”
गौरी की आँखों में पानी आ गया, पर वह रोई नहीं। “मेरा सपना है कि हर उस लड़की को आवाज़ दूँ जिसकी आवाज़ को कोई सुनना नहीं चाहता। हर उस औरत को इंसाफ़ दूँ जिसे घर में बंद कर दिया जाता है। और हर उस गरीब को कानून का फ़ायदा दूँ जिसे पता भी नहीं होता कि उसके पास क्या अधिकार हैं।”
साक्षात्कार खत्म हुआ।
नतीजा एक महीने बाद आया। गौरी को नहीं पता कि शामत को कैसे हराना है। पर जब सूची बिछी, और वह पहली दस में देखी, तो उसका दिल बस गया।
तीसरा रक। ज़िला में तसरा।
भर्ती का पत्र आ गया। पहली जनवरी को नई ज़िम्मेदारी।
पहला दिन। नई दिल्ली का कचहरी, बहुत बड़ी इमारत, हजरों पन्ने, हजारों फ़ाइलें। गौरी को कुर दी गई, छोटी सी, पर उसकी अपनी। डेस्क पर एक नेमप्लेट, “गौरी धरमचंद, तहसीलदार।”
आरव की बातें याद आईं। “अगर मैं अफ़सर बना, तो तेरी हवेली के सामने साइकिल स्टैंड खोलूँगा।”
पहले ही हफ़्ते में गरी ने अपने विभाग में एक नई नीति रखी। हर एक जो आए, चहे वह पढ़ा हुआ हो या अनपढ़, गौरी खुद उसकी फ़ाइल भरती, खुद उसकी समस सुनती।
अफ़सर चकित थ, पर गौरी को परवाह नहीं। उसे अपनी पोस्टिंग का इंतज़ार था।
तन महीने बाद, पोस्टिंग आ गई। अपने ही ज़िले में। अपनी ही जगह।
जिस दिन गौरी अपने पहले अफ़िस में पहुँची, तो वह जगह ये थी जहाँ पुस्तकालय के पास का एक छोटा सा तहसील था। उसी ज़िले में जहाँ उसने आरव से मिला था।
पहली चीज़ जो गौरी ने की, वह थी पुस्तकालय जाना।
पुरनी इमारत, वही सीढ़ियाँ, वही खिड़कियाँ। बेंच भी अभ थी, जहाँ गौरी और आरव बैठते थे।
गौरी वहाँ खड़ी रही, पूरे दिन के लिए एक पल को, और फिर एक निर्णय लिया।
अगले हफ़्ते, गौरी अपने पहले अफ़िस के आदेश जारी किए:
“हर तहसील में एक सामुदायिक पुस्तकालय स्थापित किया जाएगा। हर उस बच्चे को, जो पढ़ना चाहता है, किताबें मिलेंगी। मुफ़्त। कोई शुल्क नहीं। ककि शिक्षा गरीब और अमीर को अलग करने वली चीज़ नहीं, उन्हें जोड़ने वाली होनी चाहिए।”
और दूसरा आदेश:
“हर महिला जो घर के कानून के बारे में जानना चाहती है, हर लड़की जो अपना दहेज़ वापस चाहती है, हर अनपढ़ जो अपने अधिकारों को समझना चाहता है, उसके लिए मुफ़्त कानूनी सहायता। तहसील के दरवाज़े हर एक के लिए खुले होगे।”
पहला महीना खत्म होने पर, गौरी के अफ़िस के बाहर कतार लगनी शुरू हो गई। महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे, सब आ रहे थे। कुछ को न्याय चाहिए था, कुछ को सलाह, कुछ को बस किसी से बात करने वाला चाहिए था।
गौरी हर एक को सुनती, घंटों, बिना किसी जल्दबाज़ी के।