अनंत के उस पार पति की रहस्यमयी मृत्यु के बाद मीरा नीलगढ़ लौटती है, लेकिन वहाँ उसे बदलती तस्वीरें, रहस्यमयी डायरी और ऐसे संकेत मिलते हैं जो उसकी पूरी पहचान पर सवाल खड़े कर देते हैं। हर 47 वर्ष में होने वाली नील रात परतों के बीच की दुनिया को जोड़ती है और मीरा को पता चलता है कि आर्यन शायद मरा नहीं है। visual ke saath sunne ke liye youtube:- "kahanisafar" par jao also you can listen on pocket fm उसे उसे पाने के लिए एक ऐसी दुनिया में जाना होगा जहाँ समय, यादें और पहचान सब बदल जाते हैं। लेकिन उस
अनंत के उस पार - 1
वह आखिरी सुबहनीलगढ़ की सुबह कभी रोशनी के साथ नहीं आती थी। यहाँ सवेरा किसी पुराने कैनवास पर बिखरे और सफ़ेद रंगों के धुंधले घोल जैसा होता था, जो धीरे-धीरे पहाड़ियों की ढलानों पर फैलता था। समुद्र तल से बाईस सौ मीटर की ऊँचाई पर बसा यह छोटा सा कस्बा जब ओस और धुंध की चादर से बाहर निकलने की कोशिश करता, तब तक दोपहर के बारह बज चुके होते थे। देवदार और बलूत के ऊँचे, काले पेड़ इस धुंध में किसी खामोश पहरेदार की तरह खड़े रहते थे, मानो वे सदियों पुराना कोई ऐसा रहस्य छुपा रहे हों also you can listen on pocket fm ...Read More
अनंत के उस पार - 2
अध्याय 2 तीसरा दिनदाह-संस्कार के बाद का सन्नाटा मौत के सन्नाटे से भी ज़्यादा ज़हरीला होता है। मौत में फिर भी एक झटका होता है, एक चीख होती है, लेकिन अंतिम संस्कार के बाद जब श्मशान की राख ठंडी पड़ने लगती है, तब जो खालीपन घर की दीवारों में उतरता है, वह इंसान को अंदर से खोखला कर देता है।आज आर्यन की मृत्यु का तीसरा दिन था।नीलगढ़ के श्मशान घाट पर जब आर्यन की चिता जल रही थी, तब भी धुंध इतनी घनी थी कि दस कदम दूर खड़े लोग भी साये जैसे लग रहे थे। चिता की लपटें ...Read More
अनंत के उस पार - 3
पत्रसुबह की ठंडी हवा ओस की बूँदों को समेटे हुए हवेली के बरामदे में बह रही थी। मीरा चौखट पत्थर की तरह बनी खड़ी थी, और उसके काँपते हाथों में वह पीला लिफ़ाफ़ा था।लिफ़ाफ़े का कागज़ अजीब तरह से सूखा था जैसे इस पर नीलगढ़ की ओस, बारिश या नमी का कोई असर ही न पड़ा हो। ओस से भीगे हुए बरामदे के बीचों-बीच रखा यह लिफ़ाफ़ा ऐसा लग रहा था मानो समय के किसी दूसरे आयाम से सीधा इस चौखट पर आ गिरा हो।मीरा ने अपनी साँसें रोक लीं। उसकी उँगलियों ने लिफ़ाफ़े के ऊपरी हिस्से को छुआ। ...Read More
अनंत के उस पार - 4
डायरीकमरे में सन्नाटा इतना घना था कि हवा में तैरते धूल के कण भी जैसे थम गए थे।मीरा के में वह पुरानी, काले चमड़े की डायरी थी। डायरी के कवर पर उकेरे गए तीन संकेंद्री वृत्त (concentric circles) किसी प्राचीन तांत्रिक यन्त्र की तरह लग रहे थे, और उनके बीच में जड़ा वह छोटा सा नीला पत्थर मद्धम-मद्धम स्पंदित हो रहा था। उस पत्थर से निकलने वाली नीली रोशनी कमरे की पीली रोशनी में एक अजीब सा अमानवीय रंग घोल रही थी।उस पत्थर को छूते ही मीरा को अपनी हथेली पर एक ठंडी सिहरन महसूस हुई बिल्कुल वैसी ही ...Read More
अनंत के उस पार - 5
पहली रातशीशे पर लिखा वह भयानक शब्द "अगला" बारिश की बूँदों और धुंध के साथ घुलकर धीरे-धीरे नीचे बह था, जैसे काँच पर किसी अदृश्य आँख से नीले रंग के आँसू छलक रहे हों।मीरा का दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था मानो उसकी पसलियों को तोड़कर बाहर निकल आएगा। उसने आर्यन की वह चमड़े की डायरी अपने सीने से किसी ढाल की तरह चिपका ली और बदहवास होकर पीछे हटी। उसका पैर स्टडी टेबल की भारी नक्काशीदार टाँग से टकराया, और वह फ़र्श पर गिरते-गिरते बची। हाथों की कँपकँपी के कारण उसके हाथ से मोमबत्ती का स्टैंड छूटकर ...Read More
अनंत के उस पार - 6
कागज़ की उम्रसुबह की धुंधली रोशनी जब तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर फैली, तब मीरा वहीं बैठी हुई थी।उसके हाथों में कागज़ का वह छोटा सा, पीला टुकड़ा अब भी दबा हुआ था। रात की वह नीली रोशनी अब गायब हो चुकी थी, दरवाज़े के नीचे की दरार में अब सिर्फ़ सुबह का स्लेटी अँधेरा भरा हुआ था, और तीसरी मंज़िल की लकड़ी से किसी के चलने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।सब कुछ इतना शांत था मानो रात को जो कुछ हुआ, वह केवल मीरा के थके हुए दिमाग का एक भयावह सपना था।लेकिन मीरा के हाथ ...Read More
अनंत के उस पार - 7
नील झीलथाने की सीढ़ियाँ उतरते हुए मीरा के पैरों की आहट उस ठंडी, भीगी सुबह में गूँज रही थी।इंस्पेक्टर रावत के वे अंतिम शब्द "इस कस्बे में कुछ सवाल कभी नहीं पूछने चाहिए" हवा में किसी पुराने श्राप की तरह तैर रहे थे। पुलिस प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए थे। डॉ. सक्सेना की रिपोर्ट को मोहरा बनाकर आर्यन की मृत्यु पर 'दुर्घटना' की मुहर लगा दी गई थी। लेकिन ४० साल पुराने उस पीले कागज़ पर ताज़ी नीली स्याही से लिखे दो शब्दों "सो जाओ" ने मीरा को यह साफ़ बता दिया था कि नीलगढ़ का सच किसी ...Read More
अनंत के उस पार - 8
घर के पीछेबिट्टू की वह आख़िरी फुसफुसाहट "वो आदमी हर रात आपके घर के पीछे खड़ा रहता है" मीरा कानों में किसी भारी घंटी की तरह गूँज रही थी।नील झील से शर्मा हवेली की तरफ़ जाने वाला संकरा, पथरीला रास्ता चढ़ते हुए मीरा का हर कदम भारी हो रहा था। शाम के चार बज रहे थे, लेकिन नीलगढ़ के ऊपर कोहरे की चादर इतनी घनी हो चुकी थी मानो रात ने अपना पहला साया गिरा दिया हो। चीड़ के पेड़ों के बीच से बहती हवा में एक बर्फ़ीला दंश था जो कपड़ों को चीरकर हड्डियों तक उतर रहा था।पहाड़ी ...Read More