नील झील
थाने की सीढ़ियाँ उतरते हुए मीरा के पैरों की आहट उस ठंडी, भीगी सुबह में गूँज रही थी।
इंस्पेक्टर वीरेंद्र रावत के वे अंतिम शब्द "इस कस्बे में कुछ सवाल कभी नहीं पूछने चाहिए" हवा में किसी पुराने श्राप की तरह तैर रहे थे। पुलिस प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए थे। डॉ. सक्सेना की रिपोर्ट को मोहरा बनाकर आर्यन की मृत्यु पर 'दुर्घटना' की मुहर लगा दी गई थी। लेकिन ४० साल पुराने उस पीले कागज़ पर ताज़ी नीली स्याही से लिखे दो शब्दों "सो जाओ" ने मीरा को यह साफ़ बता दिया था कि नीलगढ़ का सच किसी पुलिस केस की फाइल में बंद होने वाला नहीं था।
सुबह के नौ बज रहे थे, लेकिन नीलगढ़ के ऊपर धुंध इतनी घनी छा गई थी मानो सूरज आज उगना ही भूल गया हो।
चीड़ के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से पानी की मोटी बूँदें टपक रही थीं। बाज़ार की दुकानें अब भी बंद थीं, और जो दो-चार स्थानीय लोग सड़कों पर दिख रहे थे, वे भी अपनी कश्मीरी फ़ेरन और मोटे शॉलों में मुँह छिपाकर तेज़ी से निकल रहे थे। मीरा जब उनके पास से गुज़रती, तो लोग अपनी नज़रें नीची कर लेते। इस कस्बे की खामोशी में एक अजीब सी साज़िश थी एक ऐसी चुप्पी जिसे पूरा नीलगढ़ मिलकर निभा रहा था।
मीरा के कदम अपने आप हवेली की तरफ़ न मुड़कर, उस रास्ते पर बढ़ने लगे जो पहाड़ी ढलान से होता हुआ सीधे नील झील की तरफ़ जाता था।( Yt:- kahanisafar)
यह वही रास्ता था जिस पर तीन दिन पहले आर्यन का निष्प्राण शरीर खींचकर लाया गया था।
नील झील नीलगढ़ के ठीक बीचों-बीच, चारों तरफ़ से ढकी हुई एक प्राकृतिक कटोरी जैसी घाटी में स्थित थी। समुद्र तल से बाईस सौ मीटर की ऊँचाई पर बसी यह झील दूर से देखने पर किसी विशालकाय नीलमणि (Sapphire) जैसी लगती थी।
लेकिन जब मीरा ढलान उतरकर झील के मुहाने पर पहुँची, तो हवा की तासीर एक झटके में बदल गई।
यहाँ का माहौल नीलगढ़ के बाज़ार से भी ज़्यादा ठंडा और नीरव था। झील के चारों तरफ़ बलूत और चीड़ के इतने घने पेड़ खड़े थे कि उनकी शाखें पानी के ऊपर छतरी की तरह झुकी हुई थीं। यहाँ हवा में देवदार की महक के साथ ओज़ोन, गीली पुरानी चट्टानों और ठहराव की एक अजीब सी गंध घुली हुई थी।
और सबसे भयावह बात थी इस झील का पानी।
नील झील का पानी अस्वाभाविक रूप से नीला था। यह किसी साफ़ नदी या आसमान की परछाई वाला नीला रंग नहीं था। यह एक ऐसा गहरा, गाढ़ा इंडिगो नीला रंग था जो रोशनी को अपने अंदर सोख लेता था, लेकिन उसे वापस परावर्तित (reflect) नहीं करता था। मौसम चाहे कितना भी स्लेटी हो, बारिश हो या धूप खिले, इस झील का रंग कभी नहीं बदलता था।
मीरा धीरे-धीरे पानी के किनारे बिछे गोल, सफ़ेद पत्थरों पर चलने लगी।
पहाड़ों पर हवा चल रही थी। पेड़ों की चोटियाँ हवा के दबाव से झूम रही थीं, लेकिन झील का पानी... बिल्कुल निश्चल था।
पानी की सतह पर एक भी लहर नहीं उठ रही थी। कोई बुलबुला नहीं था, कोई हलचल नहीं थी। पानी की सतह शीशे के किसी विशाल, नीले टुकड़े की तरह बिछी हुई थी। यहाँ तक कि झील के किनारे न तो कोई बतख दिख रही थी, न पानी के कीड़े, और न ही कोई मछली सतह पर आ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो पानी के अंदर का जीवन समय के किसी प्राचीन बिंदु पर जाकर जम गया हो।
मीरा उस पुराने, टूटे हुए लकड़ी के घाट के पास आकर रुक गई जहाँ तीन दिन पहले आर्यन का शव पड़ा था।
लकड़ी के सड़े हुए खंभे पानी से बाहर निकले हुए थे, और उन पर नीले रंग की काई जमी हुई थी। मीरा वहीं किनारे पर घुटनों के बल बैठ गई। ठंडे पत्थरों की चुभन उसके घुटनों में महसूस हो रही थी, लेकिन उसकी नज़रें सीधे उस नीले पानी पर टिकी थीं।
आर्यन ने अपनी डायरी में लिखा था: "१८५९ में सर्वेयर मैकिन्टायर ने जब झील के पानी में झाँका, तो उसे अपनी परछाई नहीं दिखी... उसे पानी के नीचे एक उल्टा कस्बा दिखा।"
मीरा ने अपनी साँसों को सँभाला। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने अपने शरीर को थोड़ा आगे झुकाया और झील के बिल्कुल शांत, नीले पानी में नीचे झाँका।
शुरुआत में उसे पानी में सिर्फ़ अपना चेहरा दिखाई दिया।
उसका पीला पड़ा चेहरा, आँखों के नीचे जमा गहरे काले घेरे, बिखरे हुए बाल और आर्यन की वह भूरी कोरडरॉय जैकेट। पानी इतना साफ़ था कि उसकी अपनी परछाई शीशे की तरह साफ़ झलक रही थी।
लेकिन जैसे-जैसे मीरा पानी में गहराई तक ताकने लगी... पानी के अंदर का नीला रंग बदलने लगा।
वह अस्वाभाविक नीलापन धीरे-धीरे स्पंदित होने लगा बिल्कुल वैसे ही जैसे आर्यन की डायरी का पत्थर चमकता था।
मीरा की आँखें फटी की फटी रह गईं। पानी की सतह पर कोई लहर नहीं उठी थी, हवा का कोई झोंका नहीं आया था, लेकिन पानी में बनी उसकी परछाई धीरे-धीरे विकृत (distort) होने लगी।
उसकी अपनी सूरत धुंधली पड़ने लगी, और उसकी जगह पानी के अंदर से एक और चेहरा उभरने लगा!
वह चेहरा मीरा का नहीं था।
वह एक स्त्री का चेहरा था। उसकी त्वचा बर्फ़ की तरह सफ़ेद थी, बाल गीले होकर उसके माथे और गालों से चिपके हुए थे, और उसकी आँखें... उसकी आँखें पूरी तरह से खाली, रोशनी-हीन थीं। उस चेहरे पर एक ऐसा असीम, सदियों पुराना दुख अंकित था जो इंसानी सहनशक्ति से परे था।
वह स्त्री पानी के नीचे, उस नीली गहराई में खड़ी होकर सीधे ऊपर, मीरा की आँखों में झाँक रही थी!
मीरा की चीख गले में ही घुट कर रह गई। उसका पूरा शरीर बर्फ़ की तरह जम गया। वह अपनी नज़रें उस चेहरे से हटा नहीं पा रही थी।
और फिर... पानी के अंदर से उस स्त्री ने अपना बर्फ़ीला हाथ उठाया।
उसकी सफ़ेद उँगलियाँ पानी की सतह की तरफ़ बढ़ने लगीं, सीधे मीरा के चेहरे को छूने के लिए! पानी की निश्चल सतह पर पहली बार एक बारीक सी सलवट उभरी।
"नहीं!"
मीरा बदहवास होकर पीछे की तरफ़ गिरी। उसके हाथ-पैर पत्थरों पर छिड़ गए। वह हाँफती हुई पीछे खिसकने लगी।
जब उसने दोबारा झील की तरफ़ देखा, तो पानी फिर से बिल्कुल शांत था। वही गहरा नीला रंग, वही शीशे जैसी निश्चल सतह। वहाँ न तो वह चेहरा था, न वह हाथ। सिर्फ़ नीलगढ़ की धुंधली रंगत पानी पर तैर रही थी।
मीरा अपने सीने पर हाथ रखे पत्थरों पर बैठी हाँफ रही थी। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। क्या वह सच में पागल हो रही थी? क्या काव्या और इंस्पेक्टर रावत सही कह रहे थे कि अवसाद और सदमे की वजह से उसका दिमाग़ भ्रम पैदा कर रहा था?
तभी... उसके पीछे से एक बहुत ही मासूम, धीमी आवाज़ आई।
"आंटी?"
मीरा चौंककर पलटी।
पत्थरों के रास्ते पर एक १२-१३ साल का लड़का खड़ा था। उसने एक ढीला-ढाला, फूला हुआ उनी स्वेटर और फटे हुए रबर के जूते पहन रखे थे। उसके हाथ में लकड़ी की एक छोटी सी गुलेल थी, और उसकी गालें ठंड के मारे लाल हो रही थीं।
यह बिट्टू था नीलगढ़ के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाला एक स्थानीय लड़का, जो अक्सर अपनी गायों को चराने के लिए हवेली के पीछे वाले जंगल में आता था।
मीरा ने अपनी बिखरी हुई साँसों को सँभाला और अपने कपड़े झाड़े। "बिट्टू? तुम... तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
बिट्टू ने अपनी गुलेल को जेब में डाला और कुछ कदम आगे बढ़ा। उसकी निष्पाप आँखों में मीरा के प्रति एक अजीब सा कौतुक और चिंता थी। उसने झील के शांत, नीले पानी की तरफ़ देखा और फिर मीरा से बोला:
"आंटी, अम्मा कहती है कि इस झील के पास अकेले नहीं बैठना चाहिए। ख़ासकर जब कोहरा छाया हो।"
मीरा ने उठकर अपने घुटनों से मिट्टी झाड़ी। "तुम्हारी अम्मा ऐसा क्यों कहती है, बिट्टू?"
"क्योंकि यह झील अच्छी नहीं है," बिट्टू ने बहुत सहजता से कहा, जैसे वह किसी आम बात का ज़िक्र कर रहा हो। "कस्बे के बड़े कहते हैं कि इसके नीचे दूसरा नीलगढ़ रहता है। अगर आप इसमें ज़्यादा देर तक देखोगे, तो नीचे वाले लोग आपको पहचान लेंगे और फिर आपको बुलाने लगेंगे।"
मीरा का दिल एक बार फिर तेज़ी से धड़कने लगा। एक १२ साल का बच्चा बिल्कुल वही बातें कह रहा था जो आर्यन ने अपनी वैज्ञानिक डायरी में लिखी थीं!
"बिट्टू..." मीरा ने उसके पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा। उसकी आवाज़ में कँपकँपी थी। "क्या तुमने कभी इस झील में किसी को देखा है? क्या आर्यन अंकल यहाँ आते थे?"
बिट्टू ने अपनी नाक पोछी और सिर हिलाया।
"आर्यन अंकल तो रोज़ आते थे," बिट्टू ने अपनी मासूम आवाज़ में कहा। "वे अपनी लाल रंग की कॉपी में कुछ लिखते रहते थे और घंटों पानी में ताकते थे। कभी-कभी तो वे पानी से बातें भी करते थे।"
मीरा की आँखें छलक आईं। वह घुटनों के बल बिट्टू के सामने बैठ गई ताकि उसकी आँखों के स्तर पर आ सके। "और... और क्या तुमने किसी और को भी यहाँ देखा है, बिट्टू? आर्यन अंकल की मौत वाले दिन... क्या यहाँ कोई और था?"
बिट्टू ने अपनी गुलेल निकाली और उसे अपनी उँगलियों में घुमाने लगा। उसने एक बार चारों तरफ़ देखा, जैसे वह यह पक्का कर रहा हो कि जंगल में कोई उनकी बातें तो नहीं सुन रहा। फिर वह मीरा के और करीब आया और फुसफुसाकर बोला:
"आंटी, वो आदमी यहाँ आता है। रात को। जब पूरा कस्बा सो जाता है।"
मीरा की साँस थम गई। "कौन आदमी, बिट्टू? कैसा दिखता है वह?"
"बिल्कुल आर्यन अंकल जैसा," बिट्टू ने बिना झिझके जवाब दिया। "वही लंबे बाल, वही चश्मा, वही जैकेट... लेकिन वे आर्यन अंकल नहीं हैं।"
"क्या?" मीरा का सिर चकराने लगा। "तुम यह क्या कह रहे हो बिट्टू? अगर वे आर्यन अंकल जैसे दिखते हैं, तो वे आर्यन अंकल क्यों नहीं हैं?"
"क्योंकि वे बोलते नहीं हैं," बिट्टू की आँखों में अचानक एक सच्चा डर तैर गया। "वे बस पानी के किनारे खड़े रहते हैं और नीले पानी में नीचे झाँकते हैं। एक बार मैंने उन्हें देखा था... उनकी कोई परछाई नहीं बन रही थी, आंटी! और वे रो रहे थे। उनकी आँखों से पानी गिर रहा था, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।"
मीरा की रीढ़ की हड्डी में बर्फ़ जैसी ठंडी सिहरन दौड़ गई। आर्यन जैसा दिखने वाला एक इंसान... जो रात को झील के किनारे आता था... जिसकी कोई परछाई नहीं थी!
"वह... वह आदमी अब कहाँ है, बिट्टू?" मीरा ने बिट्टू के बाज़ुओं को थामते हुए पूछा। उसकी आवाज़ बेकाबू हो रही थी। "तुमने उसे आख़िरी बार कब देखा?"
बिट्टू ने अपने छोटे हाथ से दूर, पहाड़ी पर बनी शर्मा हवेली की तरफ़ इशारा किया।
हवेली की काली, विशाल इमारत कोहरे के बीच किसी दैत्य की तरह खड़ी दिख रही थी।
बिट्टू ने अपनी गोल आँखों से सीधे मीरा की आँखों में देखा और बहुत ही धीमी, खौफ़नाक फुसफुसाहट में बोला:
"आंटी, वो आदमी... वो हर रात आपके घर के पीछे खड़ा रहता है।"
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