Anant ke us Paar - 2 in Hindi Thriller by Shivam Dalvadi books and stories PDF | अनंत के उस पार - 2

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अनंत के उस पार - 2

अध्याय 2 तीसरा दिन

दाह-संस्कार के बाद का सन्नाटा मौत के सन्नाटे से भी ज़्यादा ज़हरीला होता है। मौत में तो फिर भी एक झटका होता है, एक चीख होती है, लेकिन अंतिम संस्कार के बाद जब श्मशान की राख ठंडी पड़ने लगती है, तब जो खालीपन घर की दीवारों में उतरता है, वह इंसान को अंदर से खोखला कर देता है।
आज आर्यन की मृत्यु का तीसरा दिन था।

नीलगढ़ के श्मशान घाट पर जब आर्यन की चिता जल रही थी, तब भी धुंध इतनी घनी थी कि दस कदम दूर खड़े लोग भी साये जैसे लग रहे थे। चिता की लपटें नीली और पीली रोशनी में लपलपा रही थीं, और लकड़ी के चटखने की आवाज़ के बीच मीरा को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह किसी और इंसान की अंत्येष्टि में खड़ी हो। उसे लग ही नहीं रहा था कि जिस शरीर को अग्नि की लपटें निगल रही थीं, वह वही आर्यन था जिसकी बाहों में उसने अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत साल बिताए थे।
शाम ढलते-ढलते कस्बे के लोग शर्मा हवेली में जुटने लगे थे। नीलगढ़ जैसे छोटे पहाड़ी कस्बों में किसी की मौत सिर्फ़ एक परिवार का दुःखांत नहीं होती, वह पूरे कस्बे की एक साझा घटना बन जाती है। लेकिन यहाँ के लोगों की हमदर्दी में एक अजीब सी सतर्कता थी। वे बातें तो कर रहे थे, लेकिन उनकी आँखें हवेली के कोनों, बंद दरवाज़ों और अँधेरे गलियारों में भटक रही थीं जैसे वे किसी शोक में नहीं, बल्कि किसी अनहोनी की आहट सुनने आए हों।

हवेली के बड़े हॉल में, जहाँ लकड़ी के पुराने सोफ़ों पर सफ़ेद चादरें बिछाई गई थीं, सरिता आंटी बैठी थीं। सरिता आंटी नीलगढ़ की सबसे पुरानी निवासियों में से थीं। उनका झुका हुआ शरीर, आँखों के चारों तरफ़ झुर्रियों का जाल और हमेशा धीरे-धीरे हिलती हुई उँगलियाँ किसी बरगद के पुराने तने जैसी लगती थीं।

"बेटी मीरा," सरिता आंटी ने चाय का घूँट लेते हुए अपनी भारी, काँपती आवाज़ में कहा। "शर्मा परिवार का इतिहास हमेशा से ऐसा ही रहा है। तुम्हारे ससुर जी... और उनसे पहले आर्यन के दादा दादाजी... नीलगढ़ ने कभी इस परिवार को शांति से जीने नहीं दिया।"
मीरा एक कोने में चुपचाप बैठी थी। उसके हाथ में चाय की प्याली थी जो कब की ठंडी हो चुकी थी। उसने सरिता आंटी की तरफ़ देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं।

"आंटी, आप इस समय यह सब बातें क्यों कर रही हैं?" पास ही बैठी काव्या ने टोकते हुए कहा। काव्या का चेहरा भी लगातार रोने की वजह से सूजा हुआ था, लेकिन वह मीरा को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी। "आर्यन एक दुर्घटना का शिकार हुआ है। झील के पास फिसलन होती है..."

"दुर्घटना?" सरिता आंटी ने अपनी नीली, धुंधली आँखों से काव्या को देखा और एक अजीब सी थूक निगली। "काव्या बेटी, तुम स्कूल में इतिहास पढ़ाती हो, लेकिन इस कस्बे का असली इतिहास उन किताबों में नहीं लिखा है। क्या 1953 में जब आर्यन के दादा गायब हुए थे, वह भी दुर्घटना थी? क्या 1977 की वह रात..."
"सरिता आंटी!" काव्या की आवाज़ अचानक तेज़ और सख्त हो गई। "मीरा अभी बहुत दुख में है। मेहरबानी करके आप पुरानी कहानियाँ मत दोहराइए।"

सरिता आंटी चुप हो गईं, लेकिन उन्होंने मीरा की तरफ़ एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें हमदर्दी कम और एक गहरा, भयावह अफ़सोस ज़्यादा था। उन्होंने उठते हुए मीरा के सिर पर अपना काँपता हुआ हाथ रखा और फुसफुसाकर बोलीं, "नीलगढ़ अपनों को इतनी आसानी से जाने नहीं देता, बेटी... जो यहाँ मरता है, वह यहीं भटकता है। दरवाज़े बंद रखना।"
रात के आठ बजते-बजते कस्बे के सभी लोग एक-एक करके चले गए। इंस्पेक्टर रावत भी आए थे। वे खाकी वर्दी में नहीं, बल्कि एक सादे स्वेटर में थे। उन्होंने मीरा से कुछ नहीं कहा, बस हॉल के दरवाज़े पर खड़े होकर कुछ देर तक हवेली की सीढ़ियों को ताकते रहे और फिर सिर झुकाकर बाहर निकल गए।

अब हवेली में सिर्फ़ मीरा और काव्या बची थीं।
बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन पेड़ों से पानी की बूँदें टप-टप करके हवेली की जस्ते की छत पर गिर रही थीं। नीलगढ़ की रात इतनी खामोश थी कि दूर जंगल में किसी उल्लू की हू-हू की आवाज़ भी सीधे बेडरूम के अंदर गूँज रही थी।
काव्या ने रसोई से गरम खिचड़ी बनाकर मीरा के सामने रखी, लेकिन मीरा ने एक निवाला भी मुँह में नहीं डाला।
"मीरा, तुम्हें थोड़ा खाना ही होगा," काव्या ने विनती की। "तुम तीन दिन से बिना खाए-पीए बैठी हो। इस तरह तो तुम बीमार पड़ जाओगी।"

"मुझे भूख नहीं है, काव्या," मीरा की आवाज़ इतनी धीमी थी कि लग रहा था जैसे कोई हवा का झोंका बोल रहा हो। "मुझे बस ऐसा लग रहा है जैसे आर्यन यहीं कहीं है। इस घर के किसी कमरे में... या शायद उसी स्टडी टेबल पर, जहाँ वह रात भर जागता था।"

"यह तुम्हारा वहम है, मीरा," काव्या ने उसका हाथ थामते हुए कहा। "जब कोई अपना अचानक चला जाता है, तो उसकी मौजूदगी का अहसास हर कोने में होता है। लेकिन तुम्हें हक़ीक़त को स्वीकार करना होगा। आर्यन अब... अब नहीं रहा।"
'नहीं रहा।' यह दो शब्द मीरा के कानों में किसी नुकीले शीशे की तरह चुभे। क्या सच में आर्यन नहीं रहा? तो फिर सुबह झील के पास उसकी हथेली पर वह नीला निशान क्या था? क्यों डॉ. सक्सेना उसकी तरफ़ देखने से कतरा रहे थे? और क्यों इंस्पेक्टर रावत ने उस निशान को देखते ही फ़ौरन चादर ढक दी थी?

"काव्या," मीरा ने काव्या की आँखों में आँखें डालकर पूछा। "तुम उस रात किले की तरफ़ क्यों गई थी?"
काव्या का हाथ अचानक मीरा की हथेली में अकड़ गया। उसके चेहरे की रंगत एक पल में उड़ गई। "क्या... क्या मतलब? मैं किस रात किले की तरफ़ गई थी?"
"आर्यन की मौत से एक रात पहले," मीरा ने कहा। उसकी भूरी आँखें काव्या के चेहरे के एक-एक भाव को पढ़ रही थीं। "मैंने खिड़की से देखा था। तुम काली शॉल ओढ़कर किले वाली सड़क पर जा रही थी। और अगली सुबह तुम्हारी कलाई पर..."
मीरा ने काव्या की दाहिनी कलाई की तरफ़ देखा। काव्या ने तुरंत अपनी आस्तीन नीचे खींच ली और अपने हाथ को पीछे कर लिया।

"तुम... तुम गलत देख रही हो, मीरा," काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट आ गई थी। वह कुर्सी से खड़ी हो गई। "नींद की गोलियों और मानसिक तनाव की वजह से तुम्हें भ्रांति हो रही है। मैं रात को घर पर थी। और मेरी कलाई... मेरी कलाई में कुछ नहीं है।"

मीरा ने उसे ध्यान से देखा। काव्या उसकी सबसे अच्छी सहेली थी पिछले तीन सालों में वही नीलगढ़ में मीरा का इकलौता सहारा बनी थी। लेकिन इस वक्त काव्या की आँखों में सच्चाई नहीं, बल्कि एक गहरा बचाव का भाव था। वह कुछ छुपा रही थी।

"मुझे अब चलना चाहिए," काव्या ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा। उसका व्यवहार अचानक बहुत औपचारिक हो गया था। "रात बहुत हो चुकी है। विकास (काव्या का पति) इंतज़ार कर रहा होगा। मैं सुबह जल्दी आऊँगी। तुम दरवाज़ा अंदर से ठीक से बंद कर लेना।"

काव्या ने अपना बैग उठाया और तेज़ी से हॉल की तरफ़ बढ़ गई। मीरा उसके पीछे-पीछे दरवाज़े तक आई। काव्या ने बाहर निकलते हुए एक बार मुड़कर मीरा को देखा उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह कुछ बोले बिना धुंधली रात में गायब हो गई।
मीरा ने हवेली का भारी लकड़ी का दरवाज़ा बंद किया और भारी सांकल चढ़ा दी।
हवेली अब पूरी तरह अकेली थी।

तीन मंज़िला शर्मा हवेली 1906 में बनाई गई थी। देवदार की पुरानी लकड़ी से बनी यह हवेली दिन में जितनी भव्य लगती थी, रात में उतनी ही भयानक रूप धारण कर लेती थी। लकड़ी के बीम हवा के दबाव से रह-रहकर चरचराते थे, जैसे कोई बूढ़ा इंसान अपनी हड्डियों को मोड़ रहा हो।
मीरा धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर अपने बेडरूम में आई। बेडरूम के एक कोने में आर्यन की वही पुरानी कोरडरॉय की जैकेट एक कुर्सी के पीछे टंगी हुई थी।

मीरा उस जैकेट के पास गई। उसने अपने हाथ फैलाए और जैकेट को अपने सीने से लगा लिया। उसमें अभी भी आर्यन के परफ्यूम की, उसकी त्वचा की, उसकी साँसों की वही परिचित महक रची-बसी थी। मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं और अपनी ठोड़ी को जैकेट के कॉलर पर टिका दिया। आँसू, जो तीन दिन से उसकी आँखों के पीछे जमे हुए थे, अचानक बह निकले। वह कुर्सी पर बैठ गई और जैकेट को अपने चेहरे से छिपाकर रोने लगी।

रोते-रोते उसका हाथ जैकेट की अंदरूनी जेब के ऊपर से गुज़रा।
अचानक मीरा का रोना रुक गया।
उसके हाथ की उँगलियों ने जैकेट के कपड़े के नीचे किसी सख्त, चौकोर चीज़ को महसूस किया। ऐसा लगा जैसे जेब के अंदर कोई भारी कागज़ या छोटा सा डिब्बा रखा हो।
मीरा ने चौंककर जैकेट को अपनी गोद में रखा। उसने अपना दाहिना हाथ जैकेट की अंदरूनी जेब के अंदर डाला।
लेकिन... जेब खाली थी।

मीरा की उँगलियाँ जेब के मखमली स्तर को छू रही थीं, लेकिन वहाँ कुछ नहीं था। कोई कागज़ नहीं, कोई डिब्बा नहीं।
मीरा ने हैरानी से अपनी उँगली बाहर निकाली। उसने जैकेट के कपड़े को बाहर से फिर से छुआ। बाहर से छूने पर साफ़ महसूस हो रहा था कि अंदर कोई कड़क, चौकोर चीज़ है लगभग चार इंच लंबी और तीन इंच चौड़ी। उसकी धारदार कोर कपड़े के ऊपर से साफ़ महसूस हो रही थी।

लेकिन जैसे ही मीरा जेब के अंदर हाथ डालती, उसकी उँगलियाँ सिर्फ़ खाली हवा को छूतीं!
"यह... यह कैसे हो सकता है?" मीरा की साँसें तेज़ हो गईं।

उसने जैकेट को पूरा उल्टा कर दिया। अंदर की जेब का कपड़ा पूरी तरह से बाहर आ गया। जेब बिल्कुल खाली थी! उसमें कोई छेद नहीं था, कोई छिपी हुई दराज़ नहीं थी। लेकिन जब वह जैकेट को सीधा करके बाहर से हाथ लगाती, तो वह सख्त चीज़ वहीं मौजूद रहती थी कपड़े के नीचे, लेकिन इस दुनिया के स्पर्श से परे!
मीरा का दिल दहल गया। यह कोई छलावा नहीं था। यह भौतिक विज्ञान के नियमों का उल्लंघन था। कोई चीज़ कपड़ा छू सकती थी, लेकिन जेब के अंदर मौजूद नहीं थी!
तभी... हवेली की दूसरी मंज़िल से एक आवाज़ आई।
धम... धम... धम...
मीरा का शरीर जम गया। उसने अपनी नज़रें उठाईं और बेडरूम के दरवाज़े की तरफ़ देखा।
आवाज़ ऊपर वाली मंज़िल से आ रही थी तीसरी मंज़िल से, जो पिछले बीस सालों से बंद पड़ी थी और जिसके भारी पीतल के ताले की चाबी किसी के पास नहीं थी।

वह किसी के चलने की आवाज़ थी। भारी, धीमे कदम। जैसे कोई भारी जूतियाँ पहनकर उस बंद पड़े हॉल में टहल रहा हो।
"आर्यन?" मीरा के मुँह से अनजाने में ही निकला।
वह उठी। उसके हाथ में अभी भी वह अजीब सी जैकेट थी। वह बेडरूम से बाहर निकली और मोमबत्ती हाथ में लेकर अँधेरे गलियारे की तरफ़ बढ़ी।

हवेली की सीढ़ियाँ तीसरी मंज़िल की तरफ़ जाती थीं। उन सीढ़ियों पर धूल की मोटी परत चढ़ी हुई थी और हवा में जाले लटक रहे थे। मीरा एक-एक कदम सँभलकर रखने लगी। उसकी मोमबत्ती की पीली रोशनी दीवारों पर बनी पुरानी तस्वीरों पर नाच रही थी आर्यन के परदादा, उसके दादा, और नीलगढ़ के पुराने ज़माने के दृश्य।
जैसे-जैसे मीरा तीसरी मंज़िल के करीब पहुँच रही थी, आवाज़ और स्पष्ट होती जा रही थी।
यह सिर्फ़ चलने की आवाज़ नहीं थी। वहाँ... कुछ और भी हो रहा था।
कागज़ के फटने की आवाज़। और फिर... किसी लकड़ी की मेज पर पेंसिल के घिसने की चरचराहट।
कोई लिख रहा था।

मीरा तीसरी मंज़िल के मुख्य दरवाज़े के सामने आकर खड़ी हो गई। यह दरवाज़ा सागौन की मोटी लकड़ी का बना था, जिस पर जंग लगा एक भारी पीतल का ताला लटका हुआ था। ताले पर इतनी धूल थी कि लग रहा था जैसे इसे सदियों से छुआ न गया हो।

लेकिन दरवाज़े की नीचे की पतली सी दरार से... रोशनी आ रही थी।
एक धीमी, नीली-सफ़ेद रोशनी, जो मोमबत्ती की पीली रोशनी से बिल्कुल अलग थी। वह रोशनी स्पंदित हो रही थी, जैसे कोई चिराग़ या कोई नीली लौ अंदर जल रही हो।
मीरा ने दरवाज़े के ऊपर अपना कान टिकाया।

अंदर से लिखने की आवाज़ साफ़ आ रही थी। सर-सर-सर... पेंसिल की नोक कागज़ पर तेज़ी से दौड़ रही थी। और फिर, एक हल्की सी फुसफुसाहट उभरी एक ऐसी आवाज़ जो हवेली की दीवारों के अंदर से आ रही थी:
"...समय कम है... परतें खिसक रही हैं... मीरा..."
मीरा की चीख गले में ही दब गई। वह आर्यन की आवाज़ थी! बिल्कुल आर्यन की वही ठहराव, वही धीमी तासीर!
"आर्यन!" मीरा ने पागलों की तरह उस भारी दरवाज़े को पीटना शुरू कर दिया। "आर्यन! तुम अंदर हो? दरवाज़ा खोलो! आर्यन!"
उसके हाथों के धक्कों से भारी पीतल का ताला हिलने लगा, लेकिन दरवाज़ा टस से मस नहीं हुआ।
अचानक... अंदर की नीली रोशनी बुझ गई।
लिखने की आवाज़ बंद हो गई।

सन्नाटा फिर से छा गया एक ऐसा सन्नाटा जो पहले से कहीं ज़्यादा गभीर और डरावना था।
मीरा दरवाज़े से टेक लगाकर ज़मीन पर गिर पड़ी। वह हाँफ रही थी। उसके आँसू उसकी गालों पर बहकर लकड़ी के फ़र्श पर गिर रहे थे। उसने दरवाज़े के नीचे से झाँकने की कोशिश की, लेकिन अब वहाँ सिर्फ़ गहरा अँधेरा था।
उस रात मीरा तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर ही बैठी रही। वह नीचे नहीं गई। उसने उस बंद दरवाज़े को अपनी आँखों से दूर नहीं होने दिया। उसके हाथ में आर्यन की जैकेट थी, जिसकी जेब में वह अदृश्य सख्त चीज़ अब भी महसूस हो रही थी।
सुबह के छह बजे थे।

नीलगढ़ पर अभी भी कोहरे का कब्ज़ा था, लेकिन आसमान में हल्की स्लेटी सफेदी फैलने लगी थी। बारिश पूरी तरह रुक चुकी थी और हवा में देवदार की भीगी पत्तियों की भीनी-भीनी महक तैर रही थी।
मीरा की आँख लग गई थी। वह सीढ़ियों पर ही टेक लगाए सो गई थी। जब सुबह की ठंडी हवा के झोंके ने उसकी गालों को छुआ, तो वह हड़बड़ाकर उठ बैठी।

उसका शरीर अकड़ चुका था। मोमबत्ती पूरी तरह पिघलकर फ़र्श पर जम चुकी थी।
मीरा ने अपने कपड़े झाड़े और नीचे उतरी। उसका दिमाग़ रात की घटना से अभी भी सुन्न था। क्या उसने जो सुना था, वह सच था? या काव्या सही कह रही थी कि दुख और नींद की गोलियों की वजह से उसे मतिभ्रम हो रहा था?
वह रसोई में गई और अपने मुँह पर ठंडे पानी के छंटे मारे। ठंडे पानी के स्पर्श से उसकी चेतना थोड़ी वापस आई।
तभी... हवेली के मुख्य द्वार पर एक हलकी सी आहट हुई।
टक... टक...
कोई बाहर खड़ा था।
मीरा का दिल एक बार फिर तेज़ी से धड़कने लगा। उसने रसोई से एक भारी पीतल का फूलदान उठाया और धीरे-धीरे हॉल की तरफ़ बढ़ी।

मुख्य दरवाज़े की सांकल वैसे ही चढ़ी हुई थी जैसे काव्या के जाने के बाद मीरा ने चढ़ाई थी। कोई अंदर नहीं आ सकता था।
मीरा ने सांकल हटाई और दरवाज़े को धीरे से खोला।
बाहर धुंधली सड़क पर कोई नहीं था। सिर्फ़ ओस से भीगे हुए कदम के निशान थे, जो हवेली के बरामदे तक आते थे और फिर वहीं हवा में गायब हो जाते थे।

मीरा ने निराशा से अपनी आँखें मूँद लीं। वह दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी कि उसकी नज़र नीचे ज़मीन पर पड़ी।
दरवाज़े की चौखट पर... एक पीला लिफ़ाफ़ा रखा हुआ था।
वह लिफ़ाफ़ा सूखा था, जबकि पूरा बरामदा ओस और बारिश के पानी से गीला था। ऐसा लग रहा था जैसे उसे अभी कुछ ही सेकंड पहले वहाँ रखा गया हो।

मीरा नीचे झुकी और उसने काँपते हाथों से उस लिफ़ाफ़े को उठाया।
लिफ़ाफ़े के ऊपरी हिस्से पर नीली स्याही से कुछ लिखा हुआ था।
मीरा की साँसें थम गईं। वह लिखावट... वह लिखावट दुनिया में किसी और की नहीं हो सकती थी। पेंसिल को थोड़ा झुकाकर लिखने की वह खास शैली, 'म' और 'र' के अक्षरों को ऊपर से थोड़ा गोल बनाने का वह अंदाज़...
वह आर्यन की लिखावट थी।
लिफ़ाफ़े पर लिखा था:
"मीरा के लिए मेरी खोज के बाद।"