Anant ke us Paar - 4 in Hindi Thriller by Shivam Dalvadi books and stories PDF | अनंत के उस पार - 4

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अनंत के उस पार - 4

डायरी
कमरे में सन्नाटा इतना घना था कि हवा में तैरते धूल के कण भी जैसे थम गए थे।

मीरा के हाथ में वह पुरानी, काले चमड़े की डायरी थी। डायरी के कवर पर उकेरे गए तीन संकेंद्री वृत्त (concentric circles) किसी प्राचीन तांत्रिक यन्त्र की तरह लग रहे थे, और उनके बीच में जड़ा वह छोटा सा नीला पत्थर मद्धम-मद्धम स्पंदित हो रहा था। उस पत्थर से निकलने वाली नीली रोशनी कमरे की पीली रोशनी में एक अजीब सा अमानवीय रंग घोल रही थी।

उस पत्थर को छूते ही मीरा को अपनी हथेली पर एक ठंडी सिहरन महसूस हुई बिल्कुल वैसी ही सिहरन जैसी किसी जमी हुई नदी पर हाथ रखने पर होती है।

दरवाज़े पर खड़ी काव्या का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। उसकी नज़रें डायरी के कवर पर बने उस चिह्न पर टिकी थीं, और उसकी आँखों में एक ऐसा खौफ़ था जो मीरा ने पहले कभी नहीं देखा था।

"काव्या..." मीरा ने मुड़कर उसकी तरफ़ देखा। "तुम इस चिह्न को पहचानती हो? यह क्या है?"

काव्या ने पीछे की तरफ़ एक कदम बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ अपनी कलाई की चूड़ियों को इतनी कसकर भींचे हुए थीं कि वे टूटने की कगार पर थीं।

"मीरा... इसे वापस रख दो," काव्या की आवाज़ काँप रही थी। "इसे वहीं डाल दो जहाँ से तुमने निकाला है। ईश्वर के लिए... मेरी बात सुनो!"

"तुम कुछ जानती हो, काव्या!" मीरा अपनी जगह से उठी। हाथ में डायरी लिए वह काव्या की तरफ़ बढ़ी। "तुम जानती हो कि यह चिह्न क्या है! तुमने इसे पहले भी देखा है, है ना? किले में? या कहीं और?"

"मैंने कुछ नहीं देखा!" काव्या अचानक चिल्ला उठी। उसकी आवाज़ में एक अनियंत्रित दहशत थी। "मुझे... मुझे यहाँ से जाना होगा। मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है।"

"काव्या! रुको!"

लेकिन काव्या पीछे मुड़ी और तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे भाग गई। हवेली का भारी मुख्य दरवाज़ा एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ बंद हुआ, और उसके बाद सिर्फ़ बाहर गिरती बारिश का शोर रह गया।

मीरा वहीं खड़ी रही। काव्या का इस तरह भाग जाना इस बात का पक्का सबूत था कि नीलगढ़ में जो कुछ हो रहा था, वह सिर्फ़ आर्यन की सनक नहीं थी। यहाँ एक ऐसा रहस्य मौजूद था जिसे कस्बे के लोग जानते थे, लेकिन उस पर बात करने से खौफ़ खाते थे।

मीरा वापस स्टडी रूम में आई। उसने भारी सागौन का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया और सांकल चढ़ा दी।

बाहर बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। देवदार के पेड़ों से टकराती हवा की सनसनाहट ऐसी लग रही थी जैसे कोई दूर बैठकर सिसकियाँ ले रहा हो। मीरा स्टडी टेबल के पास आई और आर्यन की पुरानी चमड़े की रिवॉल्विंग चेयर पर बैठ गई।

उसने डायरी को टेबल पर रखा। नीला पत्थर अब भी धीमी गति से चमक रहा था, जैसे डायरी के अंदर कोई दिल धड़क रहा हो।

मीरा ने एक लंबी, गहरी साँस ली। उसकी उँगलियों ने डायरी के पहले पन्ने को पकड़ा और धीरे से पलट दिया।

डायरी का पहला पन्ना।

सफ़ेद मखमली कागज़ पर नीली स्याही से, आर्यन की साफ़ और सुंदर लिखावट में पहली पंक्ति लिखी थी:

"नीलगढ़ वह नहीं जो दिखता है।"

मीरा ने उस पंक्ति पर अपनी उँगली फेरी। आर्यन के शब्द जैसे उसकी आँखों के सामने जीवंत हो उठे। वह पढ़ने लगी:

"१२ अप्रैल २०२३:
अगर कोई इस डायरी को पढ़ रहा है, तो समझ ले कि हम जिस वास्तविकता को सत्य मानते हैं, वह केवल एक छलावा है। नीलगढ़ सिर्फ़ उत्तराखंड के नक्शे पर बसा २,२०० मीटर ऊँचाई का एक पहाड़ी कस्बा नहीं है। नीलगढ़ एक 'बिंदु' है—एक ऐसा भौगोलिक और चेतना का केंद्र जहाँ समय और स्थान की कई परतें (Layers) एक-दूसरे के ऊपर टिकी हुई हैं। ठीक वैसे ही जैसे प्याज़ के छिलके होते हैं। हर छिलके के नीचे एक और छिलका होता है, वैसा ही पर हर छिलका एक ही प्याज़ का हिस्सा होता है।"

मीरा की साँसें भारी होने लगीं। वह आगे पढ़ने लगी:

"हम जिस नीलगढ़ में रहते हैं, वह केवल पहली परत है। लेकिन इसके ठीक नीचे, इसके पीछे, और इसके भीतर कई और नीलगढ़ मौजूद हैं। उनमें से हर परत में वही पहाड़ हैं, वही झील है, वही हवेली है... लेकिन वहाँ का समय अलग है, वहाँ का इतिहास अलग है, और वहाँ रहने वाले लोग भी अलग हैं।"

मीरा का सिर चकराने लगा। 'परतें'? क्या आर्यन सच में अपने होशोहवास में यह सब लिख रहा था? लेकिन आगे के पन्नों पर जो तथ्य और तारीखें दी गई थीं, वे किसी पागल की कल्पना नहीं लग रही थीं। वे एक इतिहासकार की गहराई से की गई रिसर्च का परिणाम थीं।

आर्यन ने नीलगढ़ के प्राचीन इतिहास के तीन मुख्य कालखंडों का ज़िक्र किया था:

"पहला रिकॉर्ड: १७१८ भैरवगढ़ किले की घटना:
१७१८ की एक रात, जिसे कस्बे के पुराने अभिलेखों में 'नील रात' कहा गया है, भैरवगढ़ किले से राजा भैरव सिंह के पुत्र अर्जुन सहित २३ लोग अचानक गायब हो गए। उनके घर वहीं थे, उनके कपड़े वहीं थे, यहाँ तक कि उनकी रसोइयों में आधा पका भोजन रखा था। लेकिन वे २३ लोग हवा में विलीन हो गए। राजा ने उन्हें ढूँढने के लिए पूरा जंगल छान मारा, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला। अभिलेखों में लिखा है कि उस रात नील झील का पानी नीले से बदलकर बिल्कुल सफ़ेद हो गया था।"

मीरा ने पन्ना पलटा। अगले पन्ने पर आर्यन ने एक अंग्रेज़ अफ़सर की पुरानी डायरी के अंश लिखे थे:

"दूसरा रिकॉर्ड: १८५९ सरवेयर मैकिन्टायर का विवरण:
ईस्ट इंडिया कंपनी के एक सर्वेयर, जेम्स मैकिन्टायर ने अपनी निजी डायरी में लिखा था: 'आज मैं नील झील के किनारे ज़मीन का नक्शा बना रहा था। जब मैंने झील के शांत पानी में झाँका, तो मुझे पानी में मेरी अपनी परछाई नहीं दिखी। पानी के नीचे एक और आकाश था एक ऐसा आकाश जहाँ सूरज नहीं, बल्कि दो नीले चाँद चमक रहे थे। और उस आकाश के नीचे एक कस्बा था जो उल्टा लटका हुआ था। जब मैंने ध्यान से देखा, तो उस उल्टे कस्बे में कुछ लोग चल रहे थे जो मेरी तरफ़ देखकर हाथ हिला रहे थे। मुझे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूँ।'
मैकिन्टायर इस घटना के तीन दिन बाद झील में कूद गया। उसका शव कभी नहीं मिला।"

मीरा की रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी जैकेट को और कसकर लपेट लिया। कमरे का तापमान अचानक बहुत गिर गया था, जैसे कोई अदृश्य बर्फ़ की हवा खिड़की की दरारों से अंदर आ रही हो।

उसने अगला पन्ना पलटा। यहाँ उसके अपने परिवार का इतिहास लिखा था:

"तीसरा रिकॉर्ड: १९५३ दादाजी की गुमशुदगी:
१९५३ में मेरे दादा जी, डॉ. के.एन. शर्मा, नीलगढ़ आए थे। वे भी परतों के इस रहस्य पर शोध कर रहे थे। उनकी निजी डायरी का अंतिम पृष्ठ मुझे हाल ही में मिला है। दादाजी ने लिखा था: 'कमला (मेरी दादी) सोचती है कि मैं पागल हो गया हूँ। लेकिन मैंने उसे देख लिया है। वह दूसरी परत में है। 1953 की नील रात को जब झील चमकेगी, मैं उसके पास जाऊँगा। जो याद रखता है, वही बँधा रहता है। जो भूल जाता है, वही मुक्त होता है।'
दादाजी उसी रात गायब हो गए। पुलिस ने कहा कि वे झील में डूब गए, लेकिन उनका शव कभी नहीं मिला।"

मीरा के हाथ काँपने लगे। दादाजी की गुमशुदगी! आर्यन हमेशा कहता था कि उसके दादाजी एक दुर्घटना में मारे गए थे। लेकिन यहाँ डायरी में लिखा था कि वे 'दूसरी परत' में चले गए थे!

मीरा ने तेज़ी से पन्ने पलटना शुरू किया। अब आर्यन की लिखावट में एक अकुलाहट, एक अजीब सी हड़बड़ाहट साफ़ दिखने लगी थी। ये वे प्रविष्टियाँ थीं जो उसने मृत्यु से कुछ ही महीने पहले लिखी थीं:

"६ जून २०२४:
मुझे अहसास हो रहा है कि नीलगढ़ में समय सीधी रेखा में नहीं चलता। यहाँ चीज़ें बदलती हैं। कल मैंने स्टडी रूम में जो किताब रखी थी, आज सुबह वह किसी और भाषा में लिखी हुई मिली। पुरानी शादी की तस्वीरों में चेहरे धुंधले हो रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारी वास्तविकता स्थिर नहीं है, बल्कि दो परतों के टकराने से हिल रही है।"

"१८ अगस्त २०२४:
कस्बे के कुछ लोग सब जानते हैं। वे खुद को 'रखवाले' कहते हैं। वे पीढ़ियों से इस रहस्य को छुपाते आए हैं। वे नहीं चाहते कि कोई भी एक परत से दूसरी परत में जाए, क्योंकि जब कोई पार जाता है, तो परतों के बीच की दीवारें कमज़ोर हो जाती हैं। रखवाले मुझे देख रहे हैं। काव्या भी उनसे जुड़ी हुई है... मुझे उस पर पूरा भरोसा था, लेकिन वह भी रखवालों की बैठकों में जाती है।"

मीरा का दिल धड़कना भूल गया।

काव्या? काव्या रखवालों से जुड़ी है?

मीरा को सुबह का वह दृश्य याद आया जब उसने काव्या की कलाई पर वही नीला निशान देखा था। और कैसे काव्या डायरी को देखते ही खौफ़ज़दा होकर भाग गई थी! क्या उसकी सबसे अच्छी सहेली, जिस पर वह आँख मूँदकर भरोसा करती थी, आर्यन के खिलाफ़ रच रहे किसी षड्यंत्र का हिस्सा थी?

मीरा ने काँपते हाथों से अगला पन्ना पलटा। यह डायरी का आख़िरी लिखा हुआ पन्ना था।

इस पन्ने पर आर्यन की लिखावट बहुत बिखरी हुई थी। अक्षरों को इतनी ताक़त से लिखा गया था कि पेंसिल की नोक से कागज़ जगह-जगह से फट गया था। ऐसा लग रहा था जैसे यह लिखते समय उसके हाथ काँप रहे थे, या वह किसी भयानक डर के साए में था।

उस अंतिम पृष्ठ पर लिखा था:

"२० अक्टूबर २०२४:
वे मुझे देख रहे हैं। खिड़की के बाहर, घने कोहरे के पीछे खड़े होकर... वे मुझे रोज़ रात को देखते हैं। उनकी आँखों में कोई रोशनी नहीं है। वे जानते हैं कि मैंने उस दरवाज़े का नक्शा बना लिया है। वे जानते हैं कि मैं नील रात से पहले झील के नीचे जाने वाला हूँ।

मीरा, अगर तुम यह पढ़ रही हो... अगर मुझे कुछ हो जाए, अगर वे मुझे मार दें या मैं अगली परत में ढकेल दिया जाऊँ... तो मीरा, तुम मुझे ढूँढने मत आना। मेरे पीछे मत आना! तुम्हें नहीं पता कि परतों के बीच क्या छिपा है। वहाँ केवल सन्नाटा है... एक ऐसा सन्नाटा जो तुम्हारी यादों को, तुम्हारी पहचान को, तुम्हारे वजूद को हमेशा के लिए मिटा देगा!

मुझसे वादा करो मीरा, तुम मुझे मत ढूँढना।"

अंतिम पंक्ति के नीचे, पेंसिल से एक बड़ा सा क्रॉस (X) बनाया गया था, और उसके नीचे नीली स्याही का एक बड़ा सा धब्बा लगा हुआ था जैसे लिखते-लिखते आर्यन का हाथ किसी ने झटके से खींच लिया हो!

मीरा की आँखों से आँसू छलक कर डायरी के उस पन्ने पर गिर पड़े।

"आर्यन..." वह सिसक उठी। "तुमने मुझसे यह सब क्यों छुपाया? तुमने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?"

तभी...

खटखट!

स्टडी रूम की खिड़की के शीशे पर बाहर से किसी ने अपनी उँगलियों से दस्तक दी।

मीरा का पूरा शरीर जम गया। उसने धीरे से सिर उठाकर खिड़की की तरफ़ देखा।

बाहर बारिश हो रही थी, और घना कोहरा शीशे से चिपका हुआ था। लेकिन उस घने, सफ़ेद कोहरे के पार... खिड़की के ठीक बाहर, हवा में तैरती हुई एक लंबी, काली छाया खड़ी थी।

वह छाया किसी इंसान जैसी ही थी, लेकिन उसकी कोई रूपरेखा साफ़ नहीं थी। उसकी दो खाली, रोशनी-हीन आँखें कोहरे को चीरती हुई सीधे कमरे के अंदर, मीरा की आँखों में झाँक रही थीं!

और खिड़की के शीशे पर बाहर की तरफ़ से, भीगी उँगलियों से एक शब्द लिखा जा रहा था।

काँच पर भाप के बीच उल्टा लिखा हुआ शब्द उभर रहा था:

"अगला।"