एक ख़त

written by:  Saadat Hasan Manto
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तुम्हारा तवील ख़त मिला जिसे मैंने दो मर्तबा पढ़ा। दफ़्तर में इस के एक एक लफ़्ज़ पर मैंने ग़ौर किया। और ग़ालिबन इसी वजह से उस रोज़ मुझे रात के दस बजे तक काम करना पड़ा, इस लिए कि मैंने बहुत सा वक़्त इस गौर-ओ-फ़िक्र में ज़ाए कर दिया था। तुम जानते हो इस सरमाया परस्त दुनिया में अगर मज़दूर मुक़र्ररा वक़्त के एक एक लम्हे के इव्ज़ अपनी जान के टुकड़े तोल कर न दे तो उसे अपने काम की उजरत नहीं मिल सकती। लेकिन ये रोना रोने से क्या फ़ायदा!



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