Seeta - Ek naari - 3 by Pratap Narayan Singh in Hindi Poems PDF

सीता: एक नारी - 3

by Pratap Narayan Singh in Hindi Poems

सीता: एक नारी ॥तृतीय सर्ग॥ स्वीकार करती बंध जब, सम्मान नारी का तभीहोती प्रशंसित मात्र तब, संतुष्ट जब परिजन सभी भ्राता, पिता, पति,परिजनों की दासता में रत रहेहोती विभूषित नारि जो मन की नहीं अपनेकहे उसके लिए इच्छा-अनिच्छा व्यक्त ...Read More