Seeta - Ek naari - 4 by Pratap Narayan Singh in Hindi Poems PDF

सीता: एक नारी - 4

by Pratap Narayan Singh in Hindi Poems

सीता: एक नारी ॥चतुर्थ सर्ग॥ सहकर थपेड़े अंधड़ों के अनगिनत रहता खड़ाखंडित न होता काल से, बल प्रेम में होता बड़ा पहले मिलन पर प्रीति की जो अंकुरित थी वह लता-लहरा उठी पा विपिन में सानिघ्य-जल की प्रचुरता सिंचित ...Read More