Ek-Apreshit-Patra - 5 by Mahendra Bhishma in Hindi Letter PDF

एक अप्रेषित-पत्र - 5

by Mahendra Bhishma in Hindi Letter

एक अप्रेषित-पत्र महेन्द्र भीष्म कोई नया नाम दो ‘‘जागते रहो'' मध्य रात्रि की निस्तब्धता को भंग करती सेन्ट्रल जेल के संतरी की आवाज और फिर पहले जैसी खामोशी। मैं जाग रहा हूँ। 3श् ग 6श् की काल कोठरी में ...Read More