Gujarati Social Stories Books and stories free PDF

    पीताम्बरी - 1
    by Meena Pathak
    • (5)
    • 79

    घर में उत्सव जैसा माहौल था सभी के चेहरों पर उत्साह झलक रहा था बड़की चाची. रामपुर वाली चाची, पचरूखिया वाली चाची, सभी दोगहा में ...

    कभी यूँ भी तो हो... - 2
    by प्रियंका गुप्ता
    • (1)
    • 10

    दो-तीन दिनो तक मेरी हिम्मत ही नहीं हुई थी सागर को फोन करने की...फिर आखिरकार फोन कर ही दिया। उसने फोन उठाया भी...बात भी की...। नाराज़ तो था, पर ...

    लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 3
    by Neelam Kulshreshtha
    • (2)
    • 22

    दामिनी ने मीशा को अपने पास बुला तो लिया था किन्तु उसका दिल भी काँप रहा था, कैसे ये आजकल के बच्चे इतनी जल्दी डिप्रेशन के शिकार हो जाते ...

    आसपास से गुजरते हुए - 4
    by Jayanti Ranganathan
    • (3)
    • 20

    हॉस्टल आने के बाद भी मैं कई दिनों तक पौधों को याद करती रही। अब आई को लम्बे-लम्बे खत लिखना मेरा शगल बन गया था। विद्या दीदी और सुरेश ...

    स्पा पार्लर का सुख
    by r k lal
    • (11)
    • 122

    स्पा पार्लर का सुखआर 0 के0 लालतरुण और रवि गहरे दोस्त थे। दोनों सुख- दुख में एक दूसरे का साथ देते थे। तरुण ने कहा, - "मेरी पत्नी  ब्यूटी ...

    प्रिया की डायरी
    by vandana A dubey
    • (6)
    • 45

    "प्रिया...रूमाल कहां रख दिये? एक भी नहीं मिल रहा."" अरे! मेरा चश्मा कहाँ है? कहा रख दिया उठा के?"" टेबल पर मेरी एक फ़ाइल रखी थी, कहाँ रख दी ...

    राह से भटकी जिंदगी
    by Monty Khandelwal
    • (1)
    • 26

    जब बचपना होता है | तो बच्चा क्या-क्या ख्वाब नहीं देखता है | राजू भी  उन मेसे एक था वो भी अपने दोस्तों केे जैसे पैसे वाला बनना चाहता था ...

    दस दरवाज़े - 21
    by Subhash Neerav
    • (5)
    • 37

    जैकलीन के यहाँ से वापस लौटकर मैं एक नए जोश में हूँ। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो खोया हुआ कुछ मिल गया हो। धीरे-धीरे मैं सोचने लगता हूँ ...

    खुशियों की आहट - 8
    by Harish Kumar Amit
    • (4)
    • 26

    कनॉट प्लेस से घर वापिस आते हुए वे रास्ते भर चुप ही रहे, क्योंकि पापा तेज़ी से गाड़ी चला रहे थे. कनॉट प्लेस में खाना खाते, खरीद्दारी करते और ...

    पल जो यूँ गुज़रे - 6
    by Lajpat Rai Garg
    • (6)
    • 60

    अगस्त का दूसरा सप्ताह चल रहा था। एक दिन निर्मल जब क्लासिज़ लगाकर हॉस्टल पहुँचा तो कमरे में उसे डाक में आया एक बन्द लिफाफा मिला। लिफाफे पर प्रेशक ...

    गों...गों...गों...
    by Manish Vaidya
    • (2)
    • 24

    घर से यहाँ तक के सारे सफ़र और यहाँ बस से उतरकर नाना के गाँव की पगडण्डी पर पैदल चलते हुए लगातार यही लगता कि अभी कहीं से कोई ...

    सैलाब - 2
    by Lata Tejeswar renuka
    • (2)
    • 25

    अंधेरी कोठरी में उन काली रातों की यादों को भुलाने का प्रयत्न कर रहा था। जब भी आँखें बंद कर सोने की कोशिश करता, कोई साया सपने में आ ...

    तुम्हारी अधूरी कहानी
    by Geeta Shri
    • (0)
    • 40

    तुम जब जब दिखती हो, कोई कहानी झांक जाती है। तुम बार बार यूं न दिखा करो। गर कलम चल गई तो ये न कहना कि जीने में इतना ...

    पश्चाताप - 2
    by Meena Pathak
    • (21)
    • 193

    शहर के पॉश एरिया में भव्य और सुंदर सा बंगला, नौकर-चाकर, हर सुख-सुविधा और क्या चाहिए था उसे ! गेट से प्रवेश करते ही बड़ा सा बगीचा जिसमे देशी-विदेशी ...

    कभी यूँ भी तो हो... - 1
    by प्रियंका गुप्ता
    • (3)
    • 48

    नर्स ने आकर मुझे झकझोरा तो सहसा मैं जैसे एक बहुत गहरे कुऍ से बाहर आई। दो पल को तो समझ ही नहीं आया, मैं हूँ कहाँ...फिर एक झटके ...

    दस दरवाज़े - 20
    by Subhash Neerav
    • (5)
    • 46

    जब भी वक्त मिलता है, रोजमरी बातें करने लग पड़ती है। मेरी पत्नी को तो मानो वह बातें करने के लिए तलाशती ही रहती है। परंतु पत्नी की अंग्रेजी ...

    आसपास से गुजरते हुए - 3
    by Jayanti Ranganathan
    • (1)
    • 27

    मेरी आई निशिगन्धा नाइक महाराष्ट्र की सारस्वत ब्राह्मण थीं। पुणे में उने बाबा थियेटर कम्पनी चलाते थे। आई भी थियेटर में काम करती थीं। उनका पूरा परिवार नाटक में ...

    खुशियों की आहट - 7
    by Harish Kumar Amit
    • (4)
    • 34

    अगले दिन शाम के छह बजे के आसपास मोहित क्रिकेट खेलने जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि दरवाज़े की घंटी बजी. कुछ पल बाद दरवाज़ा खोलने ...

    खास बात
    by Mamtora Raxa
    • (5)
    • 30

      खासबात                                           आईने में देखकर वह मन ही मन अपने सौंदर्य को देखकर खुश हो रही थी, खुश क्यों न हो टाईट जिन्स और पिंक कलर कलर ...

    पल जो यूँ गुज़रे - 5
    by Lajpat Rai Garg
    • (4)
    • 68

    जिस दिन निर्मल घर वापस आया, दोपहर में सोने के बाद माँ को कहकर जितेन्द्र से मिलने के लिये जाने लगा तो सावित्री ने उसे बताया — ‘मैं बन्टु ...

    दस दरवाज़े - 19
    by Subhash Neerav
    • (3)
    • 41

    हम वैंबले की विक्टोरिया रोड पर खड़े हैं। मैं नक्शा खोलकर ट्रैवलर्ज़ कैम्प दीखने जैसी जगह खोज रहा हूँ। जैकलीन ने ही मुझे बता रखा है कि जिप्सियों को ...

    सैलाब - 1
    by Lata Tejeswar renuka
    • (2)
    • 31

    शतायु पलंग से उठ कर बैठा। नींद न आने के कारण वैसे भी परेशान था, ऊपर से गरमी। कुछ देर पहले ही बिजली गुल हो गई थी। आधी रात ...

    लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 2
    by Neelam Kulshreshtha
    • (6)
    • 69

    कावेरी को जयपुर अपने घर आये उन्नीस बीस दिन हो चुके हैं लेकिन ऐसा लगता है दिल व घर दोनों खंडहर बन गये हैं। । एक जानलेवा सूनेपन का ...

    वसीयत
    by Namita Gupta
    • (25)
    • 167

            रेखा घर के कामों में व्यस्त थी । तभी बाहर बड़ी तेजी से कोलाहल उठा । लगता आज फिर किसी के यहां कुछ झगड़ा हो ...

    रिश्ता प्यार का
    by Savita Mishra
    • (5)
    • 59

    “घर में अकेले परेशान हो जाती हूँ | न आस न पड़ोस | न नाते रिश्तेदार |”“सुबह-शाम तो मैं रहता ही हूँ न !”“हुह ..सुबह जल्दी भागते हो और देर ...

    पश्चाताप - 1
    by Meena Pathak
    • (17)
    • 258

    अमिता फूट फूट कर रो रही थी अब उसे अपने किये पर पश्चाताप हो रहा था शायद उसे उन बुजुर्गों की हाय लगी थी जिसे ...

    उदास क्यों हो निन्नी...? - 2
    by प्रियंका गुप्ता
    • (4)
    • 48

    आज सोचती हूँ, उस दिन अनुज दा मुझे समझाते तो शायद एक अनजान रास्ते पर यूँ बढ़ते मेरे कदम रुक गए होते, पर अनुज दा की ज़बान पर ताला ...

    लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 1
    by Neelam Kulshreshtha
    • (1)
    • 48

    ``ऑनलाइन जर्नलिस्ट अवॉर्ड गोज़ टु प्रिशा पटेल फ़ॉर हर राइट अप `यूज़ ऑफ़ सेनेटरी नेपकिन्स एन्ड हाइजीन इन वीमन ऑफ़ विलेजेज़। ``शी मीडिया के पुरस्कार समारोह में घोषणा होती ...

    दूसरी का चक्कर
    by r k lal
    • (32)
    • 311

    “दूसरी का चक्कर” आर 0 के 0 लाल           उनके घर के सामने बड़ी भीड़ लगी  हुई थी। सभी लोग इंतजार कर रहे थे कि चंदन की बॉडी ...

    आसपास से गुजरते हुए - 2
    by Jayanti Ranganathan
    • (3)
    • 33

    रात के बारह बजने को थे। मैंने फुर्ती से अलमारी से वोद्का की बोतल निकाली और दोनों के लिए एक-एक पैग बना लिया, ‘नए साल का पहला जाम, मेरी ...