bird's message in Hindi Animals by DINESH KUMAR KEER books and stories PDF | पंछी का संदेसा

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पंछी का संदेसा

एक दिन मैं शाम को जब बाहर घूम रहा था, तभी मेरी नजर खेत के नीम पर बैठी एक चिड़िया पर गई । मैंने सोचा चलो एक इसका तस्वीर लेते है ।मैंने तस्वीर लिया गया, मैं उसके थोड़ा और पास गई वो फिर भी शांत बैठी रही, मैं थोड़ा और पास गया, वो तब भी बैठी रही, अब मेरे और उसके बीच में बस दो इंच का अन्तर रह गया था वो तब भी नहीं उड़ी । तभी मैंने देखा कि वो तो एक चिड़िया का बच्चा है ।अब शाम भी हो रही थी, और चारों तरफ अंधेरा छा रहा था, पर वो चिड़िया का बच्चा वहीं बैठा था । मैं कुछ देर तक आस - पास घूमता रहा तो शायद वो उड़ जाए पर वो तो बस एक जगह से हिल नहीं रहा था । तभी मैंने सुना की उसकी मां चिड़िया भी चहचहाट कर रही थी । लेकिन अब रात हो चली थी और उस खेत में बिल्लियां भी आ जाती है और कभी कभी कुत्ते भी घूमते है, तो मैंने सोचा कि क्यों ना मैं इसको अपने घर ले जाऊं ।
अब सवाल ये था कि उसको पकड़ेगा कैसे, क्योंकि मैंने कभी चिड़िया नहीं पकड़ी थी । तभी वहां पर एक छोटा सा बच्चा अपने पापा के साथ आया और वो भी उसको देखने लगा, उसने अपने पापा को बोला की इस चिड़िया को हम अपने घर ले जाते है पर उसके पापा ने मना कर दिया ।
अब तक मैंने सोच लिया था कि मैं इसको ले जाऊंगा । पर जैसे ही मैंने उसको हाथ लगाया वो अपने पंख फड़फड़ा कर उड़ी, पर वो नीम से उड़कर जमीन पर आ गई । मैंने उस बच्चे से बोला कि अपने घर से जल्दी से कोई बॉक्स लेकर आ जाए, वो भागकर गया और एक बॉक्स लेकर आ गया । फिर मैंने एक छोटे से कपड़े से चिड़िया को पकड़ा और घर ले आया ।
वो छोटी से चिड़िया अभी डरा हुआ था और शायद अपनी मां को भी खोज रहा था पर पता नहीं उसकी मा अब कहा चली गई थी, पर में सोच रहा था कि काश वो उसको ढूंढ़ते हुए मेरे घर (अनीश निकेतन) की बालकनी मैं आ जाए पर शायद अब ये संभव नहीं था क्योंकि मैंने सुना था कि जब एक बार इंसान किसी पक्षी के बच्चे या अंडे को छू लेता है तो चिड़िया संक्रमण के डर से यूं बच्चो और अंडो को त्याग देती है । तो अब इस चोटी सी बेबी चिड़िया को मुझे ही देखना था ।
जब में उसको घर में लाया तो मेरी पत्नी का बर्ताव,' अब ये क्या उठा लाये, क्योंकि उनके अनुसार मै कभी खरगोश को उठा लेता या कभी किसी और जानवर को...
चलो कोई बात नहीं । अब आगे क्या किया जाए, मैंने सोचा । तब मैंने सोचा कि इसको क्या खिलाया जाए क्योंकि अभी तक में चिडियों के बारे में कुछ नहीं जानती थी, फिर मैंने नेट पर खोजा, मनुष्य ने नेट भी क्या चीज बनाया है जो भी खोज करो मिल जाता है । तब मुझे पता चला कि ये गौरय्या नाम की चिड़िया है और ये सब कुछ खा सकती है । तो मैंने उसको रोटी - दूध में मिलाकर छोटी चिमटी से खिलाया और ये क्या उसने अपनी चोटी सी चोंच खोल दी और मैंने उसको खाना खिला दिया । फिर उसने पौने घंटे बाद फिर खाना मांगा मैंने फिर उसको खिला दिया । अब उसके बाद वो रात भर आराम से बॉक्स में सो गई ।
 
 
दूसरा दिन...
अगले दिन सुबह पांच बजे मैंने उसके बॉक्स को बाहर निकाल कर बालकनी मैं रख दिया और वो आराम से वाह बैठी रही । सुबह - सुबह खूब शोर मचा रही थी और वो चहचहा रही थी, फिर मैंने उसको बिस्किट खिलाया तो उसने वो बहुत चाव से खाया ।
अब मैंने सोचा कि कब तक ये बॉक्स मैं बैठी रहेगी तो मैंने उसके लिए एक झूला बनाया और उसको उसमे बिठा दिया, वो बड़े आराम से बैठ गई और चारो तरफ का निरिक्षण लेती रहीं, पर बीच - बीच में हर आधे घंटे बाद उसको कुछ खाने को चाहिए था, तो साहेब इसका मतलब किं मुझे एक फुल टाइम काम मिल गया था चिड़िया को संभालने का ।
चिड़िया के घर में आने के बाद मेरी छोटी सी स्वीटी (छोटी मादा खरगोश) को भी अचरज हुई ये क्या जीव है । वो भी बार - बार आके उसको देखती थी फिर पीछे हट जाती थी । पर उसको भी समझ में आ गया था कि ये घर में कोई नया प्राणी है और मुझे उसको कोई नुकसान नहीं पहुंचना है ? और इस तरह से मेरा दूसरा दिन उस चिड़िया के साथ कहा खत्म हो गया पता ही नहीं चला पर ये भी एक नया अनुभव था ।
 
 
तीसरा दिन...
दूसरे दिन रात को भी वो आराम से सोई । और सुबह - सुबह उठ कर खाना मांगना शुरू करने लगी थी और शोर भी खूब करने लगी थी । अब शायद वो मुझे पहचानने लगी थी, अगर में थोड़ी देर तक नहीं आता था तो वो बालकनी मैं शोर मचाने लगती थी, अब तक वो मेरी बेटे (अनीश) को भी पहचान गई थी क्योंकि वो भी उसको अक्सर खाना खिलाता था ।अब ये नन्ही चिड़िया बालकनी मैं नीचे आके भी खेलने लगी थी और मुझे हमेशा ये डर रहता था की ये कही बाहर ना उड़ जाए, क्योंकि अभी उसको ठीक से उड़ना नहीं आता था ।
फिर दिन वो अब आराम से बैठी थी तो मैं भी अंदर आ गया और जब एक घंटे के बाद बाहर आया तो देखा कि चिड़िया गायब । मैंने चारों तरफ देखा पर वो कहीं नजर नहीं आई । मुझे बड़ा बुरा महसूस हुआ की पता नहीं कहा चली गई, पर थी तो वो एक चिड़िया ही और उसको उड़ कर जाना ही था, तो मैंने अपने आप को समझा लिया,
कुछ देर बाद मैंने बाहर झांका और चिड़िया को आवाज़ लगाई इस उम्मीद मैं कि शायद वो आसपास ही हो और मेरी आवाज़ सुनकर आ जाए, पर यह क्या...
उसने भी वापिस आवाज़ लगाई, मैंने उसको बुलाया, उसने भी जवाब दिया...
फिर में चारो ओर नजर दौड़ाया और देखा तो वो सामने वाले पेड़ पर बैठी हुई है और मेरे आवाज़ लगाने पर अपने चोंच खोल लेती हैै । मुझे लग रहा था कि वो भूखी है, और खाना मांग रही है, पर मैं कैसे दू उसको खाना । फिर मैं उसको बहुत बुलाया और वो धीरे - धीरे मेरी आवाज़ की तरफ आने लगी । पर ये क्या...
वो हमारी बालकनी मैं आने के बजाय नीचे चली गई, क्योंकि वो ऊंची उड़ान नहीं भर पा रहीं थीं । मैं झट से नीचे भागा और देखा कि वो फिर गायब...
लेकिन जब मैंने उसको आवाज़ दी तो वो भी कुछ बोली तो मैंने देखा कि वो नीम में अंदर फंसी हुई है । मैंने आवाज़ दी तो फड़फड़ाती हुई बाहर निकली और मेरे पास आ गई । वो पल भी क्या पल था, लग रहा था कि मैंने कुछ खास पा लिया है, और मैं उसको फिर वापस उसको अपने घर ले आया । उस दिन शाम को वो आराम से रही ठीक से खाना, खाया - पिया और रात को सो गई ।
 
 
चौथा दिन...
अगले दे वहीं समान शुरूआत । आज जब मैं इस चिड़िया के झूले के नीचे सफाई कर रहा था तभी अचानक वो उड़कर मेरी गर्दन पर बैठ गई । ओह वो एहसास...
मैंने झटक कर उसको अपनी गर्दन से नीचे उतारा । शायद वो भी डर गई थी और सच बताऊ तो मैं भी डर ही गया था...
दिन में वो हर एक घंटे में खाना मांगती थी और हम सब उसकी सेवा में लगे हुए थे और सच बताऊं तो हम सब उसके साथ मनोरंजन कर रहे थे।
अब वो बालकनी मैं थोड़ी आगे तक चली जाती थी, पर जब भी मैं उसको आवाज़ लगता तो वापस भी आ जाती थी । फिर अचानक दिन में वो फिर से चली गई तो मैंने सोचा कि आज मैं उसको नहीं खोजने जाऊंगा । अब मैंने सोच लिया था कि अब गयी तो गयी क्योंकि वो एक चिड़िया ही तो थी और उसको उड़ जाना ही था ।
उस दिन जब दोपहर को में बाज़ार जानें के लिए नीचे गया तो अचानक मुझे एक जानी पहचानी सी आवाज़ आई...
अरे ये तो मेरी चिड़िया कि आवाज़ थी...
मतलब वो यही - कही, आस - पास थी । मैंने उसको आवाज़ लगाई तो उसने ज़ोर - ज़ोर से चहचहाट शुरू कर दिया, मैंने देखा कि वो पास में ही ज़मीन पर बैठी हुई थी, और मुझे देखकर उसने जो चहचहाट शुरू किया तो बस पूछो ही मत...
अब फिर से मैं एक बार उसको अपने घर ले आया और फिर वो पूरे दिन आराम से रही और खाना - पीना किया गाना गाया और रात में सो गई ।आजकल मैं उसको रात में भी बाहर झूले पर ही सुला रहा था और वो भी आराम से थी...
 
 
पांचवा दिन...
आज सुबह से ही नन्ही चिड़िया कुछ सुस्त सी दिख रहीं थीं । पर मैंने सोचा की ये मेरा भ्रम होगा । फिर उसने खाना खाया और सो गई । आज उसकी आवाज़ में भी वो जोश नहीं लग रहा था ।
आज जब में दिन में घर के अंदर थी तो वो झूले से कूदकर बलकनी के दरवाजे को खटखटाने लगी । अब तक उसको पता चल चुका था, कि ये सब लोग इसी दरवाजे से बाहर आते है, तो यही से बुलाया जाए । कितनी समझ हो गई थी, उस नन्ही सी चिड़िया को ।
तो दिन तो ठीक से निकला हो गया और शाम हो गई और शाम को वो खाना खाकर सो गई । कुछ देर बाद बहुत ज़ोर से आंधी आने लगी और मैंने उसको उठा कर अंदर रख दिया और मैं फिर रसोई मैं आकर खाना बनाने लगा और हम सब खाना पीना करके टीवी देखने लगे कि अचानक मेरा बेटा चिलाया...
पप्पा...
ये देखो चिड़िया को क्या हुआ, ये ठीक से खड़ी नहीं हो पा रही । में भाग कर उसके पास गया तो देखा कि वाकई में वो बहुत कमजोर लग रही थी और खड़ी नहीं नहीं हो पा रही थी । मैंने उसको अपने हाथो में ले लिया और उसको आवाज़ लगाई तो उसने अपनी छोटी सी चोंच को खोल दिया...
उफ़ कितना दर्दनाक मंजर था...
मैंने उसकी चोंच में दो बूंद पानी की डाल दी । मैं उसकी धड़कन महसूस कर पा रहा था कि अचानक उसने अपनी चोंच बंद कर ली और उसकी आंखे भी बंद होने लगी और कुछ ही पलों में उसके प्रणनपखेरू उड़ गए और मेरी हथेलियों में उसका सिर्फ प्यारा सा शरीर रह गया...
मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ और क्या नहीं...
अचानक से कैसे...
अभी कुछ देर तक तो ठीक थी फिर क्यों...
पर लगा उसका मेरे साथ इतना ही वक़्त बिताना लिखा था...
ईश्वर से इतनी ही प्रार्थना करता हूँ की उसको अगले जन्म में कुछ अच्छा सा जीव बनाना और हमेशा खुश रखना।