Three letters in Hindi Thriller by Manoj yadav books and stories PDF | तीन ख़त

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तीन ख़त

(पहला ख़त - The first letter)

प्रिय शालिनी,

एक ही चाँद को निहारते हुए, क्या दो अजनबी लोगों के बीच कोई रिश्ता होता है?

अगर नहीं, तो हमारा भी कोई रिश्ता नहीं है।
फिर भी, तुम मुझे कभी अजनबी नहीं कह पाओगी।

पूरी ज़िंदगी मैंने तुम्हें दूर से देखा है। ये चेहरा, ये आँखें, ये कद-काठी, ये मासूमियत।

सुंदर लड़कियों में अक्सर गुरूर होता है, और कम सुंदर में लालसा। तुममें दोनों ही नहीं था।

तुमने कभी खुद को तवज्जो नहीं दी और वही तुम्हारी असली ख़ूबसूरती थी। बिल्कुल वही लड़की थी तुम, जिसे माता-पिता तुरंत पसंद कर लेते हैं।

मुझे आज भी याद है, जब तुम पहली बार मेरी नज़र में आई थीं।

तब तुम्हारे बाल इतने लंबे नहीं थे। माथे पर एक लट बार-बार आकर टिक जाती थी और तुम हर कुछ मिनट में उसे कान के पीछे कर देती थीं। तुम्हें शायद ये बात याद भी न हो।

मुझे है।

मुझे तुम्हारी बहुत-सी बातें याद हैं।

तुम्हें बारिश पसंद थी, लेकिन बारिश में भीगना नहीं।
तुम चाय में चीनी कम डालती थीं। ठंडी हो जाने पर भी उसे फेंकती नहीं थीं।

तुम किसी से नाराज़ होती थीं तो सामने से कुछ नहीं कहती थीं। बस थोड़ी देर के लिए चुप हो जाती थीं।

और जब तुम्हें बहुत ख़ुशी होती थी, तब भी तुम ज़्यादा नहीं हँसती थीं।

बस आँखें हँसती थीं।
शायद इसीलिए मुझे तुम्हारी आँखें सबसे ज़्यादा पसंद थीं।

दिन-रात मैंने तुम्हारी ज़िंदगी ख़्वाबों में जी है।

तुम्हारे छोटे-छोटे सुखों में खुश हुई हूँ। तुम्हारी छोटी-छोटी परेशानियों में बेचैन हुई हूँ।

कभी-कभी सोचती थी, काश तुम मुझे जानतीं।
फिर डर जाती थी।
कहीं तुम मुझे पहचान लेतीं तो?

सोचती हूँ, कैसे तुम शर्मा के सिमट गई होगी, जब हेमंत तुम्हारा हाथ माँगने आया होगा। उसकी भूरी आँखों का जादू तुम पर नहीं चलेगा, ऐसा तुमने दिखाया होगा।

नंबर देने से पहले थोड़ा इतराई तो होगी।

“मम्मी, मुझे शादी नहीं करनी है अभी…” — झूठी उलझन दिखाते हुए तुमने ख़ुशी के आँसू छिपाए होंगे।

शादी के दिन लाल साड़ी में कैसी लग रही होगी तुम?

बहुत सुंदर।

शायद उतनी ही सुंदर, जितनी मैंने तुम्हें अपनी कल्पना में देखा था।

रोई भी थी विदाई पर, या नहीं?
मुझे लगता है रोई होगी।

तुम्हें अपने घर से बिछड़ना पसंद नहीं था।

वैसे, थोड़ी मोटी हो गई हो तुम पहले से। कमर की चर्बी बताती है कि पति अपने हाथों से खिलाता है।

अच्छा है।

हेमंत तुम्हारा ख़याल रखता है।

क्या सच में जुड़वाँ बच्चे हुए थे, या ये सिर्फ़ मेरा सपना था?

मुझे धुँधला-सा याद आता है, जैसे तुम्हारे सास-ससुर ख़ुशी से पागल हो गए थे।

और मेरा हेमंत… वो तो मिठाई लेकर चारों तरफ़ दौड़ रहा था।

तुम्हें याद है ना, शालिनी?

या शायद तुम्हें याद नहीं।

घबराना मत, ये मेरी आदत है। जो मुझे पसंद आता है, उसे मैं अपना कह देती हूँ।

जैसे मेरा चाँद, मेरे माता-पिता,

और उसी तरह मेरा हेमंत।

तुम सोच रही होगी कि मुझे तुम्हारे बारे में इतना सब कैसे पता है।

मत सोचना।

कुछ सवालों के जवाब मिल जाएँ तो कहानियाँ ख़त्म हो जाती हैं।

और मुझे तुम्हारी कहानी अभी ख़त्म नहीं करनी।

वैसे, अगली बार तुम्हें एक ऐसी बात बताऊँगी जो शायद तुम्हें याद भी नहीं होगी।

लेकिन मुझे बिल्कुल याद है।

बहुत साफ़।

बाकी की बातें अगले ख़त में बताऊँगी।

तब तक ख़याल रखना उसका।

बहुत अच्छे से।

आख़िरकार…
वो मेरा भी तो है।

तुम्हारी,
अजनबी