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(रात का सन्नाटा... हवाओं में ठंडक है।आसमान काला, बिजली की चमक रह-रहकर चारों ओर फ...
पंडित जी ने एक पल का विराम लिया, हवा अचानक और ठंडी हो गई। उन्होंने गरजते हुए कहा...
डर – आचार्य प्रशांत समीक्षा: समझें, और बढ़ें निडरता की ओर..आचार्य प्रशांत की प...
शहद की गुड़िया - प्रकरण 79 " हर...
स्टेशन पर उस दिन बहुत भीड़ थी।लोग अपने-अपने सामान के साथ भाग रहे थे। किसी को ट्र...
The Quiet Strength of Respect“True character is revealed not by how a person tre...
ભાગ – ૩ : "તારી પાછળ પાછળ"આ ભાગ–૨ ની આગળની વાર્તા છે.કરન સાથેની મુલાકાત પછી આનિય...
वह आखिरी सुबहनीलगढ़ की सुबह कभी रोशनी के साथ नहीं आती थी। यहाँ सवेरा किसी पुराने...
मेरी एक राजकुमारी जैसी आलीशान और बेफिक्र जिंदगी, महज़ एक ही पल में एक अदने से भि...
પ્રેમ જ્યારે આત્માને સ્પર્શે છેસાંજના સૂર્યના છેલ્લાં કિરણો આકાશને કેસરી રંગથી ર...
'जैकब्स हॉस्टल' के बाहर सन्नाटे को चीरती हुई बर्फीली हवाएं चल रही थीं। छुट्टियों का सीजन था, इसलिए जो हॉस्टल कभी 500 लड़कों के शोर से गूँजता था, आज वहाँ मुर्दा शांति पसरी थी...
मुंबई की उस रात में उमस नहीं, एक दम घोटने वाली खामोशी थी. उपनगर की एक तंग गली के आखिरी छोर पर स्थित उस जर्जर इमारत का कमरा नंबर सत्रह, किसी जिंदा कब्र जैसा लग रहा था. घडी की सुइयां...
" इच्छा... तुम... नहीं नहीं तुम मेरी इच्छा नहीं हो सकती... " जोरो से हॅसते हुए आवाज गूंजती है.... " सही पहचाना में तेरी इच्छा नहीं हूँ मै.. वो हूँ जो तू सोच भी नही...
कुछ यादें अचानक गायब नहीं होतीं। वे बस धीरे-धीरे पीछे खिसक जाती हैं, इस तरह कि हमें लगता है हमने ही उन्हें छोड़ दिया है। और जब वे लौटती हैं, तो शोर नहीं करतीं—बस चुपचाप अपनी जगह...
मुंबई की रातें— जो कभी हज़ारों सपनों की धड़कन हुआ करती थीं, वे अब अविन अविनाशी चौहान के लिए किसी रोमांच से नहीं, बल्कि एक खामोश मजबूरी से भरी थीं। यह नवंबर की उमस भरी रात थी; मरीन...
एक भयानक खोज दिल्ली की पुरानी लाइब्रेरी, जहां धूल से भरे शेल्फ़ और पन्नों की हल्की महक थी, रिया का पसंदीदा ठिकाना था। 22 साल की रिया, इतिहास की छात्रा थी, और उसे लगता था कि हर पुर...
रात इतनी गहरी थी कि चाँद की रौशनी भी शायद डर के छिप रही थी। बारिश की बूंदें पत्थरों पर जोर से गिर रही थीं, और हर तरफ सिर्फ अंधेरा था।यह कहानी है २२ साल के आरव की, जो कुछ ही समय पहल...
खामोश पेंटिंग की पहली साँस पुरानी गली की वह कला-दुकान हमेशा की तरह उस शाम भी आधी अँधेरे में डूबी हुई थी। बाहर बारिश की हल्की बूँदें पत्थरों से टकरा रही थीं और अंदर हवा में पुरान...
एक बार की बात है—निलेश, जय और पार्थ देर रात निलेश के घर पर पार्टी कर रहे थे। पार्टी खत्म होने के बाद जय और पार्थ अपने-अपने घर के लिए निकल पड़े। जय तो अपने घर पहुँच गया, लेकिन पार्थ...
આ વાર્તા અદ્વિક નામના એક લેખકની છે. જેણે જીવનમાં માત્ર નિષ્ફળતા અને અસંતોષ જ અનુભવ્યો હતો. તેનું મન શૂન્ય હતું. જાણે કે હજારો વર્ષોથી ઉજ્જડ રણ હોય. એક સાંજે જ્યારે તે પોતાના જૂના પ...
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