लेकिन ठंडी हवेली, मंडप सजाया गया है, गुलाबी और सुनहरी डेकोर के बीच शहनाई की हल्की धुन। समय: रात 11 बजे। लाल और सुनहरे फूलों से सजी जगह में शहनाई बज रही है। फूलों की खुशबू के बीच एक खामोशी है, जो सिर्फ लड़के और लड़की के बीच की अनकही दास्तान को बढ़ा रही है। Shristi (अंदर से सोच रही थी, आवाज़ धीमी और कांपती हुई) बोली - मैं... मैं क्यों आ रही हूँ? ये मेरी जिंदगी का सबसे डरावना दिन क्यों बन गया है?
Full Novel
ज़ख्मों की शादी - 1
लेकिन ठंडी हवेली, मंडप सजाया गया है, गुलाबी और सुनहरी डेकोर के बीच शहनाई की हल्की धुन।समय: रात 11 और सुनहरे फूलों से सजी जगह में शहनाई बज रही है। फूलों की खुशबू के बीच एक खामोशी है, जो सिर्फ लड़के और लड़की के बीच की अनकही दास्तान को बढ़ा रही है।Shristi (अंदर से सोच रही थी, आवाज़ धीमी और कांपती हुई) बोली -मैं... मैं क्यों आ रही हूँ? ये मेरी जिंदगी का सबसे डरावना दिन क्यों बन गया है?Shristi की आंखों में आंसू थे। वो अपने हाथ में जड़े हुए जोड़े को कसकर पकड़ रही थी। उसकी सांसें ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 2
मंडप, सजावट वही – लाल-सुनहरे फूल, सुनहरी रस्में, शहनाई की हल्की धुन।Shristi की आँखों में आशा की झलक आई ही उसने उस लड़के को देखा। और वो तुरंत उस लड़के की तरफ दौड़ पड़ी उसके पैरों से ताकत निकल गई और वह सीधे उस लड़के के सीने से चिपक गई।Shristi (foot-foot रोते हुए, काँपती हुई) बोली -कबीर जी… मुझे… मुझे बचाइए…ये...ये दरिंदा मुझसे शादी कर रहा है।Shristi का सिर उस लड़के के सीने से लगा हुआ था। उसकी सिसकियों में दर्द और राहत दोनों झलक रहे थे।Kabir Pratap SinghKabir ने ठंडी, पर गहरी आवाज़ में कहा। उसके शब्दों में ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 3
Kabir का घर – आलीशान लेकिन शांत, सुरक्षा के लिहाज़ से पूरी तरह व्यवस्थित। Kabir ने गाड़ी घर के पर रोक दी। वो घर में घुसा और सीधे उसे अपने bedroom में ले गया। उसने धीरे से Shristi को अपनी गोद से नीचे उतारा। घर के अंदर का माहौल शांत था।Shristi (कड़वी हँसी के साथ, कांपती आवाज़ में ) बोली -आप… मुझे फिर से घर ले ही आए। मन नहीं भरा ना आपका… मुझे दर्द देके। अभी भी कोई कसर बाकी रह गई क्या?Shristi की आँखों में डर और आक्रोश दोनों झलक रहे थे। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान, ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 4
Kabir अकेला लिविंग हॉल में बैठा था। उसकी आंखों में थकान और मन में बेचैनी थी। बाहर अंधेरा और थी, पर उसके दिल में हलचल थी।Kabir (धीमे, खुद से सोचते हुए) बोला -एक साल पहले… सब कुछ अलग था… सब कुछ इतना आसान और साफ़ था… अब देखो… एक ही लड़की… मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा झटका…।[Flashback: 1 साल पहले – Kabir का Office]एक साल पहले। Kabir अपने office में Senior Engineer के रूप में काम कर रहा था। Office में हल्की हलचल थी, कंप्यूटर की स्क्रीन की रोशनी में वह काम में व्यस्त था। Shristi उस समय नई ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 5
Present Time – BedroomShristi दूसरी तरफ मुंह करके बिस्तर पर लेटी थी। उसकी सांसें धीमी थीं, लेकिन उसका मन भी past memories में उलझा हुआ था। उसकी आंखों में खामोशी थी, पर मन में यादों की हलचल थी। Past का डर, नफरत और दर्द सब एक साथ लौट आए थे। Shristi की यादें अचानक उसे सुहागरात की रात की ओर ले गईं…Past Time – Suhagrat NightShristi अपने कमरे में बैठी थी। हर लड़की की तरह उसके भी सपने थे – हसीन, प्यार भरे, उसकी पहली रात की उम्मीदें।Kabir कमरे में आया। उसका चेहरा गंभीर, आँखों में नफरत साफ़ झलक ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 6
Past Time – Suhagrat Nightकमरा अंधेरे में था, हल्की मोमबत्तियों की रोशनी थी। फूलों की खुशबू थी, पर माहौल कोई खुशी नहीं थी। Kabir धीरे-धीरे Shristi के पास बिस्तर पर लेट गया। Shristi पहले से ही दर्द और तनाव से तंग थी। Kabir Shristi के पास लेटा, पर Shristi का pain अब बढ़ चुका था। शादी की पहली रात ही उसकी हालत इतनी खराब थी कि वह रोने लगी। Shristi उठकर बैठ गई। एक हाथ से सीने को दबा रही थी, और दूसरा हाथ सिर पर रखते हुए कराह रही थी।Shristi (कष्ट और दर्द में, रोते हुए) बोली -आह… ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 7
Present Time – Late Nightकमरे में फिर से सन्नाटा छा गया था। Kabir कुछ नहीं बोला। उसने Shristi की पीठ करके लेटने का नाटक किया, जैसे उसे मजबूर न करना चाहता हो। Kabir जानता था—अगर आज भी उसने ज़ोर डाला, तो Shristi पूरी तरह टूट जाएगी। काफी देर तक सिर्फ़ घड़ी की टिक–टिक और Shristi की सिसकियों की दबी आवाज़ सुनाई देती रही। Shristi ने करवट बदली। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। दिल और दिमाग़ दोनों थक चुके थे।Shristi (टूटती आवाज़ में, खुद से) बोली -मैं मजबूत नहीं हूँ… जितना दिखाती हूँ उतना बिल्कुल नहीं…।Kabir ने ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 8
Present Time – Late Nightकमरे में फिर से सन्नाटा छा गया था। Kabir कुछ नहीं बोला। उसने Shristi की पीठ करके लेटने का नाटक किया, जैसे उसे मजबूर न करना चाहता हो। Kabir जानता था—अगर आज भी उसने ज़ोर डाला, तो Shristi पूरी तरह टूट जाएगी। काफी देर तक सिर्फ़ घड़ी की टिक–टिक और Shristi की सिसकियों की दबी आवाज़ सुनाई देती रही। Shristi ने करवट बदली। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। दिल और दिमाग़ दोनों थक चुके थे।Shristi (टूटती आवाज़ में, खुद से) बोली -मैं मजबूत नहीं हूँ… जितना दिखाती हूँ उतना बिल्कुल नहीं…।Kabir ने ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 9
Past Time –उस दिन के बाद सृष्टि बदल गई थी…या यूँ कहें—वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटने लगी थी। सृष्टि रसोई खड़ी थी। हाथों में कढ़छी थी, लेकिन उंगलियाँ काँप रही थीं। नमक डालते वक्त भी उसका दिल धड़कता—कहीं ज़्यादा न हो जाए… कहीं कम न पड़ जाए।खाना बनाते वक्त भी वो डरती थी।।डरती थी कि कहीं कोई कमी न निकल आए…क्योंकि कमी का मतलब था—कबीर की खामोश, खतरनाक निगाहें।Kabir दरवाज़े के पास खड़ा था। बिना कुछ बोले उसे देख रहा था। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं—उससे भी ज़्यादा खतरनाक कुछ था… ठंडापन। जब Kabir सामने होता— सृष्टि का खून जैसे ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 10
Past Time – एक रातइतनी-सी गलतियों से कोई औरत अपने ही पति से नफ़रत नहीं करती…सृष्टि के साथ जो था, वो ‘गलती’ नहीं था—वो उसकी रूह पर लगा ज़ख्म था। सृष्टि गहरी नींद में थी। शरीर थका हुआ, दिल बोझिल। अचानक उसे अपने सीने पर अजीब-सा भारीपन महसूस हुआ। पेट में तेज़ ऐंठन उठी। दर्द ने उसे जगा दिया। उसकी आँखें खुलीं…और सामने—उसी इंसान का चेहरा था, जिसे वो अपना पति कहती थी।उस पल सृष्टि की जान जैसे हलक़ तक आ गई। उसकी सांसें रुकने लगीं। शरीर सुन्न पड़ गया। वो बोल नहीं पाई। हिल नहीं पाई। उस रात…जो ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 11
वॉशरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद था।सृष्टि की उँगलियाँ काँप रही थीं जब उसने किट को खोला। हर साँस लग रही थी, जैसे सीने पर कोई पत्थर रख दिया हो। उसने आँखें बंद कीं, माथा ठंडे टाइल्स से टिका लिया और ....खुद से वो फुसफुसाई—बस… नहीं होना चाहिए…कुछ पल ऐसे थे जो सालों जैसे लगे। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि कानों में शोर भर गया। फिर उसने आँखें खोलीं।नेगेटिव।उसकी पलकों पर अटका आँसू आखिरकार बह निकला—पर इस बार वो राहत का था। सृष्टि दीवार के सहारे बैठ गई। साँसें टूट-टूट कर निकल रही थीं, पर पहली बार ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 12
Past Timeसृष्टि ने ये बात कबीर को बताते हुए जैसे अपनी पूरी हिम्मत समेट ली थी। आवाज़ काँप रही आँखें झुकी हुई थीं।सृष्टि बोली -क… कबीर जी… मैं… मैं प्रेग्नेंट हूँ।कमरे में सन्नाटा भर गया। कबीर ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।बस ठंडे, सपाट लहज़े में बोला—बच्चा गिरा दो।बस…यहीं सृष्टि का सब्र टूट गया। उसकी आँखों में जो डर था,वो पल भर में आग बन गया।सृष्टि (गुस्से और टूटे हुए आत्मसम्मान के साथ) बोली -गिरा दूँ?!कैसे गिरा दूँ?!आप ऐसे बोल रहे हैं जैसे हमारा बच्चा नाजायज़ हो!वो काँप रही थी, पर अब डर से नहीं गुस्से से।सृष्टि बोली —हमारा ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 13
।Past Time – जब कबीर ने पहली बार जिम्मेदारी ओढ़ीउस दिन कबीर देर तक चुप रहा था। उसकी आँखों अब गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब-सी थकान…और कहीं गहराई में डर।वो धीरे-धीरे सृष्टि के पास गया। आज उसकी चाल में रौब नहीं था,आवाज़ में हुक्म नहीं था। बस भारीपन था।कबीर ने रुकते-रुकते कहा—जो हुआ… वो हो चुका है, सृष्टि।मैं उसे बदल नहीं सकता।सृष्टि ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। वो खिड़की की तरफ मुँह किए बैठी थी। आँखें सूखी थीं…शायद रो-रोकर थक चुकी थीं।कबीर ने आगे कहा—पर अब… अब मैं अपने बच्चे का ख्याल रखूँगा।ये शब्द सृष्टि के दिल ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 14
Past Time – जब सिस्टम भी दुश्मन बन गयाकबीर ने पहली बार कानून पर भरोसा करने की कोशिश की।उसने को सब बताया—धमकी भरे कॉल, पत्थर फेंकने की घटना, गैस लीक की साज़िश,और वो आदमी जो उसके बच्चे और बीवी की जान के पीछे पड़ा था। पर थाने में बैठा अफ़सर उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो कोई कहानी सुना रहा हो।Pollice वाला बोला -कोई सबूत है?कॉल रिकॉर्डिंग है?नाम-पता मालूम है?कबीर के पास सिर्फ डर था…और सृष्टि की काँपती हुई आँखें।एक अफ़सर ने कंधे उचकाते हुए कहा—बिना proof हम कुछ नहीं कर सकते।शायद कोई prank call हो।कबीर का सब्र ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 15
Past Time –सड़क के बीच खड़े गुँडे कबीर को घेर चुके थे। सृष्टि उनके हाथों में थी। उसके चेहरे साफ़ डर और आंसू थे। कबीर ने कदम पीछे हटा लिया। हर मांसपेशी तन गई थी। दिल तेजी से धड़क रहा था।आँखें जल रही थीं, गुस्सा, डर और बेचैनी का मिश्रण।तभी एक गुँडा भारी आवाज़ में बोला—चल! ये चाकू उठा…और अपनी बीवी के पेट पर मार दे।तेरा बच्चा मर जाएगा।कबीर की साँस थम गई। हाथ काँपने लगे। लेकिन उसने चाकू को हाथ भी नहीं लगाया।गुँडे ने फिर धमकी दी—अगर ऐसा नहीं किया, तो हम तेरी बीवी को ले जाएंगे।और फिर…तू ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 16
कबीर ने सृष्टि को तुरंत कार में बिठाया। उसका हाथ उसके हाथ में कसकर था। सृष्टि लगातार रो रही चेहरा दर्द और डर से तिरछा था।सृष्टि बोली -कबीर जी… दर्द… दर्द…उसकी आवाज़ काँप रही थी। कबीर ने गहरी साँस ली।वो बोला -मैं हूँ ना… बस मैं हूँ।उसने ड्राइव तेज़ कर दी। हाथ अपनी बाँह में कसकर पकड़ रखा था। कुछ ही मिनटों में वे अस्पताल पहुँच गए। सृष्टि दर्द से चीखती रही। कबीर ने उसे स्ट्रेचर पर धीरे से रखा।कबीर बोला -रुको, सब ठीक हो जाएगा।पर उसका खुद का दिल भी धड़क रहा था। डॉक्टर और नर्सें तुरंत दौड़ ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 17
Present time....कबीर सोफे पर अकेले बैठा था। चेहरा ठंडा, आँखें गंभीर। पर हाथ… हाथ से खून बह रहा था। एक बूंद जैसे उसके अंदर की दर्द और पछतावे की कहानी कह रही हो। दिल भारी था। दिमाग़ उलझा हुआ।सिर्फ़ एक ही ख्याल—सब कुछ… सब कुछ खो चुका हूँ।कबीर दीवार को घूर रहा था। नीली-सी चमक आँखों में। लाल-सा गुस्सा और कड़वाहट उसके चेहरे पर। हाथ से खून लगातार गिर रहा था। फर्श पर बिखरते ही एक अजीब सी ठंडी और खाली सी आवाज़ छोड़ रहे थे। तभी…सृष्टि धीरे-धीरे कमरे में आई। पलकों के नीचे आँसू थे, पर कदम सावधान ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 18
Present Time –सृष्टि सॉफे पर लेटी थी। चेहरा उदास, आँखें लाल। उसका दिल भारी था। धीरे-धीरे उसके मन में लौट आईं—Past Time –वो दिन जब सब कुछ टूट गया था। सृष्टि गुस्से में अपने कमरे में गई थी। दिल में आग और आँखों में आँसू। उसने अपना बैग उठाया।सब कुछ पैक करने लगी जैसे अब उसके लिए वहाँ कोई जगह ही न रही हो। कबीर कमरे में आया। चेहरा गंभीर, आँखों में डर और पछतावा।उसने धीरे से कहा—सृष्टि… रुको… कुछ भी करोगी तो नुकसान होगा।मैं हूँ ना… मैं सब संभाल लूंगा।पर सृष्टि ने उसका हाथ झटक दिया।वो बोली -मैं ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 19
सृष्टि शॉवर के नीचे फर्श पर बैठी थी। पानी लगातार उसके सिर, कंधों और शरीर पर गिर रहा था। उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वो बिल्कुल खामोश थी। इतनी खामोश कि जैसे उसके भीतर की सारी आवाज़ें थककर बैठ गई हों। उसकी आँखें खुली थीं…पर उनमें कोई चमक नहीं थी।वो बोली -क्यों हुआ ये सब?मेरी क्या गलती थी?हर गिरती हुई बूंद के साथ उसे फिर वही रातें याद आने लगीं—कबीर का गुस्सा…उसकी सख्त पकड़…सृष्टि का डर…उसकी बेबसी। उसका शरीर अनजाने में ही सिकुड़ने लगा। उसने अपने हाथों से खुद को ढक लिया, जैसे कोई खुद को बचाने ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 20
कबीर कुछ बोलने ही वाला था। उसके होंठ खुले…शब्द जैसे बाहर आने को तैयार थे।तभी सृष्टि की धीमी लेकिन हुई आवाज़ आई—मुझे कोई बात नहीं सुननी…Please… मुझे सोने दीजिए।Disturb मत कीजिए।उसकी आवाज़ थकी हुई थी। टूटी हुई। पर साफ़। कबीर जड़ हो गया। सृष्टि ने आँखें बंद रखीं, पर उसकी पलकों के कोनों से आँसू चुपचाप निकल आए।वो फिर बोली -वैसे भी…बहुत महीनों से आपने मुझे रातों को सोने नहीं दिया…बस दिया तो दर्द ही दिया…अपनी हैवानियत दी…ज़ख्म दिए…।हर शब्द जैसे कमरे की हवा को काट रहा था। कबीर की साँस रुक गई। सृष्टि ने करवट बदली। उसकी पीठ ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 21
सुबह का समय था। घर में अजीब सी चुप्पी थी।कबीर ने बिना बहस किए धीरे से कहा,सृष्टि… हमें डॉक्टर पास चलना चाहिए।सृष्टि ने विरोध नहीं किया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। वो थकी हुई लग रही थी। जैसे रात भर लड़ती रही हो…अपने ही डर से। कबीर उसे एक मनोचिकित्सक (psychiatrist) के क्लिनिक में ले गया।रिसेप्शन पर औपचारिकताएँ पूरी हुईं। फिर नर्स ने सृष्टि को अंदर बुलाया।डॉक्टर ने कबीर की ओर देखा और बोली—आप बाहर प्रतीक्षा कीजिए।मुझे सृष्टि से अकेले में बात करनी होगी।कबीर चुपचाप बाहर चला गया। पहली बार उसने बिना सवाल किए पीछे हटना सीखा। डॉक्टर के ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 22
पर कहानी यहीं शांत नहीं हुई। अतीत कभी-कभी दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आता, सीधे तोड़कर अंदर घुसता है। जिस जगह कबीर सृष्टि को निकालकर लाया था…वहाँ एक और कहानी अधूरी रह गई थी।एक नाम—विशम्बर नाथ।चालीस साल का। अहंकारी। पैसे और ताकत के दम पर रिश्ते खरीदने वाला।वही आदमी जिससे सृष्टि से ज़बरदस्ती शादी करने वाला था।वही आदमी जिसके दबाव, डर और हिंसा के बीच सृष्टि का गर्भ गिर गया था।उस दिन जब कबीर उसे वहाँ से लेकर गया, सबके सामने—विशम्बर नाथ की इज़्ज़त को ठेस पहुँची थी।और कुछ लोगों के लिए औरत से ज़्यादा अहम उनकी “इज़्ज़त” होती है।दूसरी तरफ…विशम्बर ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 23
सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल चुकी थी। सृष्टि अभी भी थोड़ी झिझकी हुई थी। वो उठकर बैठ बाल बिखरे हुए। चेहरे पर हल्की थकान। कबीर भी उठकर बैठ गया, पर उसने दूरी बनाए रखी। कुछ पल दोनों चुप रहे।फिर सृष्टि ने धीरे से कहा—कल रात… अगर आप नहीं होते…उसकी आवाज़ रुक गई। कबीर ने बीच में नहीं टोका। बस सुनता रहा।वो बोली -मुझे लगा था मैं फिर से… सब कुछ खो दूँगी।कबीर ने गहरी साँस ली।कबीर ने ने शांत स्वर में कहा -मैंने बहुत गलतियाँ की हैं,पर अब मैं तुम्हारी ढाल बनना चाहता हूँ… डर नहीं।सृष्टि ने ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 24
जहाँ सब कुछ धीरे-धीरे सामान्य होने लगा था…घर में फिर से हल्की हँसी सुनाई देने लगी थी…ऑफिस में काम पर आ रहा था…वहीं, एक सुबह सब कुछ फिर बदल गया।ऑफिस – दोपहरउस दिन सृष्टि office नहीं गई थी। कबीर गया था। कबीर मीटिंग में था। फोन साइलेंट पर। अचानक उसका असिस्टेंट घबराया हुआ अंदर आया।असिस्टेंट बोला -Sir… मैम का फोन आ रहा है… बार-बार।कबीर का दिल धक से रह गया। उसने तुरंत कॉल उठाई। दूसरी तरफ सृष्टि की टूटी हुई साँसें थीं।सृष्टि बोली -कबीर जी…उसकी आवाज़ काँप रही थी।वो बोली -घर के बाहर… मीडिया है…और… और…कबीर बोला -और क्या?वो ...Read More
ज़ख्मों की शादी - 25
सुबह की हल्की धूप परदे के किनारों से भीतर आ रही थी। सृष्टि की नींद धीरे-धीरे खुली। कुछ पल समझ नहीं आया वो कहाँ है। फिर उसे एहसास हुआ, वो कबीर की बाँहों में है।उसका सिर उसके कंधे पर टिका हुआ। कबीर की बाँह उसके चारों ओर, मजबूती से…पर नरमी के साथ।पहले जैसी घबराहट नहीं हुई। दिल नहीं धड़का बेकाबू होकर।साँस नहीं अटकी। क्योंकि आज उसकी पकड़ में दबाव नहीं था—ज़िम्मेदारी थी।सृष्टि ने हल्का सा सिर उठाया। कबीर अभी भी सो रहा था। उसका चेहरा शांत था। जैसे किसी पहरेदार की तरह रात भर जागता रहा हो। सृष्टि ने ...Read More