सुबह की हल्की धूप परदे के किनारों से भीतर आ रही थी। सृष्टि की नींद धीरे-धीरे खुली। कुछ पल उसे समझ नहीं आया वो कहाँ है। फिर उसे एहसास हुआ, वो कबीर की बाँहों में है।
उसका सिर उसके कंधे पर टिका हुआ। कबीर की बाँह उसके चारों ओर, मजबूती से…पर नरमी के साथ।
पहले जैसी घबराहट नहीं हुई। दिल नहीं धड़का बेकाबू होकर।
साँस नहीं अटकी। क्योंकि आज उसकी पकड़ में दबाव नहीं था—
ज़िम्मेदारी थी।
सृष्टि ने हल्का सा सिर उठाया। कबीर अभी भी सो रहा था। उसका चेहरा शांत था। जैसे किसी पहरेदार की तरह रात भर जागता रहा हो। सृष्टि ने महसूस किया उसकी बाँह कसकर नहीं, सुरक्षित तरीके से उसके इर्द-गिर्द थी।
जैसे पूछ रही हो—
यहीं रहना चाहती हो?
और वह रहना चाहती थी। कबीर की आँखें खुलीं। उसने एक पल को सोचा, क्या वो फिर से असहज हो जाएगी?
पर सृष्टि ने मुस्कुराकर कहा—
Good morning.
उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था। कबीर की साँस हल्की हुई।
कबीर बोला -
Good Morning…
उसने धीरे से पूछा—
मैं… ठीक से पकड़े हूँ ना?
सृष्टि ने हल्की हँसी के साथ कहा—
हाँ। अब आप पकड़ना जानते हो।
यह वाक्य सिर्फ़ बाहों के लिए नहीं था। यह रिश्ते के लिए था।
कुछ देर दोनों वैसे ही लेटे रहे। कोई जल्दबाज़ी नहीं। कोई झिझक नहीं। सृष्टि ने खुद उसकी शर्ट का कॉलर ठीक किया। फिर सिर वापस उसके सीने पर रख दिया। उसने उसकी धड़कन सुनी।
आज उसमें डर नहीं, सुकून था।
कभी वही बाँहें उसके लिए डर का कारण थीं। आज वही बाँहें
उसका सबसे सुरक्षित स्थान थीं। रिश्ते बदलते हैं, जब इंसान बदलता है। और उस सुबह दोनों ने महसूस किया, वे सिर्फ़ साथ नहीं हैं। वे सच में एक-दूसरे के हो चुके हैं। एक नई सुबह। एक नया भरोसा।
सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में फैल रही थी। बाहर पेड़ों पर बैठी चिड़ियों की चहचहाहट एक नई शुरुआत का एहसास करा रही थी।
आज संडे था… और घर में एक सुकून भरी शांति थी।
श्रृष्टि किचन में खड़ी थी। उसने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई थी , बाल ढीले से क्लच में बंधे थे। गैस पर चाय चढ़ी हुई थी, और वो धीरे-धीरे नाश्ते की तैयारी कर रही थी। उसके चेहरे पर आज घबराहट नहीं… बल्कि एक हल्की सी मुस्कान थी। उधर बाथरूम से पानी की आवाज़ आ रही थी। कुछ देर बाद कबीर तौलिया से बाल सुखाते हुए बाहर आया। उसने दूर से ही किचन में खड़ी श्रृष्टि को देखा…
कबीर (धीरे से, खुद से) बोला–
आज तो मैडम बहुत सीरियस लग रही हैं… या कुछ प्लान है?
वो चुपचाप उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया।
सृष्टि (बिना पीछे देखे) बोली–
इतनी धीरे मत आइए… सुनाई दे जाता है।
कबीर हल्का सा मुस्कुराया –
तो फिर बुला लेती… खुद आ जाता।
श्रृष्टि पलटी। उनकी नज़रें मिलीं। कुछ पल दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
सृष्टि (थोड़ा संकोच, मगर नरमी से) बोली–
Sunday है… आज ऑफिस नहीं है… तो सोचा… थोड़ा साथ में टाइम बिताएं।
कबीर उसकी ओर एक कदम और बढ़ा।
कबीर बोला–
मैं तो हमेशा से तैयार हूं… बस तुम्हारा इंतज़ार था।
उसने आगे बढ़कर गैस बंद की और चाय कप में डाल दी।
सृष्टि बोली–
पहले नाश्ता… फिर बातें।
कबीर (चाय लेते हुए) बोला -
और अगर मैं कहूं… बातें पहले?
श्रृष्टि ने हल्की सी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।
सृष्टि बोली–
अब जिम्मेदारी से पकड़ते हो… तो थोड़ा हक भी मिलता है।
कबीर की आंखों में वो बात उतर गई। उसने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
कबीर बोला–
मैं वादा करता हूं… हर दिन तुम्हें ऐसे ही संभालूंगा।
किचन की खिड़की से आती धूप अब दोनों के चेहरों पर पड़ रही थी। आज पास आने की चाहत थी… मगर जल्दबाज़ी नहीं।
आज रिश्ता सिर्फ करीब नहीं… मजबूत भी हो रहा था।
कबीर ने सृष्टि को अपनी बाहों में संभाल कर पकड़ा हुआ था… लेकिन इस बार उसके स्पर्श में अधीरता नहीं, सुकून था। सृष्टि ने धीरे-धीरे उसके होंठों पर अपना प्यार रख दिया। उसकी धड़कनें तेज थीं… पर डर से नहीं… एहसास से।
कबीर ने उसकी आँखों में झाँका और बोला—
सृष्टि… sure हो?
सृष्टि ने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया और बोली—
अब डर नहीं लगता… क्योंकि अब आप मेरे अपने हो… ज़बरदस्ती नहीं… मेरा सहारा।
कबीर ने उसके माथे को चूमा। उसने उसे पास खींचा, पर इस बार हर स्पर्श पूछकर… हर नज़दीकी इज़ाज़त से।
सृष्टि उसके सीने पर सिर रखकर बोली —
मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया… पर उससे भी ज़्यादा… मैंने खुद को आज़ाद कर दिया।
कबीर की आँखें भर आईं।
कबीर बोला -
मैं हर दिन तुम्हारा भरोसा जीतना चाहता हूँ… फिर से…धीरे-धीरे…।
कमरे में खामोशी थी…पर वो खामोशी बोझिल नहीं थी… वो दो टूटे हुए दिलों के जुड़ने की खामोशी थी। कबीर ने उसके गालों, आँखों और माथे पर छोटे-छोटे प्यार भरे kisses दिए। सृष्टि ने भी उसे कसकर पकड़ लिया…उस दिन उनके बीच कोई जल्दबाज़ी नहीं थी…कोई हक जताना नहीं था…बस दो लोग थे… जो एक दूसरे को फिर से अपना रहे थे। और पहली बार…उनकी नज़दीकियाँ दर्द की नहीं… भरोसे की थीं।
Kabir की ज़िंदगी का सबसे अनमोल तोहफ़ा अब उसे समझ आ चुका था — उसकी पत्नी, उसकी सृष्टि।
वो सिर्फ उसका प्यार नहीं थी… वो उसकी जिम्मेदारी, उसका सुकून और उसका सबसे बड़ा विश्वास थी।
उस रात… जब दोनों बिना किसी डर, बिना किसी दबाव के एक-दूसरे के करीब आए… कमरा शांत था। खिड़की से आती हल्की चाँदनी…और सृष्टि की धीमी-सी सिसकियाँ… लेकिन वो सिसकियाँ दर्द की नहीं थीं…वो एक लंबे डर के खत्म होने की थीं।
वो उस भरोसे की थीं जो धीरे-धीरे वापस लौटा था। कैमरा धीरे-धीरे धुंधला हो जाता है…।
सुबह हुई। हल्की धूप पर्दों से छनकर कमरे में आई। सृष्टि की आँख खुली…वो फिर उसी एहसास के साथ जागी…पर इस बार उसके अंदर घबराहट नहीं थी। पहले जब ऐसा हुआ था…
वो कांप गई थी…Kabir को देखते ही खुद को कम्बल में लपेट लिया था…उसकी आँखों में डर था…।
लेकिन आज… आज वो Kabir की बाहों में थी। उसका हाथ उसकी कमर पर था… और सृष्टि ने खुद को उससे अलग नहीं किया। उसने धीरे से उसकी ओर देखा। Kabir की नींद अभी टूटी नहीं थी। सृष्टि के गालों पर हल्की-सी लाली आ गई। वो शर्माई… पर डरी नहीं। उसने धीरे से Kabir की उँगलियों को थामा…
और पहली बार बिना झिझक उसके सीने पर सिर रख दिया।
Kabir की नींद खुली। उसने देखा — सृष्टि दूर नहीं गई थी।
उसने बहुत धीरे कहा -
Good morning…
सृष्टि ने आँखें झुकाईं और बोली—
Good morning…
उसकी आवाज़ में हल्की-सी शरमाहट थी…पर अब उसमें टूटन नहीं थी।
Kabir ने उसके माथे को चूमा और बोला—
Thanks… trust करने के लिए।
सृष्टि ने उसकी तरफ देखा और बोली—
Thanks… respect करने के लिए।
और उस सुबह…उनके बीच सिर्फ शरीर का नहीं…दिल का रिश्ता पूरा हुआ था।
सृष्टि ने करवट बदली… और कल रात की सारी बातें उसकी यादों में तैरने लगीं। उसके गाल अपने आप लाल हो गए। दिल की धड़कन हल्की-सी तेज हो गई। लेकिन इस बार वो यादें उसे तोड़ नहीं रही थीं…बल्कि उसे भीतर से पूरा कर रही थीं।
वो धीरे से उठी, वॉशरूम गई…और कुछ देर बाद उसके हाथ काँप रहे थे। उसकी आँखें उस छोटी-सी स्ट्रिप पर टिक गईं।
Pregnancy Test — Positive।
कुछ सेकंड तक वो वहीं खड़ी रही। आँखों में आँसू आ गए…
डर के नहीं…खुशी और विश्वास के। वो बाहर आई। कबीर अभी भी बिस्तर पर बैठा था, उसे ढूँढ रहा था।
कबीर बोला -
सृष्टि… सब ठीक है?
सृष्टि ने बिना कुछ कहे टेस्ट उसके हाथ में रख दिया। कबीर ने पढ़ा…पहले उसे समझ नहीं आया…फिर जैसे ही शब्द दिमाग में साफ हुए —
वो बोला -
सृष्टि… ये… सच?
उसकी आवाज़ काँप गई। सृष्टि ने धीरे से सिर हिलाया।
आँसू उसके गालों पर बह निकले। अगले ही पल कबीर ने उसे अपनी बाहों में उठा लिया।
कबीर बोला -
मैं पापा बनने वाला हूँ…?
उसकी आँखें भीग गईं। उसने सृष्टि के माथे, गाल, हाथ — सब पर प्यार बरसा दिया।
उसने फुसफुसाया -
Thank you…
सृष्टि ने उसके सीने पर सिर रख दिया और बोली—
ये हमारा है… हमारा प्यार…
उस दिन से कबीर बदल गया। वो ऑफिस जाते समय उसे दवा देकर जाता। उसके खाने का टाइम सेट करता। खुद किचन में खड़ा होकर उसके लिए फल काटता। रात को बार-बार उठकर देखता कि वो ठीक से सो रही है या नहीं।
वो बोलता -
सीढ़ियाँ धीरे उतरना…
ज़्यादा देर खड़ी मत रहना…
Doctor की appointment मैं खुद ले लूँगा…
सृष्टि कभी-कभी मुस्कुरा देती और बोलती—
इतना tension मत लीजिए…
कबीर गंभीर होकर कहता —
अब तुम अकेली नहीं हो…
और पहली बार… सृष्टि को लगा , वो सच में सुरक्षित है।
अब उनके बीच सिर्फ प्यार नहीं था…एक नई ज़िंदगी की शुरुआत थी।
समय अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता गया…सृष्टि की कोख में पल रही वो नन्ही-सी धड़कन धीरे-धीरे उनकी दुनिया बन गई।
नौ महीने जैसे कब बीत गए… उन्हें पता ही नहीं चला। और फिर…
घर में किलकारी गूँजी। एक प्यारी-सी बेटी ने जन्म लिया। बिल्कुल अपने पापा पर गई थी — वही गहरी आँखें, वही मुस्कान…कबीर उसे गोद में उठाकर घंटों देखता रहता।
वो कहता -
मेरी छोटी सी जान…
सृष्टि दूर से उन्हें देखती…उसकी आँखों में संतोष था।
चार साल बाद…उनकी दुनिया में एक और नन्हा मेहमान आया।
इस बार बेटा —
जो बिल्कुल अपनी माँ पर गया था। वही मासूमियत, वही शांत स्वभाव… वही गहरी भावनाएँ।
अब घर में हँसी थी, खिलखिलाहट थी, खिलौनों की आवाज़ थी।
कबीर ऑफिस से लौटते ही पहले बच्चों को ढूँढता।सृष्टि कभी मुस्कुराकर देखती…कभी उन्हें डाँटने का नाटक करती। सृष्टि ने work from home ले लिया था।
और फिर…आख़िरी दृश्य —
सुबह का समय। पूरा परिवार मंदिर में खड़ा था। सृष्टि ने बेटी का हाथ पकड़ा हुआ था। कबीर ने बेटे को गोद में लिया हुआ था।
घंटी की आवाज़ गूँजी। आरती की लौ उनके चेहरों पर चमक रही थी। कबीर ने एक नज़र सृष्टि की ओर देखा। वो मुस्कुराई। उस मुस्कान में दर्द का कोई निशान नहीं था…बस सुकून था। पूरा होने का एहसास था। कभी जो रिश्ता डर से शुरू हुआ था…वो अब विश्वास, सम्मान और प्यार की मिसाल बन चुका था।
और भगवान के सामने खड़ा वो परिवार…इस बात का सबूत था कि जब भरोसा सच्चा हो , तो टूटा हुआ दिल भी फिर से धड़कना सीख जाता है।
और ये ज़ख्मों की शादी अब प्यार भारी शादी बन गई।
The End. 🩷
Guys aagar aapko story pasand aayi ho to comment jaroor Karen। Or ye batayen kahani me aapko kya achchha laga। Or padhte rahe aisi hi nayi nayi kahaniyan।
Tab tak ke liye thankyou.....