समर्पण उन सभी 'खोजी' मन को, जो भीड़ का हिस्सा बनने से इनकार करते हैं। और उन साहसी पाठकों को, जो सिर्फ मीठी बातें सुनने के शौकीन नहीं हैं, बल्कि सच सुनने का साहस रखते हैं। यह पुस्तक आपके भीतर के उस कबीर को समर्पित है, जो सदियों से सोया हुआ है। पाठकों के लिए एक ज़रूरी बात (Disclaimer): इस पुस्तक में संत कबीर के दोहों के साथ दी गई कहानियाँ ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि लेखक द्वारा रचित 'बोध कथाएँ' हैं। कबीर का दर्शन शब्दों से ज़्यादा 'इशारों' में है। इन काल्पनिक कथाओं का निर्माण केवल इसलिए किया गया है ताकि उन गूढ़ इशारों को आज के संदर्भ में, एक साधारण और चोट करने वाले ढंग से समझा जा सके। यहाँ कहानी मात्र एक माध्यम है, असली लक्ष्य वह 'झटका' है जो आपके अज्ञान को तोड़ने के लिए ज़रूरी है।
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 1
समर्पणउन सभी 'खोजी' मन को, जो भीड़ का हिस्सा बनने से इनकार करते हैं।और उन साहसी पाठकों को, जो मीठी बातें सुनने के शौकीन नहीं हैं, बल्कि सच सुनने का साहस रखते हैं।यह पुस्तक आपके भीतर के उस कबीर को समर्पित है, जो सदियों से सोया हुआ है।पाठकों के लिए एक ज़रूरी बात (Disclaimer):इस पुस्तक में संत कबीर के दोहों के साथ दी गई कहानियाँ ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि लेखक द्वारा रचित 'बोध कथाएँ' हैं। कबीर का दर्शन शब्दों से ज़्यादा 'इशारों' में है। इन काल्पनिक कथाओं का निर्माण केवल इसलिए किया गया है ताकि उन गूढ़ इशारों को ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 2
दोहा: ३ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥कथा: "कड़वी ज़ुबान का ज़हर"एक नगर एक धनी व्यापारी रहता था। वह दान-पुण्य बहुत करता था, लेकिन उसकी ज़ुबान बहुत कड़वी थी। वह अपने नौकरों और परिवार वालों से हमेशा चिल्लाकर और अपमानजनक तरीके से बात करता था। उसे लगता था कि चूंकि वह पैसा दे रहा है, तो उसे कुछ भी बोलने का हक है।एक दिन एक संत उसके द्वार पर आए। व्यापारी ने उन्हें भी झिड़क दिया। संत मुस्कुराए और बोले, "बेटा, तुम महल में तो रहते हो, लेकिन तुम्हारे शब्द कांटे की तरह ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 3
दोहा: ५कबीर माया पापिणी, हरि सूँ करे हराम।मुखि कस्तूरी महमही, कुबधि कुहाड़ा काम॥कथा: "कस्तूरी का लालच"एक बार एक राहगीर से गुज़र रहा था। उसे अचानक कहीं से बहुत ही दिव्य और भीनी-भीनी खुशबू आई। वह राहगीर मंत्रमुग्ध हो गया। उसने सोचा, "जिस चीज़ की खुशबू इतनी प्यारी है, वह चीज़ कितनी कीमती होगी!"वह उस खुशबू के पीछे भागने लगा। रास्ते में काँटे लगे, उसके पैर लहूलुहान हो गए, उसने खाना-पीना छोड़ दिया, लेकिन वह खुशबू उसे और दूर खींचती रही। अंत में उसने देखा कि वह खुशबू उसकी अपनी ही झोली में रखे एक छोटे से कस्तूरी के टुकड़े ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 4
दोहा: ७जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥कथा: की रुकावट"एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, "गुरुजी, मैं बरसों से साधना कर रहा हूँ, मंदिर जाता हूँ, शास्त्र पढ़ता हूँ, फिर भी मुझे उस परम शांति या ईश्वर का अनुभव क्यों नहीं होता?"गुरु उसे एक छोटे से कमरे के पास ले गए। कमरे का दरवाजा खुला था, लेकिन उसके ठीक बीचों-बीच एक बहुत बड़ा और भारी पत्थर रखा था। गुरु ने कहा, "भीतर बहुत सुंदर प्रकाश और संगीत है, पर तुम भीतर जा नहीं सकते।" शिष्य ने पत्थर ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 5
दोहा:९अमृत केरी मोटरी, सिर से धरी उतारि।जाको खोजत जग फिर्या, सो तो घट के माहिं॥कथा: "खजाने की खोज"एक भिखारी से एक पुराने फटे हुए कंबल पर बैठकर भीख माँग रहा था। वह रोज़ सुबह से शाम तक लोगों के आगे हाथ फैलाता और भगवान से प्रार्थना करता, "हे प्रभु! कभी तो मेरी गरीबी दूर कर दो, मुझे कोई खजाना दिला दो।"इसी तरह पूरी उम्र बीत गई और एक दिन उस भिखारी की मौत हो गई। जब गांव वालों ने उसकी लाश को वहाँ से हटाया और उस जगह की सफ़ाई करने के लिए ज़मीन खोदी, तो सब दंग रह ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 6
दोहा:११माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥कथा: "गिनती का व्यक्ति पिछले बीस वर्षों से रोज़ सुबह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर माला जपता था। वह अपनी माला के मोतियों को बहुत तेज़ी से घुमाता और मन ही मन गर्व करता कि उसने आज पाँच हज़ार बार ईश्वर का नाम लिया है। उसे लगता था कि वह शहर का सबसे बड़ा 'भक्त' है।एक दिन एक बच्चा उसके पास आया और पूछा, "बाबा, आप ये मोती क्यों गिन रहे हैं?" उस आदमी ने चिढ़कर कहा, "मैं भगवान का नाम ले रहा ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 7
दोहा:१३अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥कथा: की डोर"एक वीणा वादक था जो अपनी वीणा के तारों को कस रहा था। उसने सोचा कि तार जितने ज़्यादा कसे हुए होंगे, संगीत उतना ही ऊँचा और सुरीला निकलेगा। उसने तार इतने ज़्यादा कस दिए कि जैसे ही उसने पहला सुर छेड़ा, तार टूट गया।फिर उसने नया तार लगाया और उसे बहुत ढीला छोड़ दिया। इस बार जब उसने बजाया, तो वीणा से कोई आवाज़ ही नहीं निकली, सिर्फ एक बेसुरा शोर हुआ।पास खड़े एक गुरु ने यह देखा ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 8
दोहा:१५बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥कथा: "ऊँचाई का खालीपन"एक नगर एक बहुत ऊँचा और विशाल खजूर का पेड़ था। उसे अपनी लम्बाई पर बड़ा गर्व था। वह आसमान की ओर देखता और ज़मीन पर उगे छोटे-छोटे पौधों को हिकारत से देखता। एक दिन तपती दुपहरी में एक थका हुआ मुसाफ़िर वहाँ से गुज़रा। वह साये की तलाश में था, पर खजूर का पेड़ इतना ऊँचा और उसकी पत्तियाँ इतनी ऊपर थीं कि नीचे ज़मीन पर ज़रा भी छाँव नहीं थी।मुसाफ़िर ने ऊपर लगे फलों की ओर देखा, पर वे इतनी ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 9
दोहा:१७साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥कथा: "जरूरत और लालच की लकीर"एक में एक लकड़हारा रहता था। वह रोज़ जंगल जाता, लकड़ियाँ काटता और उन्हें बेचकर जो मिलता उससे अपना और अपने परिवार का पेट भरता। वह हमेशा खुश रहता था। एक दिन उसे जंगल में एक जादुई मटका मिला, जो हर रोज़ सोने का एक सिक्का देता था।लकड़हारे की ज़रूरतें पूरी होने लगीं, पर उसके साथ ही उसका लालच भी बढ़ने लगा। उसने लकड़ियाँ काटना छोड़ दिया। अब वह हर समय यही सोचता कि काश ये मटका दिन में दो सिक्के ...Read More
अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 10
दोहा:१९कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।भक्ति करै कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय॥कथा: "शर्तों वाली भक्ति"एक बहुत बड़ा था, जिसका मन हमेशा मुनाफे और वासनाओं में उलझा रहता था। उसे किसी ने कह दिया कि 'भक्ति' करने से पुण्य मिलता है और व्यापार में बरकत होती है। उसने घर में एक शानदार मंदिर बनवाया और रोज़ दो घंटे पूजा करने लगा।लेकिन पूजा के दौरान भी उसका मन तिजोरी की चाबियों, दुश्मनों से बदला लेने और नए सौदों में लगा रहता। वह सोचता, "मैंने इतना चढ़ावा चढ़ाया है, अब तो भगवान को मेरा काम करना ही पड़ेगा।" एक दिन ...Read More