Ahankaar ka Postmortem - 5 in Hindi Spiritual Stories by Shivraj Bhokare books and stories PDF | अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 5

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अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 5

दोहा:९

अमृत केरी मोटरी, सिर से धरी उतारि।
जाको खोजत जग फिर्या, सो तो घट के माहिं॥

कथा: "खजाने की खोज"

एक भिखारी बरसों से एक पुराने फटे हुए कंबल पर बैठकर भीख माँग रहा था। वह रोज़ सुबह से शाम तक लोगों के आगे हाथ फैलाता और भगवान से प्रार्थना करता, "हे प्रभु! कभी तो मेरी गरीबी दूर कर दो, मुझे कोई खजाना दिला दो।"

इसी तरह पूरी उम्र बीत गई और एक दिन उस भिखारी की मौत हो गई। जब गांव वालों ने उसकी लाश को वहाँ से हटाया और उस जगह की सफ़ाई करने के लिए ज़मीन खोदी, तो सब दंग रह गए। ठीक उसी जगह के नीचे, जहाँ वह भिखारी बैठता था, सोने के सिक्कों से भरा एक प्राचीन घड़ा दबा हुआ था। वह भिखारी पूरी ज़िंदगी एक खजाने के ऊपर बैठकर पूरी दुनिया से 'एक-एक रुपया' माँगता रहा। अगर उसने बस एक बार नीचे खोदकर देखा होता, तो वह सम्राट होता।

सीख :

यह कहानी तुम्हारी और मेरी है। हम सब उस भिखारी की तरह हैं जो शांति, प्रेम और आनंद की भीख पूरी दुनिया से माँग रहे हैं—कभी पैसों से, कभी रिश्तों से, तो कभी मंदिर-मस्जिद से।

कबीर कह रहे हैं कि जिसे तुम बाहर खोज रहे हो, वह 'अमृत' की पोटली तुम्हारे सिर पर ही रखी है, या कहें कि तुम्हारे 'घट' (भीतर) के भीतर है। लेकिन समस्या यह है कि तुम्हारी नज़र हमेशा बाहर की तरफ है। तुम दूसरों की राय में अपनी कीमत खोजते हो, बाहरी सफलताओं में अपनी खुशी ढूँढते हो।

 "बाहर की खोज तुम्हें सिर्फ़ थकाएगी, भीतर की खोज तुम्हें तृप्त करेगी।" कबीर तुम्हें किसी नई जगह नहीं ले जा रहे, वे बस तुम्हें वहाँ वापस ला रहे हैं जहाँ तुम पहले से ही हो। जिस दिन तुम बाहर हाथ फैलाना बंद कर दोगे, उस दिन तुम्हें अपनी ही आत्मा का सम्राट होने का अनुभव होगा।

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दोहा: १०

कबीर खड़ा बाज़ार में, सबकी माँगे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥

कथा: "भीड़ में अकेला"

एक नगर के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा बाज़ार लगा था। वहाँ हर कोई कुछ न कुछ बेचने या खरीदने में व्यस्त था। कोई चिल्ला रहा था, कोई मोल-भाव कर रहा था, और कोई दूसरों को धोखा देने की जुगत में था। उस शोर-शराबे के बीच एक फकीर शांत खड़ा सब देख रहा था।

एक राहगीर ने पूछा, "महाराज, आप यहाँ बाज़ार में क्या कर रहे हैं? न आप कुछ खरीद रहे हैं, न बेच रहे हैं। आप किसके पक्ष में हैं?" फकीर मुस्कुराया और बोला, "मैं किसी के पक्ष में नहीं हूँ।

अगर मैं किसी का 'दोस्त' बनूँगा, तो मुझे उसकी गलतियों पर पर्दा डालना पड़ेगा। अगर मैं किसी का 'दुश्मन' बनूँगा, तो मेरे भीतर नफरत भर जाएगी। मैं तो बस यहाँ खड़ा होकर देख रहा हूँ कि तुम सब जिसे 'ज़िंदगी' कह रहे हो, वह महज़ एक सौदेबाजी है। मैं बस यही दुआ माँगता हूँ कि तुम्हारी आँखें खुल जाएँ और तुम इस बाज़ार के शोर से मुक्त हो सको।"

सीख :

यह आपकी किताब का सबसे महत्वपूर्ण सबक है। 'बाज़ार' का मतलब है—यह संसार, जहाँ हमारे सारे रिश्ते और भावनाएँ किसी न किसी 'स्वार्थ' पर टिकी हैं।

कबीर यहाँ 'साक्षी भाव' (Witnessing) की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि इस दुनिया में रहो, लेकिन दुनिया को अपने अंदर मत घुसने दो। जब तुम किसी से बहुत ज्यादा जुड़ जाते हो (दोस्ती), तो तुम अंधे हो जाते हो। और जब तुम किसी से नफरत करते हो (बैर), तो तुम अपनी शांति खो देते हो।

मुक्त व्यक्ति वही है जो किसी 'गुट' का हिस्सा नहीं है। वह अकेला खड़ा होने का साहस रखता है। वह निष्पक्ष है, इसलिए वह सत्य देख पाता है। कबीर की यह 'खैर' (दुआ) दरअसल एक पुकार है कि तुम भी इस मानसिक गुलामी से बाहर आओ और अपनी चेतना में स्वतंत्र हो जाओ।
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क्या आप भी बाहर की चमक में अपने भीतर का हीरा भूल गए हैं? इस आत्म-बोध की यात्रा में मेरे साथी बनने के लिए मुझे Matrubharti पर Follow करना न भूलें।

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