समर्पण
उन सभी 'खोजी' मन को, जो भीड़ का हिस्सा बनने से इनकार करते हैं।
और उन साहसी पाठकों को, जो सिर्फ मीठी बातें सुनने के शौकीन नहीं हैं, बल्कि सच सुनने का साहस रखते हैं।
यह पुस्तक आपके भीतर के उस कबीर को समर्पित है, जो सदियों से सोया हुआ है।
पाठकों के लिए एक ज़रूरी बात (Disclaimer):
इस पुस्तक में संत कबीर के दोहों के साथ दी गई कहानियाँ ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि लेखक द्वारा रचित 'बोध कथाएँ' हैं। कबीर का दर्शन शब्दों से ज़्यादा 'इशारों' में है। इन काल्पनिक कथाओं का निर्माण केवल इसलिए किया गया है ताकि उन गूढ़ इशारों को आज के संदर्भ में, एक साधारण और चोट करने वाले ढंग से समझा जा सके।
यहाँ कहानी मात्र एक माध्यम है, असली लक्ष्य वह 'झटका' है जो आपके अज्ञान को तोड़ने के लिए ज़रूरी है।
Introduction
धूल झाड़ने की एक कोशिश
हमने कबीर के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। हमने उन्हें कैलेंडरों में सजाया, उनकी मूर्तियों पर फूल चढ़ाए और उनके दोहों को रटकर परीक्षाओं में नंबर ले आए। पर हमने वह एक काम नहीं किया जिसके लिए कबीर चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे—'जागना'।
आज का इंसान डिग्रियों से लदा है पर भीतर से खाली है। वह सूचनाओं (Information) के बाज़ार में खड़ा है, जहाँ हर कोई उसे कुछ न कुछ बेच रहा है। ऐसे 'कन्फ्यूजन' वाले समय में कबीर और भी ज़रूरी हो जाते हैं।
कबीर कोई धर्म या संप्रदाय नहीं हैं; कबीर एक सफ़ाई अभियान हैं। यह किताब उसी धूल को झाड़ने की एक छोटी सी कोशिश है जो सदियों से हमारे मन और कबीर के शब्दों पर जम गई है। यहाँ हम कबीर को सिर्फ पढ़ेंगे नहीं, उन्हें अपनी ज़िंदगी के कड़वे सच के आइने में देखेंगे।
तैयार हो जाइए, क्योंकि यहाँ आपको सहलाया नहीं जाएगा, बल्कि जगाया जाएगा।
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दोहा: १
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
कथा: "आईना और अंधेरा"
एक आदमी था जो मोहल्ले के हर इंसान की बुराई करता था। उसे लगता था कि वह दुनिया का सबसे नेक इंसान है और बाकी सब भ्रष्ट हैं। एक दिन वह एक फकीर के पास गया और बोला, "महाराज, इस दुनिया में हर तरफ गंदगी और बुराई है, मुझे कोई एक भी अच्छा इंसान नहीं दिखता।"
फकीर मुस्कुराए और उसे एक पुराना आईना दिया। फकीर ने कहा, "यह जादुई आईना है, इसे लेकर पूरे शहर में घूमो। तुम्हें जो भी बुरा दिखे, उसके सामने यह आईना कर देना।" वह आदमी खुश होकर निकला, लेकिन ताज्जुब की बात—वह जिसके भी सामने आईना करता, उसे आईने में अपनी ही शक्ल दिखाई देती। वह झल्लाकर वापस आया और बोला, "यह आईना खराब है, इसमें सिर्फ मैं दिखता हूँ।"
फकीर ने शांति से कहा, "आईना खराब नहीं है। समस्या यह है कि तुम्हारी आँखें बाहर की बुराई देखने की इतनी आदी हो गई हैं कि तुम भूल गए हो कि जो तुम बाहर देख रहे हो, वह सिर्फ तुम्हारे भीतर के कचरे की परछाई है।"
प्रहार :
सुनो, तुम जो दूसरों को 'जज' (judge) करते फिरते हो, वो तुम्हारी महानता नहीं, तुम्हारी बीमारी है। तुम दूसरों में बुराई इसलिए ढूँढते हो ताकि तुम खुद को 'बेहतर' महसूस करा सको। तुम्हारा अहंकार दूसरों को नीचा दिखाकर ही ज़िंदा रहता है।
कबीर यहाँ तुम्हें कोई मोरल साइंस (moral science) नहीं पढ़ा रहे। वो कह रहे हैं कि जब तक तुम्हारी अपनी 'दृष्टि' मैली है, तुम्हें पूरी कायनात मैली ही दिखेगी। अपनी ऊँगली दूसरों की तरफ उठाने से पहले अपनी गर्दन झुकाकर अपने भीतर के अंधेरे को देखो। असली 'विलेन' बाहर नहीं, तुम्हारी खोपड़ी के अंदर बैठा है। जिस दिन तुम अपनी गंदगी देख लोगे, उस दिन दूसरों से नफरत करने की तुम्हारी हिम्मत ही नहीं होगी।
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दोहा: २
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
कथा: "डिग्रियों का बोझ"
एक बहुत बड़ा विद्वान था जिसने दुनिया भर की किताबें पढ़ रखी थीं। उसके घर की दीवारें डिग्रियों और पदकों से भरी पड़ी थीं। उसे गर्व था कि वह जीवन के हर रहस्य को 'जानता' है।
एक दिन वह नदी पार करने के लिए एक छोटी नाव में बैठा। नाव चलाने वाला एक साधारण सा मल्लाह (नाविक) था। विद्वान ने अपनी विद्वत्ता झाड़ने के लिए उससे पूछा, "क्या तुमने कभी उपनिषद पढ़े हैं?" नाविक ने कहा, "नहीं साहब।" विद्वान हँसा और बोला, "तुम्हारी पच्चीस प्रतिशत ज़िंदगी बेकार गई।" फिर उसने पूछा, "क्या तुम्हें खगोल विज्ञान का ज्ञान है?" नाविक ने फिर मना कर दिया। विद्वान बोला, "तुम्हारी आधी ज़िंदगी बर्बाद हो गई।"
तभी अचानक नदी में भयंकर तूफ़ान आ गया और नाव डूबने लगी। नाविक ने चिल्लाकर पूछा, "साहब, क्या आपको तैरना आता है?" विद्वान घबराकर बोला, "नहीं, मैंने तो बस तैरने पर किताबें पढ़ी हैं!" नाविक पानी में कूदते हुए बोला, "साहब, आपकी तो पूरी ज़िंदगी ही बर्बाद हो गई। क्योंकि आज किताबें नहीं, सिर्फ 'अनुभव' काम आएगा।"
प्रहार :
तुम जिसे 'ज्ञान' कहते हो, वह दरअसल कूड़ा है जो तुमने दूसरों से इकट्ठा किया है। तुमने उपनिषद पढ़ लिए, गीता रट ली, कबीर के दोहे याद कर लिए, लेकिन क्या तुम्हारे जीवन में रत्ती भर भी बदलाव आया?
कबीर यहाँ 'प्रेम' की बात कर रहे हैं, पर वह तुम्हारा फिल्मी प्रेम नहीं है। कबीर के 'प्रेम' का मतलब है—सत्य से जुड़ाव। वह कह रहे हैं कि अगर तुमने जीवन को जिया नहीं, उसे अनुभव (Experience) नहीं किया, तो तुम्हारी सारी डिग्रियां रद्दी के भाव हैं।
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