Ahankaar ka Postmortem - 4 in Hindi Spiritual Stories by Shivraj Bhokare books and stories PDF | अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 4

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अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 4

दोहा: ७

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥

कथा: "दरवाजे की रुकावट"

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, "गुरुजी, मैं बरसों से साधना कर रहा हूँ, मंदिर जाता हूँ, शास्त्र पढ़ता हूँ, फिर भी मुझे उस परम शांति या ईश्वर का अनुभव क्यों नहीं होता?"

गुरु उसे एक छोटे से कमरे के पास ले गए। कमरे का दरवाजा खुला था, लेकिन उसके ठीक बीचों-बीच एक बहुत बड़ा और भारी पत्थर रखा था। गुरु ने कहा, "भीतर बहुत सुंदर प्रकाश और संगीत है, पर तुम भीतर जा नहीं सकते।" शिष्य ने पत्थर हटाने की कोशिश की, पर वह बहुत भारी था।

तब गुरु ने समझाया, "यह पत्थर ही तुम्हारा 'मैं' (अहंकार) है। तुम ईश्वर के पास जाना चाहते हो, लेकिन साथ में अपनी अकड़, अपनी पहचान और अपना 'होना' भी ले जाना चाहते हो। उस छोटे से दरवाजे से तुम और तुम्हारा अहंकार—दोनों एक साथ भीतर नहीं जा सकते। जिस दिन यह 'मैं' हट जाएगा, उस दिन तुम्हें कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; प्रकाश तो पहले से ही भीतर मौजूद है।"

सीख :

यह कबीर की सबसे गहरी चोट है। हम अक्सर कहते हैं, "मैं सत्य को खोज रहा हूँ," "मैं ध्यान कर रहा हूँ।" कबीर पूछते हैं—यह 'मैं' कौन है?

जब तक यह 'मैं' ज़िंदा है, तब तक 'हरि' या 'सत्य' के लिए जगह ही नहीं है। क्योंकि 'मैं' का मतलब ही है अलगाव (Separation)—खुद को दूसरों से और अस्तित्व से अलग मानना। अहंकार और परमात्मा एक ही म्यान की दो तलवारें हैं, जो साथ नहीं रह सकतीं।

अंधेरा और कुछ नहीं, बस प्रकाश की अनुपस्थिति है। वैसे ही, अज्ञान और कुछ नहीं, बस अहंकार की मौजूदगी है। जैसे ही समझ का दीपक भीतर जलता है, यह 'मैं' पिघलने लगता है। और जिस क्षण तुम 'नहीं' होते, उसी क्षण तुम 'पूरे' हो जाते हो।

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दोहा: ८

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरी करेगा कब॥

कथा: "कल का इंतज़ार"

एक नौजवान हमेशा कहता था कि जब वह अमीर बन जाएगा, तब वह ध्यान करेगा और शांति से जियेगा। जब वह अमीर हो गया, तो उसने कहा कि जब बच्चों की शादी हो जाएगी, तब वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करेगा।

समय बीतता गया। एक दिन वह अपनी हवेली के बगीचे में बैठा 'कल' की योजना बना रहा था कि कल से वह अपनी सारी चिंताओं को छोड़कर कबीर को पढ़ेगा। अचानक उसके सीने में तेज़ दर्द उठा। उसे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा, "आपके पास केवल कुछ ही मिनट बचे हैं।"

उस आदमी की आँखों में आँसू थे। वह सोच रहा था कि उसने अपनी पूरी उम्र उस 'कल' के लिए दांव पर लगा दी जो कभी आया ही नहीं। वह उन मिनटों में जीना चाहता था, पर समय खत्म हो चुका था। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी भविष्य की तैयारी में खर्च कर दी, और वर्तमान को जीना ही भूल गया।

सीख :

यह दोहा टाइम-मैनेजमेंट (Time Management) के लिए नहीं है, यह 'मृत्यु' के बोध के लिए है।
अहंकार हमेशा 'कल' में जीता है। वह कहता है, "मैं कल बदल जाऊँगा," "मैं कल माफ़ी माँग लूँगा," "मैं कल खुश होऊंगा।" कबीर कह रहे हैं कि जिसे तुम 'कल' कह रहे हो, वह सिर्फ तुम्हारे मन की एक कल्पना है। हकीकत सिर्फ 'अभी' है।
'पल में परलय' का मतलब यह नहीं है कि दुनिया खत्म हो जाएगी, इसका मतलब है कि तुम्हारी सांस का कोई भरोसा नहीं है। अगर जागना है, तो अभी जागो। अगर कुछ सही करना है, तो इसी पल करो। जो इंसान आज को टाल रहा है, वह असल में ज़िंदगी को टाल रहा है। कबीर की यह चेतावनी तुम्हें डराने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हें इस 'अभी' की कीमत समझाने के लिए है।

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"क्या आप भी किसी 'कल' के इंतज़ार में आज को गँवा रहे हैं? जीवन की इन गहरी सच्चाइयों को मेरे साथ और करीब से समझने के लिए मुझे Matrubharti पर Follow करें।

आपकी प्रतिक्रिया मुझे यह जानने में मदद करती है कि ये शब्द आप तक किस तरह पहुँच रहे हैं।

अगले अध्याय में: उस 'अमृत' की चर्चा, जिसे कबीर ने पा लिया था।"