ગણિકા.. !

written by:  Bhumi
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जीस्म बेचा हैं मैंने....रुह नही अब तक... इन्सान तो मैं भी तेरी तरहा ही हुं फीर भी आ जाती हैं मुझे शर्म कभी कभी... इसीलीये तेरे दिये घाँव पर मैं उफ्फ नही करती... खुन जैसा कुछ़ मेरा भी नीकलता हैं और दर्द भी हो जाता हैं जरा सा...!!

Janki  23 Jan 2018  

dear writer I appreciate your work

Hardik Joshi  26 Jan 2018  

want to read ahead

Vrutti Kiritbhai Patel  26 Jan 2018  

nice.. but seems to be incomplete