Run Or Hide? - 6 in Hindi Thriller by silent script books and stories PDF | Run Or Hide? - 6

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Run Or Hide? - 6

विकी, रिद्धि, अंजलि और कबीर... चारों 
‎ थक चुके थे। थकान सिर्फ शरीर की नहीं थी, बल्कि उस डर की थी जो उनके सिर पर मंडरा रहा था।

‎विकी अपने सिर पर दोनों हाथ रखकर घुटनों के बल बैठा हुआ था। उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था और वो बस ज़मीन को घूरे जा रहा था। 

‎तभी रिद्धि के दिमाग में कुछ चल रहा था। उसने अंजलि की तरफ देखा, जो डर से कांप रही थी। रिद्धि धीरे से सरकते हुए अंजलि के थोड़ा पास गई।
‎उसने  पूछा, "अंजलि... अगले राउंड में छुपने की कोई बेस्ट जगह है क्या तुम्हारे पास?"

‎अंजलि ने बेबसी से अपना सिर 'नहीं' में हिला दिया। 
‎रिद्धि बोली, "मेरे पास एक आइडिया है... क्यों न हम दोनों इस बार एक ही जगह पर साथ छुपें?"

‎यह सुनते ही अंजलि डांटते हुए बोली, "पागल हो गई हो क्या रिद्धि? हम दोनों मारे जाएंगे ऐसे तो! अगर उसने ढूंढ लिया तो एक साथ दोनों का खेल खत्म!"

‎"मेरी बात तो सुनो," रिद्धि ने  समझाते हुए कहा। "अगर उसने हमें ढूंढ भी लिया, तो हम उसे बोल देंगे कि आपने खुद नियम में कहा था कि एक राउंड में सिर्फ एक ही इंसान मर सकता है। कैसे न कैसे करके हम उसे अपनी बातों में बहला-फुसला लेंगे। अगर वो मान गया, तो खेल टाई (Tie) हो जाएगा। इसके बाद एक और राउंड होगा और उस बहाने हमें थोड़ा और समय मिल जाएगा। और वैसे भी, वहाँ से जाते-जाते हम जंगल की कोई और सही जगह भी देख लेंगे।"

‎अंजलि बोली, "क्यों
‎वो तेरे पापा लगते हैं क्या जो तेरी बात मान लेंगे?"
‎रिद्धि का चेहरा उतर गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने मिन्नत करते हुए कहा, "पर देखो, हमारे लिए इस वक्त यही सही होगा। प्लीज अंजलि... तुम मेरे साथ ही रहो। अकेले रहे तो वैसे भी कोई चांस नहीं है।"
अंजली ने कहा ठीक है "यार, इस जंगल में नेटवर्क ही नहीं है, मेरी स्मार्टवॉच का सिग्नल भी गायब है, वरना मैं पापा को फोन कर देती।"

‎‎तभी विक्रम अगला खेल शुरू करने के लिए आ गया था  और उसके  साथ एक बड़ा सा खाली बॉक्स था। लेकिन अचानक वो रुक गया, जैसे उसके दिमाग में कुछ अजीब सी उलझन चल रही हो। वो गुस्से में इधर-उधर देखने लगा।

‎"कहाँ गई... समीर की लाश कहाँ गई?!" विक्रम अपनी भारी आवाज़ में चिल्लाया। गुस्से में उसने पास पड़ी चीज़ों पर लात मारी। उसकी आँखें एकदम लाल थीं और वो अपनी ही धुन में बड़बड़ा रहा था, "मैंने तो लाश को संभालकर रखा था... फिर वो गायब कैसे हो गई? कौन ले गया उसे?!"

‎तभी वहाँ खड़ी रिद्धि ने डर से कांपते हुए विक्रम की तरफ देखने लगी।
‎वो रोते हुए, सहमी हुई आवाज़ में बोली, "आ... आप गुस्से में किसे ढूँढ रहे हैं?

आप तो समीर की लाश को पहले ही यहाँ से ले जा चुके हैं... आप भूल गए क्या? आपने ही तो उसे पहले ही बॉक्स में पैक करके भेज दिया था ना? फिर अब आप क्या ढूंढ रहे हैं?"

‎रिद्धि की यह बात सुनते ही विक्रम अचानक रुक गया। उसका गुस्सा एकदम से शांत हो गया और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आ गई। वो अपनी सनक में सचमुच भूल चुका था कि उसने पहले ही लाश को ठिकाने लगा दिया था। 
विक्रम बोला, "चलो... अब सब छुपने के लिए तैयार हो जाओ!"इससे पहले कि किसी को बोलने का मौका मिलता, विक्रम ने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और ज़ोर-ज़ोर से 7 मिनट के लिए गिनना शुरू कर दिया।

तभी अंजलि और रिद्धि हाथ पकड़ कर भागने लगते हैं
‎कबीर विकी को बोलता है, "मेरे साथ चलो।"
‎पर विकी कबीर से कहता है, "नहीं, मैं एक पनौती हूँ। तुम मेरे साथ रहोगे तो तुम भी समीर की तरह... इसलिए मुझे अकेला छोड़ दो। मेरे लिए समय खराब मत करो।"





इंस्पेक्टर नैतिक अपनी कुर्सी  पर बैठा गहरी सोच में डूबा हुआ था, तभी अचानक उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर उसके बड़े पुलिस अफसर का नाम था।
‎नैतिक ने फोन उठाया, "जय हिंद सर!"
‎सामने से गुस्से से भरी आवाज़ आई, "नैतिक! तुम इस वक्त क्या कर रहे हो? मुझे खबर मिली है कि तुम किसी और ही केस में उलझ गए हो! पहले उन अमीर घर के बच्चों को जल्दी ढूंढो। वो सब बहुत रसूखदार और अमीर खानदान के बच्चे हैं।

अगर उन बच्चों को कुछ भी हो गया, तो उनके घरवाले हम सब पर सवाल उठाएंगे और हमारा बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा। अपनी प्राथमिकताएं तय करो, नैतिक!"

‎नैतिक ने खुद को शांत रखते हुए कहा, "लेकिन सर, जो केस आप कह रहे हैं, उसे मेरे जूनियर्स संभाल रहे हैं। मुझे यह वाला केस उनसे पहले मिला था और यह बहुत ज्यादा खतरनाक है। वो छोटे-छोटे मासूम बच्चे... सर, आपको नहीं लगता कि मुझे पहले उनकी जान बचाने पर ध्यान देना चाहिए?"

‎ "नैतिक! मैं तुम्हारी कोई दलील नहीं सुनना चाहता। मुझे बस नतीजा चाहिए। तुम पहले उन अमीर बच्चों को ढूंढो, चाहे कुछ भी हो जाए! बस, यही मेरा आखिरी फैसला है।"

‎यह बोलते ही उसने  गुस्से में फोन काट दिया।
‎नैतिक ने फोन की स्क्रीन को देखा और बड़बड़ाया, "सर के पास सच में दिमाग नाम की चीज नहीं है! इन्हें इतनी बड़ी पोस्ट पर किसने बैठा दिया? साफ़-साफ़ दिख रहा है कि इस वक्त किस मासूम की जान बचाना ज्यादा ज़रूरी है, पर इन्हें सिर्फ पैसों की पड़ी है।"

‎नैतिक अभी गुस्से में सोच ही रहा था कि तभी उसके फोन पर दोबारा घंटी बजी। इस बार उसके जूनियर का फोन था। नैतिक ने तुरंत फोन उठाया।

‎जूनियर ने हांफते हुए कहा, "सर! जैसा आपने कहा था, हमने आधार कार्ड डेटाबेस और शहर के अस्पतालों से उन सभी लोगों की लिस्ट निकाल ली है जिनकी हाइट बहुत ज़्यादा लंबी है और जिन्हें पैर बढ़ने की बीमारी है। पूरे शहर में ऐसे सिर्फ तीन लोग मिले..."

नैतिक ने तुरंत पूछा, "तीनों के नाम बताओ जल्दी!"
जूनियर बोला, "सर, दो लोग तो अपने घरों पर ही हैं, लेकिन जो तीसरा नाम है... उसका कुछ पता नहीं चल रहा है


 सरकारी रिकॉर्ड में जो उसका पुराना एड्रेस था, वहाँ सालों से ताला लगा है। वो इस वक्त कहाँ है... किसी को नहीं पता।"

नैतिक ने बेचैनी से पूछा, "नाम क्या है उसका?!"
जूनियर ने उधर से जवाब दिया, "सर, उसका नाम... विक्रम है।

'विक्रम' नाम सुनते ही नैतिक के हाथ से उसका फोन छूटकर सीधे नीचे फर्श पर गिर गया।"वि... विक्रम? नहीं...वो नहीं हो सकता!