(100) तारसारोपनिषद
(100) तारसारोपनिषद-
यह उपनिषद के क्रम में 100 वें स्थान पर आता है।
सम्बन्ध: शुक्ल यजुर्वेद
विषय: तारक-ब्रह्म, नारायण-मन्त्र, प्रणव और मोक्षमंगलाचरण
यन्नारायणतारार्थसत्यज्ञानसुखाकृति ।त्रिपान्नारायणाकरं तद्ब्रह्मैवास्मि केवलम् ॥
भावार्थ:जो नारायण तारक-तत्त्व के स्वरूप, सत्य, ज्ञान और आनन्दमय हैं तथा जिनका स्वरूप परम ब्रह्म है, वही एकमात्र ब्रह्म मेरे लिए उपास्य और जानने योग्य है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
अर्थ:वह परमात्मा पूर्ण है और यह जगत् भी उसी पूर्ण से प्रकट हुआ है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥१. अविमुक्तोपासना
बृहस्पति ने याज्ञवल्क्य से पूछा कि कुरुक्षेत्र को देवताओं का यज्ञस्थान और समस्त प्राणियों का ब्रह्मसदन क्यों कहा जाता है। याज्ञवल्क्य बताते हैं कि जहाँ प्राणी के प्राण शरीर से निकलते हैं, वहाँ रुद्र उसे तारक-ब्रह्म का उपदेश देते हैं, जिसके द्वारा वह अमृतत्व और मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए अविमुक्त का आश्रय लेना चाहिए और उसे नहीं छोड़ना चाहिए।
भावार्थ:यहाँ ‘तारक’ का अर्थ है—जो जीव को संसार-बन्धन से पार कर दे। उपनिषद् मोक्षदायक ब्रह्मज्ञान को तारक-ब्रह्म कहता है।२. नारायण का स्थूल अष्टाक्षर तारक
भारद्वाज ने याज्ञवल्क्य से पूछा—
“किं तारकम्? किं तारयति?”अर्थात्—तारक क्या है और वह किसे पार कराता है?
याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं—
ॐ नमो नारायणाय इति तारकं चिदात्मकम्।
अर्थ:“ॐ नमो नारायणाय” तारक है और इसका स्वरूप चैतन्यमय है।
उपनिषद् इस मन्त्र को तीन भागों में समझाता है—
ॐ — एक अक्षर; आत्मस्वरूप।
नमः — दो अक्षर; प्रकृति-स्वरूप।
नारायणाय — पाँच अक्षर; परब्रह्म का स्वरूप।
इस प्रकार—
ॐ + नमः + नारायणाय = अष्टाक्षर मन्त्र
और इसे जानने वाला अमृतत्व को प्राप्त होता है।अष्टाक्षर के अक्षरों का निरूपण
उपनिषद् आगे मन्त्र के अक्षरों को विभिन्न दिव्य तत्त्वों से सम्बद्ध करता है—
ॐ — ब्रह्मान — विष्णुम — रुद्रन — ईश्वररा — विराट्य — पुरुषण — भगवान्य — परमात्मा
इस प्रकार नारायण का अष्टाक्षर परम पुरुष का बोध कराने वाला माना गया है।३. नारायण का सूक्ष्म अष्टाक्षर तारक
इसके बाद उपनिषद् ॐ को परब्रह्म कहता है—
ॐ इत्येतदक्षरं परं ब्रह्म।
अर्थ:ॐ यह अक्षर ही परम ब्रह्म है।
इसके आठ सूक्ष्म अंग बताए गए हैं—
अकार
उकार
मकार
बिन्दु
नाद
कला
कलातीता
तत्पर
उपनिषद् कहता है कि इसे तारक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह जीव को संसार से पार कराने वाला है।४. प्रणव के अंग और रामायण के पात्र
उपनिषद् का एक विशेष भाग प्रणव के अंगों को रामायण के प्रमुख पात्रों से जोड़ता है।
अकार से ब्रह्मा और जाम्बवान् का सम्बन्ध बताया गया है।
उकार से उपेन्द्र/हरि और हनुमत्-परम्परा का सम्बन्ध जोड़ा गया है।
मकार से शिव तथा हनुमान् का सम्बन्ध बताया गया है।
बिन्दु से ईश्वर और शत्रुघ्न का सम्बन्ध।
नाद से महाप्रभु तथा भरत का सम्बन्ध।
इस प्रकार उपनिषद् ॐकार के आध्यात्मिक तत्त्व को रामायण के चरित्रों के प्रतीकात्मक स्वरूप से जोड़ता है।५. परमात्मा की प्रसन्नता के मन्त्र
भारद्वाज ने याज्ञवल्क्य से पूछा कि किन मन्त्रों के द्वारा परमात्मा प्रसन्न होते हैं और साधक को अपना स्वरूप दिखाते हैं।
याज्ञवल्क्य द्वारा दिए गए मन्त्रों में प्रत्येक अक्षर को श्रीपरमात्मा नारायण के स्वरूप से जोड़ा गया है।
उदाहरणतः—
ॐ यो ह वै श्रीपरमात्मा नारायणः स भगवानकारवाच्यो जाम्बवान्... तस्मै वै नमोनमः।
भावार्थ:जो श्रीपरमात्मा नारायण हैं, वे अकार द्वारा व्यक्त होने वाले जाम्बवान्-स्वरूप में भी प्रतिष्ठित हैं। उस परमात्मा को बार-बार नमस्कार है।
इसी प्रकार उकार, मकार, बिन्दु, नाद और आगे के सूक्ष्म तत्त्वों के लिए मन्त्र दिए जाते हैं। अन्ततः परम पुरुष नारायण को नित्य-शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, परमानन्द और अद्वय कहा गया है।६. मन्त्रज्ञान का फल
अन्तिम भाग में उपनिषद् इस अष्टविध मन्त्र के अध्ययन और उसके अर्थ के ज्ञान का फल बताता है।
साधक के विषय में कहा गया है कि वह अग्नि, वायु और आदित्य आदि से पवित्र होता है तथा अनेक वैदिक-पौराणिक जपों के समान फल प्राप्त करता है।
अन्ततः कहा गया है कि वह नारायण-पद को प्राप्त होता है।
इसके साथ ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र उद्धृत है—
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः।
भावार्थ:ज्ञानी पुरुष भगवान् विष्णु के उस परम पद का सदा दर्शन करते हैं।
और आगे—
विष्णोर्यत्परमं पदम्।
अर्थ:वह विष्णु का परम पद है।उपनिषद् का मूल संदेश
तारसार उपनिषद् की शिक्षा को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है—
“ॐ” → परम ब्रह्म का बोध“ॐ नमो नारायणाय” → तारक अष्टाक्षर मन्त्रप्रणव के आठ अंग → सूक्ष्म ब्रह्मविद्यानारायण → परम पुरुष और परमात्मातारक-ब्रह्म का ज्ञान → अमृतत्व और मोक्ष
अर्थात् उपनिषद् का लक्ष्य केवल मन्त्र-जप बताना नहीं है, बल्कि मन्त्र के पीछे स्थित ब्रह्म-तत्त्व का ज्ञान कराना है।
॥ इति तारसारोपनिषत् ॥
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