Stray Terror - 2 in Hindi Magazine by Virendra Dewangan books and stories PDF | आवारा आतंक - 2

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आवारा आतंक - 2

गत भाग से आगे...
वहीं पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स यानी पेटा इंडिया ने कहा है,‘‘कुत्तों को सेल्टर होम में डालना कभी कारगर नहीं रहा। इससे रेबीज कम नहीं होगा, न ही काटने से बचाव होगा; क्योंकि कुत्ते अंततः अपने इलाके में लौट आते हैं।’’

पशुप्रेमी मेनका गांधी ने भी कोर्ट के फैसले पर सवाल खड़ी की थी,‘‘यह गुस्से में दिया गया अजीब फैसला है। दिल्ली में एक भी सेल्टर होम नहीं है। इन्हें बनाने के लिए 15 हजार करोड़ खर्च करने होंगे। 3000 ऐसी जगहें ढूंढ़नी होगी, जहां कोई नहीं रहता। इसी के साथ 1.5 लाख सफाईकर्मी, 500 वैन, दर्जनों पशु चिकित्सक व गार्ड नियुक्त करने होंगे। इनके अलावा कुत्तों के भोजन के लिए हर हफ्ते 5 करोड़ लगेगा। फिलहाल कुत्तों का भोजन समाज खुद वहन करता है।’’

बीजेपी नेत्री मेनका गांधी की तरह कइयों की दलीलें हैं कि भारत के हर शहर, नगर, कस्बा व गांव में कुत्तों के लिए शेल्टर होम बनाने, उनकी देखरेख करने, खाने-पीने की व्यवस्था करने में ही राज्य सरकारों के हर महीने करोड़ों रुपये स्वाहा हो जाएंगे। जबकि राज्य सरकारें घाटे में चल रही हैं।

इसका सटीक जवाब यही कि जब सरकारें फ्रीबीज की योजनाएं चलाकर मुफ्त की रेवड़ियां बांट सकती हैं, तब व्यापक जनहित व समाजहित का यह कार्य क्यों नहीं कर सकती?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खफा मुट्ठीभर पशु अधिकार कार्यकर्ता, बचावकर्मी और डॉग लवर्स विरोध प्रदर्शन करने के लिए इंडिया गेट के सामने पहुंचे, तो प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। असल में, केवल 5-10 फीसदी से भी कम तथाकथित डॉग लवर्स इस बहस को चला रहे हैं, जबकि देश की 90-95 फीसदी आबादी इन आवारा आतंकियों से त्रस्त है।

सच्चाई यह भी कि ज्यादातर कुत्ताप्रेमी एनजीओ बना रखे हैं, जिनसे ये विदेशी फंड लेते हैं। इनकी असल चिंता इसी फंड को हस्तगत करने की रहती है। एनजीओ पेटा गर इतना ही पशुप्रेमी है, तो उसने गौहत्या, बकरीद पर बकरे की हत्या का आज तक विरोध क्यों नहीं किया?

दिल्ली में एमसीडी ने 20 एनिमल वेलफेयर एसोसिएशन को स्टरलाइजेशन व वैक्सीनेशन का काम दे रखा था। पर, इन्होंने काम नहीं किया। इन्होंने न शेल्टर होम बनाए, न वे कुत्तों को गोद लेने के लिए तैयार हुए और न ही कुत्ता काटने से किसी की मदद किए।

उक्त आदेशों के परिपालन में पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है,‘‘निर्देशों को देश के हर शहर और कस्बे में लागू करना जरूरी है। आवारा कुत्तों को पकड़कर सुरक्षित डॉग शेल्टर में रखना कोई मुश्किल काम नहीं है।’’

सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले से सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़-सी आ गई थी। चुनींदा प्रतिक्रियाएं देखिए।

एक यूजर ने लिखा,‘‘डियर स्ट्रीट डॉग लवर्स, अगर आप सुप्रीम कोर्ट के आवारा कुत्तों को सड़क से हटाने के फैसले से नाराज हैं, तो प्लीज कुछ कुत्तों को घर ले आए और उन्हें एक प्यारा-सा घर दें।’’

उनका आगे लिखना है,‘‘आवारा कुत्तों को अपने घर की बासी रोटियां खिलाने से आप अधिकार कार्यकर्ता नहीं बन जाते।’’

दूसरे यूजर ने लिखा,‘‘अगर आपको दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों के हालात के बारे में पता नहीं है, तो नाइट शिफ्ट में काम करनेवालों से पूछिए।’’

इनके विपरीत एक यूजर्स ने लिखा है,‘‘अगर आपने कभी आवारा कुत्ते से प्यार नहीं किया है, तो आप उसके प्रेम से वंचित रह गए हैं।’’

सुप्रीम कोर्ट के द्विसदस्यीय बेंच के फैसले के खिलाफ डॉग लवर्स के द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए त्रिसदस्यीय बेंच ने 11 दिन बाद अपने फैसले में कहा है,‘‘दिल्ली समेत पूरे देश में केवल रेबीजग्रस्त व आक्रामक कुत्तों को ही शेल्टर होम में रखा जाए। बाकी आवारा कुत्तों को नसबंदी व टीकाकरण करने के बाद उसी स्थान पर छोड़ा जाए, जहां से उसे पकड़ा गया था।’’

उक्त फैसला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एनवी अंजारिया और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दिया है। बेंच ने मामले का दायरा दिल्ली-एनसीआर से आगे बढ़ाकर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, स्थानीय निकायों और नगर निगमों के सचिवों को पशुजन्म नियंत्रण नियमों के अनुपालन के लिए पक्षकार बनाया है।

त्रिसदस्यीय बेंच ने यह भी आदेश दिया है कि हर ब्लॉक में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने के लिए अलग से फीडिंग स्पेस खोले जाएं और निर्धारित स्थान पर ही खाना दिया जाए। फीडिंग जोन के बाकायदा बोर्ड लगाए जाएं।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि स्थानीय निकाय विशेष हेल्पलाइन बनाएंगे, जहां कोर्ट के आदेश के उल्लंधन की शिकायतें मिलने पर कार्रवाई होगी।

साथ ही यह भी कहा कोर्ट के आदेश पर अमल से रोकनेवाले व्यक्ति या संगठन पर सरकारी कामकाज में बाधा डालने का मुकदमा चलाया जाएगा। अदालत के इस आदेश के खिलाफ चुनौती देनेवाले डॉग लवर को 25,000 रुपये और एनजीओ को 2 लाख रुपये कोर्ट में जमा कराने होंगे। यह राशि पशु कल्याण पर खर्च होगी। डॉग लवर आवारा कुत्तों को गोद लेने के लिए नगर निगम में अर्जी दे सकेंगे। उन्हें टैग लगाकर कुत्ता दिया जाएगा। उनकी यह जिम्मेदारी होगी कि वह कुत्ता सड़क पर न आए।

कहना जरूरी होगा कि भारत में लक्षद्वीप व मणिपुर दो राज्य ऐसे हैं, जहां एक भी कुत्ते नहीं है। उनने भी तो नसबंदी, टीकाकरण किया होगा और सख्ती दिखाया होगा।

इस समस्या के समाधान में उप्र का राजधानी शहर लखनऊ अतुलनीय है। लखनऊ में नसबंदी के उत्कृष्ठ केंद्र खोले जाकर पालतू कुत्तों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। यहां विदेशी नस्लों के कुत्तों के मालिकों को सालाना 500 रुपया अदा करना होता है। वहीं देशी कुत्तों को अपनानेवालों के लिए शुल्क में छूट है।

दुनिया में नीदरलैंड्स ऐसा पहला देश है, जहां की सरकार ने यह समस्या खत्म कर दी है। वहां की सरकारों ने नसबंदी और टीकाकरण करवाया। पालतू पशु सड़कों पर छोड़ना अवैध किया। लेकिन, यह भी कि नीदरलैंड्स भारत की तुलना में बहुत छोटा देश है। संभवतः, वहां इसीलिए कुत्तों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

क्या भारत की राज्य सरकारें लक्षद्वीप, मणिपुर व नीदरलैंड्स से प्रेरणा व सीख लेकर और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कर कुछ खास करेंगी और अपनी जनता को इन आवारा आतंकियों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेंगी? वस्तुतः, यह समस्या मानव जीवन और उसकी सुरक्षा से संबंधित है।

छग व अन्य राज्य सरकारों को यह भी अपरिहार्य रूप से करना चाहिए कि ग्रामपंचायतें भी आवारा पशुओं के नियंत्रण के लिए ऐसा महत्ती कार्य करें। तभी संपूर्ण रूप से इन आवारा आतंकियों पर लगाम लगाई जाकर नागरिकों का जीवन इनसे सुरक्षित किया जा सकेगा।
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समसामयिक रचना पढ़ने के लिए धन्यवाद। पढ़कर समीक्षा लिखिए और अपने दोस्तों को शेयर करना ना भूलिए।