उपनिषद in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | रुद्राक्षोपनिषद

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रुद्राक्षोपनिषद

रुद्राक्षोषनिषद--यह उपनिषद के क्रम में 97वें स्थान पर आता है,रुद्राक्षोपनिषद् (रुद्राक्षजाबालोपनिषद्) अथर्ववेद से सम्बद्ध एक लघु उपनिषद् है, जिसमें रुद्राक्ष की उत्पत्ति, महत्त्व, धारण-विधि और आध्यात्मिक फल का वर्णन मिलता है।रुद्राक्षजाबालोपनिषद् — सम्पूर्ण मंत्र एवं हिन्दी अर्थरुद्राक्षजाबालोपनिषद् शैव-परम्परा की उपनिषद् है। उपलब्ध पाठ-स्रोत इसे सामवेदान्तर्गत शैव उपनिषद् के रूप में प्रस्तुत करते हैं। १. मंगलाचरणरुद्राक्षोपनिषद्वेद्यं महारुद्रतयोज्ज्वलम् ।प्रतियोगिविनिर्मुक्तशिवमात्रपदं भजे ॥अर्थ:मैं उस परम शिव-तत्त्व का ध्यान करता हूँ, जो रुद्राक्ष-सम्बन्धी उपनिषद् द्वारा जाना जाता है, जो महान् रुद्र के तेज से प्रकाशित है और सभी द्वैत-विरोधों से रहित केवल शिवस्वरूप परम पद है।२. शान्ति-मंत्रॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च ।सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यांमा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तुतदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तुते मयि सन्तु ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:मेरे अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान, बल और सभी इन्द्रियाँ पुष्ट हों। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है और उपनिषदों का प्रतिपाद्य भी ब्रह्म ही है। मैं ब्रह्म का त्याग न करूँ और ब्रह्म भी मेरा त्याग न करे। उपनिषदों में बताए गए धर्म और ज्ञान मेरे भीतर स्थापित हों। मेरे भीतर आत्मतत्त्व में निरन्तर निष्ठा बनी रहे। शान्ति हो, शान्ति हो, शान्ति हो। रुद्राक्ष की उत्पत्तिहरिः ॐ । अथ हैनं कालाग्निरुद्रं भुसुण्डः पप्रच्छ—कथं रुद्राक्षोत्पत्तिः । तद्धारणात्किं फलमिति ।तं होवाच भगवान्कालाग्निरुद्रः—त्रिपुरवधार्थमहं निमीलिताक्षोऽभवम् ।तेभ्यो जलबिन्दवो भूमौ पतितास्ते रुद्राक्षा जाताः ।सर्वानुग्रहार्थाय तेषां नामोच्चारणमात्रेणदशगोप्रदानफलं दर्शनस्पर्शनाभ्यां द्विगुणं फलंअत ऊर्ध्वं वक्तुं न शक्नोमि ।अर्थ:भुसुण्ड ने भगवान् कालाग्निरुद्र से पूछा—हे भगवान्! रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई और उसे धारण करने का क्या फल है?कालाग्निरुद्र ने कहा—त्रिपुरासुरों के वध के उद्देश्य से मैंने अपनी आँखें बन्द कीं। जब मेरी आँखों से जल-बिन्दु पृथ्वी पर गिरे, तब उनसे रुद्राक्ष उत्पन्न हुए। प्राणियों पर अनुग्रह करने के लिए रुद्राक्ष का नाम मात्र लेने से दस गौदान के समान फल कहा गया है और उसे देखने तथा स्पर्श करने से उसका दुगुना फल बताया गया है। इसकी महिमा इससे आगे कहना कठिन है। ३. प्रश्नकस्मिंस्थितं तु किं नाम कथं वा धार्यते नरैः ।कतिभेदमुखान्यत्र कैर्मन्त्रैर्धार्यते कथम् ॥ १॥अर्थ:रुद्राक्ष कहाँ उत्पन्न हुआ? उसके क्या-क्या नाम और प्रकार हैं? मनुष्य उसे किस प्रकार धारण करे? उसके कितने मुख होते हैं और किस मंत्र से उसे धारण करना चाहिए?४. रुद्राक्ष की उत्पत्तिदिव्यवर्षसहस्राणि चक्षुरुन्मीलितं मया ।भूमावक्षिपुटाभ्यां तु पतिता जलबिन्दवः ॥ २॥अर्थ:मैंने दिव्य वर्षों के एक सहस्र काल तक अपनी आँखें बन्द रखीं। जब आँखें खोलीं, तब उनसे निकले जल-बिन्दु पृथ्वी पर गिर पड़े।तत्राश्रुबिन्दवो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः ।स्थावरत्वमनुप्राप्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ३॥अर्थ:वे अश्रु-बिन्दु महान् रुद्राक्ष-वृक्षों के रूप में उत्पन्न हुए और स्थावर रूप धारण करके भक्तों पर अनुग्रह करने का साधन बने।रुद्राक्ष धारण का फलभक्तानां धारणात्पापं दिवारात्रिकृतं हरेत् ।लक्षं तु दर्शनात्पुण्यं कोटिस्तद्धारणाद्भवेत् ॥ ४॥अर्थ:रुद्राक्ष धारण करने से दिन-रात किए गए पापों का नाश कहा गया है। उसके दर्शन से लाख गुना पुण्य और धारण करने से करोड़ गुना पुण्य प्राप्त होने की बात कही गई है।तस्य कोटिशतं पुण्यं लभते धारणान्नरः ।लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च ॥ ५॥अर्थ:रुद्राक्ष धारण करने वाले मनुष्य को अत्यन्त महान् पुण्य प्राप्त होता है। यहाँ उसकी महिमा को अत्यधिक संख्यात्मक उपमानों से व्यक्त किया गया है।तज्जपाल्लभते पुण्यं नरो रुद्राक्षधारणात् ।धात्रीफलप्रमाणं यच्छ्रेष्ठमेतदुदाहृतम् ॥ ६॥अर्थ:रुद्राक्ष धारण और उसके जप से मनुष्य पुण्य प्राप्त करता है। आँवले के फल के बराबर आकार का रुद्राक्ष श्रेष्ठ माना गया है।बदरीफलमात्रं तु मध्यमं प्रोच्यते बुधैः ।अधमं चणमात्रं स्यात्प्रक्रियैषा मयोच्यते ॥ ७॥अर्थ:बेर के फल के समान आकार वाला रुद्राक्ष मध्यम और चने के समान छोटा रुद्राक्ष अधम कहा गया है।रुद्राक्ष के वर्णब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति शिवाज्ञया ।वृथा जाताः पृथिव्यां तु तज्जातीयाः शुभाक्षकाः ॥ ८॥श्वेतास्तु ब्राह्मणा ज्ञेयाः क्षत्रिया रक्तवर्णकाः ।पीतास्तु वैश्या विज्ञेयाः कृष्णाः शूद्रा उदाहृताः ॥ ९॥अर्थ:इस प्राचीन पाठ में रुद्राक्षों के चार वर्ण बताए गए हैं—श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण—और उन्हें तत्कालीन वर्ण-व्यवस्था से जोड़ा गया है।ब्राह्मणो बिभृयाच्छ्वेतात्रक्तात्राजा तु धारयेत् ।पीतान्वैश्यस्तु बिभृयात्कृष्णाञ्छूद्रस्तु धारयेत् ॥ १०॥अर्थ:पाठ में श्वेत रुद्राक्ष को ब्राह्मण, रक्तवर्ण को क्षत्रिय, पीतवर्ण को वैश्य और कृष्णवर्ण को शूद्र से सम्बद्ध करके धारण करने की बात कही गई है। उत्तम रुद्राक्ष की पहचानसमाः स्निग्धा दृढाः स्थूलाः कण्टकैः संयुताः शुभाः ।कृमिदष्टं भिन्नभिन्नं कण्टकैर्हीनमेव च ॥ ११॥व्रणयुक्तमयुक्तं च षड्रुद्राक्षाणि वर्जयेत् ।स्वयमेव कृतं द्वारं रुद्राक्षं स्यादिहोत्तमम् ॥ १२॥अर्थ:जो रुद्राक्ष समान, चिकना, दृढ़, स्थूल तथा प्राकृतिक रेखाओं/कंटकों से युक्त हो, वह शुभ माना गया है। कीड़े से खाया हुआ, टूटा हुआ, छिद्र अथवा प्राकृतिक रेखाओं से रहित और दोषयुक्त रुद्राक्ष छोड़ देना चाहिए। जिसका छिद्र स्वाभाविक रूप से बना हो, वह श्रेष्ठ माना गया है।यत्तु पौरुषयत्नेन कृतं तन्मध्यमं भवेत् ।समान्स्निग्धान्दृढान्स्थूलान्क्षौमसूत्रेण धारयेत् ॥ १३॥अर्थ:जिसमें मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से छेद किया गया हो, उसे मध्यम कहा गया है। समान, चिकने, मजबूत और अच्छे रुद्राक्षों को सूत के धागे में धारण करना चाहिए।सर्वगात्रेण सौम्येन सामान्यानि विचक्षणः ।निकषे हेमरेखाभा यस्य रेखा प्रदृश्यते ॥ १४॥तदक्षममुत्तमं विद्यात्तद्धार्यं शिवपूजकैः ।अर्थ:जिस रुद्राक्ष का सम्पूर्ण शरीर सुडौल और सुंदर हो तथा कसौटी पर सोने जैसी रेखा दिखाई दे, उसे श्रेष्ठ समझना चाहिए। शिव-उपासक को ऐसे रुद्राक्ष धारण करने चाहिए। धारण करने की विधिशिखायामेकरुद्राक्षं त्रिशतं शिरसा वहेत् ।षट्त्रिंशतं गले दध्याद्बाहोः षोडश षोडश ।मणिबन्धे द्वादशैव स्कन्धे पञ्चशतं वहेत् ॥ १५–१६॥अर्थ:पाठ में शिखा, सिर, गला, दोनों भुजाओं, कलाई तथा कन्धों पर रुद्राक्ष धारण करने की विशिष्ट संख्याएँ बताई गई हैं।अष्टोत्तरशतैर्मालामुपवीतं प्रकल्पयेत् ।द्विसरं त्रिसरं वापि सराणां पञ्चकं तथा ॥ १७॥सराणां सप्तकं वापि बिभृयात्कण्ठदेशतः ।मुकुटे कुण्डले चैव कर्णिकाहारकेऽपि वा ॥ १८॥केयूरकटके सूत्रं कुक्षिबन्धे विशेषतः ।सुप्ते पीते सदाकालं रुद्राक्षं धारयेन्नरः ॥ १९॥अर्थ:१०८ रुद्राक्षों की माला बनाने का निर्देश मिलता है। दो, तीन, पाँच अथवा सात लड़ियों में भी धारण करने का उल्लेख है। मुकुट, कुण्डल, हार, बाजूबन्द आदि में भी रुद्राक्ष धारण करने की बात कही गई है। पाठ निरन्तर धारण करने की प्रशंसा करता है।त्रिशतं त्वधमं पञ्चशतं मध्यममुच्यते ।सहस्रमुत्तमं प्रोक्तमेवं भेदेन धारयेत् ॥ २०॥अर्थ:३०० रुद्राक्ष अधम, ५०० मध्यम और १००० उत्तम संख्या कही गई है।मंत्रपूर्वक धारणशिरसीशानमन्त्रेण कण्ठे तत्पुरुषेण तु ।अघोरेण गले धार्यं तेनैव हृदयेऽपि च ॥ २१॥अर्थ:सिर पर ईशान मंत्र, कण्ठ पर तत्पुरुष मंत्र और गले तथा हृदय पर अघोर मंत्र से रुद्राक्ष धारण करने का निर्देश है।अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत्सुधीः ।पञ्चाशदक्षग्रथितान्व्योमव्याप्यपि चोदरे ॥ २२॥अर्थ:बुद्धिमान साधक हाथों में अघोर-बीज मंत्र के साथ रुद्राक्ष धारण करे। उदर आदि पर भी निश्चित संख्या में रुद्राक्ष धारण करने का उल्लेख है।पञ्च ब्रह्मभिरङ्गैश्च त्रिमाला पञ्च सप्त च ।ग्रथित्वा मूलमन्त्रेण सर्वाण्यक्षाणि धारयेत् ॥ २३॥अर्थ:पञ्चब्रह्म मंत्रों तथा उनके अंगों से रुद्राक्ष की माला तैयार करके मूल मंत्र द्वारा सभी रुद्राक्षों को धारण करना चाहिए।रुद्राक्ष के मुख और उनके फलअब भुसुण्ड ने कालाग्निरुद्र से पूछा कि विभिन्न मुख वाले रुद्राक्षों का स्वरूप और फल क्या है। इसके उत्तर में निम्न श्लोक आते हैं। १. एकमुखीएकवक्त्रं तु रुद्राक्षं परतत्त्वस्वरूपकम् ।तद्धारणात्परे तत्त्वे लीयते विजितेन्द्रियः ॥ १॥अर्थ:एकमुखी रुद्राक्ष परम तत्त्व का स्वरूप है। इन्द्रियों को जीतने वाला व्यक्ति इसे धारण करके परम तत्त्व में लीन होता है।२. द्विमुखीद्विवक्त्रं तु मुनिश्रेष्ठ चार्धनारीश्वरात्मकम् ।धारणादर्धनारीशः प्रीयते तस्य नित्यशः ॥ २॥अर्थ:द्विमुखी रुद्राक्ष अर्धनारीश्वर स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से अर्धनारीश्वर प्रसन्न होते हैं।३. त्रिमुखीत्रिमुखं चैव रुद्राक्षमग्नित्रयस्वरूपकम् ।तद्धारणाच्च हुतभुक्तस्य तुष्यति नित्यदा ॥ ३॥अर्थ:त्रिमुखी रुद्राक्ष तीन अग्नियों के स्वरूप का प्रतीक है। इसके धारण से अग्निदेव की प्रसन्नता कही गई है।४. चतुर्मुखीचतुर्मुखं तु रुद्राक्षं चतुर्वक्त्रस्वरूपकम् ।तद्धारणाच्चतुर्वक्त्रः प्रीयते तस्य नित्यदा ॥ ४॥अर्थ:चतुर्मुखी रुद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा के स्वरूप का प्रतीक है। इसे धारण करने से ब्रह्मा की प्रसन्नता कही गई है।५. पंचमुखीपञ्चवक्त्रं तु रुद्राक्षं पञ्चब्रह्मस्वरूपकम् ।पञ्चवक्त्रः स्वयं ब्रह्म पुंहत्यां च व्यपोहति ॥ ५॥अर्थ:पंचमुखी रुद्राक्ष पंचब्रह्म का स्वरूप है। पाठ में इसे अत्यन्त पवित्र बताते हुए बड़े पापों के निवारण का फल कहा गया है।६. षण्मुखीषड्वक्त्रमपि रुद्राक्षं कार्तिकेयाधिदैवतम् ।तद्धारणान्महाश्रीः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् ॥ ६॥अर्थ:छहमुखी रुद्राक्ष के अधिदेवता कार्तिकेय हैं। इसे धारण करने से महान् समृद्धि और उत्तम आरोग्य प्राप्त होने की बात कही गई है।मतिविज्ञानसम्पत्तिशुद्धये धारयेत्सुधीः ।विनायकाधिदैवं च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७॥अर्थ:मनीषियों के अनुसार बुद्धि, विज्ञान और अन्तःकरण की शुद्धि के लिए इसे धारण करना चाहिए; इसका सम्बन्ध विनायक से भी बताया गया है।७. सप्तमुखीसप्तवक्त्रं तु रुद्राक्षं सप्तमाधिदैवतम् ।तद्धारणान्महाश्रीः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् ॥ ८॥अर्थ:सातमुखी रुद्राक्ष सप्तमातृका-तत्त्व से सम्बद्ध बताया गया है। इसके धारण से समृद्धि और आरोग्य का फल कहा गया है।८. अष्टमुखीमहती ज्ञानसम्पत्तिः शुचिर्धारणतः सदा ।अष्टवक्त्रं तु रुद्राक्षमष्टमात्राधिदैवतम् ॥ ९॥अर्थ:अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करने से ज्ञान-सम्पत्ति और पवित्रता प्राप्त होने की बात कही गई है। इसका सम्बन्ध अष्टमातृका से बताया गया है।वस्वष्टकप्रियं चैव गङ्गाप्रीतिकरं तथा ।तद्धारणादिमे प्रीता भवेयुः सत्यवादिनः ॥ १०॥अर्थ:यह अष्ट वसुओं को प्रिय और गंगा को प्रसन्न करने वाला कहा गया है। इसे धारण करने वाले के प्रति ये देवशक्तियाँ प्रसन्न होती हैं और सत्यनिष्ठा का गुण विकसित होता है।९. नवमुखीनववक्त्रं तु रुद्राक्षं नवशक्त्यधिदैवतम् ।तस्य धारणमात्रेण प्रीयन्ते नवशक्तयः ॥ ११॥अर्थ:नौमुखी रुद्राक्ष नौ शक्तियों का प्रतीक है। इसे धारण करने से नवशक्तियाँ प्रसन्न होती हैं।१०. दशमुखीदशवक्त्रं तु रुद्राक्षं यमदैवतमीरितम् ।दर्शनाच्छान्तिजनकं धारणान्नात्र संशयः ॥ १२॥अर्थ:दशमुखी रुद्राक्ष के अधिदेवता यम माने गए हैं। इसके दर्शन से शान्ति और धारण करने से विशेष आध्यात्मिक लाभ कहा गया है।११. एकादशमुखीएकादशमुखं त्वक्षं रुद्रैकादशदैवतम् ।तदिदं दैवतं प्राहुः सदा सौभाग्यवर्धनम् ॥ १३॥अर्थ:ग्यारहमुखी रुद्राक्ष ग्यारह रुद्रों का स्वरूप है। इसे सौभाग्यवर्धक बताया गया है।१२. द्वादशमुखीरुद्राक्षं द्वादशमुखं महाविष्णुस्वरूपकम् ।द्वादशादित्यरूपं च बिभर्त्येव हि तत्परम् ॥ १४॥अर्थ:बारहमुखी रुद्राक्ष को महाविष्णु का स्वरूप तथा बारह आदित्यों का रूप धारण करने वाला बताया गया है।१३. त्रयोदशमुखीत्रयोदशमुखं त्वक्षं कामदं सिद्धिदं शुभम् ।तस्य धारणमात्रेण कामदेवः प्रसीदति ॥ १५॥अर्थ:तेरहमुखी रुद्राक्ष कामनाओं की पूर्ति और सिद्धि देने वाला शुभ रुद्राक्ष कहा गया है। इसे धारण करने से कामदेव की प्रसन्नता मानी गई है।१४. चतुर्दशमुखीचतुर्दशमुखं चाक्षं रुद्रनेत्रसमुद्भवम् ।सर्वव्याधिहरं चैव सर्वदारोग्यमाप्नुयात् ॥ १६॥अर्थ:चौदहमुखी रुद्राक्ष रुद्र के नेत्र से उत्पन्न माना गया है। पाठ में इसे रोगों के निवारण और उत्तम आरोग्य का साधन बताया गया है।रुद्राक्ष धारण करने वाले के आचारमद्यं मांसं च लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च ।श्लेष्मातकं विड्वराहमभक्ष्यं वर्जयेन्नरः ॥ १७॥अर्थ:रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज आदि कुछ पदार्थों का त्याग करने का निर्देश दिया गया है।ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि च ।दर्शेषु पूर्णमासे च पूर्णेषु दिवसेषु च ।रुद्राक्षधारणात्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १८॥अर्थ:ग्रहण, विषुव, अयन, संक्रान्ति, अमावस्या, पूर्णिमा आदि विशेष पवित्र अवसरों पर रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य तत्काल पापों से मुक्त होता है—ऐसा उपनिषद् में कहा गया है।रुद्राक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररुद्राक्षमूलं तद्ब्रह्मा तन्नालं विष्णुरेव च ।तन्मुखं रुद्र इत्याहुस्तद्बिन्दुः सर्वदेवताः ॥ १९॥ इति ॥अर्थ:रुद्राक्ष के मूल भाग में ब्रह्मा, नाल/मध्य भाग में विष्णु, मुख में रुद्र और उसके बिन्दु में सभी देवताओं का निवास माना गया है। इस प्रकार सम्पूर्ण रुद्राक्ष को देवमय बताया गया है। रुद्राक्ष-धारण की विशेष महिमाइसके बाद सनत्कुमार आदि ऋषि कालाग्निरुद्र से रुद्राक्ष धारण की विधि पूछते हैं। कालाग्निरुद्र बताते हैं—रुद्रस्य नयनादुत्पन्ना रुद्राक्षा इति लोके ख्यायन्ते ।अथ सदाशिवः संहारकाले संहारं कृत्वासंहाराक्षं मुकुलीकरोति ।तन्नयनाज्जाता रुद्राक्षा इति होवाच ।तस्माद्रुद्राक्षत्वमिति कालाग्निरुद्रः प्रोवाच ॥अर्थ:लोक में प्रसिद्ध है कि रुद्राक्ष रुद्र के नेत्र से उत्पन्न हुए हैं। संहारकाल में सदाशिव जब संहार करते हैं, तब अपने संहारकारी नेत्र को बन्द करते हैं; उसी नेत्र से उत्पन्न होने के कारण इन्हें रुद्राक्ष कहा गया है। रुद्राक्ष को स्पर्श और धारण करने का फलतद्रुद्राक्षे वाग्विषये कृते दशगोप्रदानेनयत्फलमवाप्नोति तत्फलमश्नुते ।स एष भस्मज्योती रुद्राक्ष इति ।अर्थ:रुद्राक्ष के विषय में श्रद्धापूर्वक वाणी से उच्चारण करने पर भी दस गौदान के समान फल बताया गया है। इसे भस्म-ज्योति से सम्बद्ध पवित्र रुद्राक्ष कहा गया है।तद्रुद्राक्षं करेण स्पृष्ट्वा धारणमात्रेणद्विसहस्रगोप्रदानफलं भवति ।तद्रुद्राक्षे कर्णयोर्धार्यमाणेएकादशसहस्रगोप्रदानफलं भवति ।एकादशरुद्रत्वं च गच्छति ।तद्रुद्राक्षे शिरसि धार्यमाणेकोटिगोप्रदानफलं भवति ॥अर्थ:रुद्राक्ष को हाथ से स्पर्श करके धारण करने पर दो हजार गौदान के समान फल, कानों में धारण करने पर ग्यारह हजार गौदान के समान फल और सिर पर धारण करने पर करोड़ गौदान के समान फल बताया गया है। यह फल-वर्णन रुद्राक्ष की महिमा को अत्यन्त ऊँचे आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।रुद्राक्षजाबालोपनिषद् के पाठ का फलय इमां रुद्राक्षजाबालोपनिषदं नित्यमधीतेबालो वा युवा वा वेद स महान्भवति ।स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवतिएतैरेव होमं कुर्यात् । एतैरेवार्चनम् अर्थ:जो बालक, युवा अथवा कोई भी व्यक्ति इस रुद्राक्षजाबालोपनिषद् का नित्य अध्ययन करता है, वह महान् होता है। उसे मंत्रों का उपदेश देने योग्य गुरु-स्वरूप कहा गया है। इन्हीं मंत्रों से होम और पूजा करने का निर्देश है।तथा रक्षोघ्नं मृत्युतारकं गुरुणा लब्धंकण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नीत ।अर्थ:गुरु से प्राप्त रक्षात्मक और मृत्यु से तारने वाले रुद्राक्ष-मंत्र को कण्ठ, भुजा या शिखा में धारण करना चाहिए।पाठ करने की महिमासप्तद्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते ।तस्माच्छ्रद्धया यां काञ्चिद्गां दद्यात्सा दक्षिणा भवति ॥अर्थ:सात द्वीपों वाली सम्पूर्ण पृथ्वी भी गुरु-दक्षिणा के लिए पर्याप्त नहीं मानी गई है। इसलिए श्रद्धा से किसी एक गौ का दान भी दक्षिणा के रूप में किया जा सकता है।य इमामुपनिषदं ब्राह्मणः सायमधीयानोदिवसकृतं पापं नाशयति ।मध्याह्नेऽधीयानः षड्जन्मकृतं पापं नाशयति ।सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽनेकजन्मकृतं पापं नाशयति ॥अर्थ:इस उपनिषद् का सायंकाल पाठ करने से दिन में किए गए पापों के नाश का फल, मध्याह्न में पाठ से छह जन्मों के पापों के नाश का फल और प्रातः-सायं नियमित पाठ से अनेक जन्मों के पापों के नाश का फल बताया गया है।षट्सहस्रलक्षगायत्रीजपफलमवाप्नोति ।अर्थ:इसके पाठ से छह हजार लाख गायत्री-जप के समान फल प्राप्त होने की महिमा कही गई है।ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयगुरुदारगमनतत्संयोगपातकेभ्यः पूतो भवति ।सर्वतीर्थफलमश्नुते ।पतितसंभाषणात्पूतो भवति ।पङ्क्तिशतसहस्रपावनो भवति ।शिवसायुज्यमवाप्नोति ।न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तत इत्योंसत्यमित्युपनिषत् ॥अर्थ:उपनिषद् के अनुसार इसके नियमित अध्ययन से अत्यन्त गंभीर पापों से भी शुद्धि होती है, सभी तीर्थों के फल की प्राप्ति होती है, अशुद्ध संगति से उत्पन्न दोषों से मुक्ति होती है और अन्ततः शिव-सायुज्य, अर्थात् शिव के परम तत्त्व से एकत्व की प्राप्ति होती है। फिर संसार में पुनरागमन नहीं होता—ऐसा उपनिषद् का निष्कर्ष है।पुनः शान्ति-मंत्रॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च ।सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यांमा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तुतदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तुते मयि सन्तु ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:मेरे शरीर के सभी अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान, बल और इन्द्रियाँ पुष्ट हों। ब्रह्म के प्रति मेरी निष्ठा कभी न टूटे। उपनिषदों में प्रतिपादित सत्य, धर्म और आत्मज्ञान मेरे जीवन में स्थापित हों। आत्मा में मेरी निरन्तर स्थिति बनी रहे। तीनों प्रकार के तापों से शान्ति प्राप्त हो।इति रुद्राक्षजाबालोपनिषत्समाप्तासंक्षिप्त सारइस उपनिषद् का मुख्य संदेश केवल रुद्राक्ष पहनना नहीं है, बल्कि रुद्राक्ष को रुद्र-तत्त्व, आत्मशुद्धि, संयम, मंत्र-जप और शिव-चिन्तन का प्रतीक मानना है। इसमें १ से १४ मुख वाले रुद्राक्षों के अलग-अलग आध्यात्मिक सम्बन्ध बताए गए हैं तथा अन्त में रुद्राक्ष-साधना को शिव-सायुज्य तक पहुँचाने वाली साधना के रूप में महिमामण्डित किया गया है। ------×-------×------×-----//