SCENE 3.
"इसमें मेरी बेटी की तज़लील क्यों हुई, उसकी क्या ग़लती थी?" रेड कोर्ट पर बैठे हुए कम रंगत की पतली दुबली औरत हरे रंग की सारी शाही अंदाज़ से अरस्ता शेख़ बाबा से रानिया की तरफ़ की शिकायतें करने लगी।
जिस क़दर सन्नाटा महल में था, आज उतना ही तेज और शोर कोर्ट रूम में था। मीरास महल के लगभग सारे लोग कोर्ट रूम के बाहर उसके इर्द गिर्द जमा हम्ज़ा की बातें करते हुए उसकी सज़ा के इंतज़ार में थे।
अनाबी ने इस वक़्त अपने तरफ़ की शिकायतों कि झोली यहां पलट तो दिया मगर शेख़ बाबा का ध्यान इस वक़्त सिर्फ़ हम्ज़ा का गुनाह मंज़रे-आम करने में था। अनाबी के सवाल हम्ज़ा के हक़ में सुनकर उनका गुस्सा अनाबी पर बरस गया
"ख़ामोश हो जाइए अनाबी। क्या आप इस मामले से बे ख़बर है या बनना चाह रहीं हैं?..मुझे समझ नही आ रहा की आख़िर आप और रानिया इसके गुनाह पर पर्दा क्यों डालना चाहते है।"
शेख़ बाबा की दहाड़ ने कोर्ट रूम में कुछ पल की ख़ामोशी फैला दिया जिसमें सिर्फ उनकी आवाज़ गूंजी "मुझे इस तरह की उम्मीद नहीं थी....हालात सामने होते हुए भी हिमाक़त भरी बातें।"
अम्मा साहब काली सारी लपेटे, ब्लैक कोर्ट का तेज लिए सुरूर के साथ कोर्ट रूम में आ गईं।
उनके बैठते ही मामला आगे बढ़ा, शेख़ बाबा हम्ज़ा से सवालात करने लगे
"बताओ सबको ये क्यों और कैसे हुआ?"
"मैने ऐसा कुछ भी नही किया है, उन्होंने सच में मेरी बातों का ग़लत मतलब समझा।"
कोर्ट के सामने ज़य्यान के साथ खड़े कुछ सिपाहियो की गिरफ्त में घिरे हुए हम्ज़ा ने सबके डर से घबराते हुए आहिस्ता से वो जवाब दिया जो उसकी नज़र से सच था
"तुम्हारी मजाल के इस कमज़र्फी के बाद कोर्ट रूम में झूठ का सहारा ले रहे हो।" ज़य्यान ने कहा
सागर भाई ने उसे अपनी मयान से मारकर झुका दिया जिसपर उसने झुंझलाते हुए कहा
"नही, ये सच है।" वो अपनी ज़िद पर अड़ा रहा
"ख़ामोश.....।" एक बार फिर से शेख़ बाबा की गुर्राहट पर हम्ज़ा थरथरा उठा "सबको ग़लत बताकर क्या ख़ुद को सच्चा कहना चाहते हो तुम।" उन्होंने कोर्ट रूम में ख़ादिमा को आवाज़ लगाया "रुक्मणि उसे लेकर आओ।" उनके हुक्म पर वो दौड़ गई।
मैथिली जो हालात का जायेज़ा लेने आई थी अब अम्हेल की तरफ़ पलट गई। शेख़ बाबा के ख़ामोश होते ही एक सन्नाटा सा छा गया इतना की अब मैथिली के पायल की आवाज़ कोर्ट रूम में गूंजने लगी। हम्ज़ा समझ गया कि अब उसके बचने का कोई रास्ता नहीं बचा। थोड़ी ही देर में रुक्मणि के साथ मैथिली और अम्हेल आ कर सबके सामने खड़ी हो गई। ,अनाबी अम्हेल को ग़ौर से देखने लगी
"सबको बताओ क्या हुआ था।" शेख़ बाबा ने पूछा, अम्हेल ने बैठे सभी लोगों को देखा। उसकी आंखों में शेख़ बाबा को कई सवाल नज़र आए "बिना झिझक मेरे सवाल का जवाब दो अम्हेल ।"
अब अपने सवालों के खुले दरवाज़े को धड़ से बंद कर के अम्हेल सुबह का मंज़र सरे-आम करने लगी
"ऐवान-ए-सद्र से सबके चले जाने के बाद हम कुसुम की तलाश में बाहर निकले थे और वापस लौटने पर देखा की उसके हवास उसके क़ाबू में नहीं थे, और उस आलम में वो बदलेहाज़ी पर आमादा था।"
"उसे तन्हा क्यों छोड़ा था तुमने?"
"क्योंकि इसने कहा हम उनके पैरों के लिए गर्म पानी का इंतज़ाम करवां दें।"
"क्या तुमने जितनी बातें बताई सब सही हैं?"
"बिल्कुल सही।" इस दफ़ा अम्हेल का लहजा यक़ीनी था।
अम्हेल के जवाब ख़त्म होते ही शेख़ बाबा ने अपनी जगह छोड़ते हुए हम्ज़ा से कहा "क्या इसने जो कुछ बताया वो सही है?"
उनके सवाल के जवाब में उसके पास सिर्फ चुप्पी रही, उसने अपनी नज़रें झुका लिया क्योंकि वो भी इस नतीजे पर पहुंच चुका था की अब उसके पास देने के लिए कोई सफ़ाई नहीं है, और उसे सज़ा होना तय है। उसके हाल पर किसी को भी रहम न आया और शेख़ बाबा ने उसे उसकी सज़ा सुनाई
"पांच महीने इसे मीरास महल के आसीगाह में क़ैदी रखा जाएगा और उसके बाद इसे ये कस्बा हमेशा के लिए छोड़ देना होगा।" ये सज़ा किसी के लिए भी मामूली नहीं थी।
वो अब इस सज़ा को झुठला नही सकता था - इस दौरान हम्ज़ा अपनी छोटी बहन को याद करने लगा सिकंदर भाई उसे आसीगाह की तरफ़ ले जाने के लिए तयार हो गए तभी हम्ज़ा अपने घुटनो के बल गिर गया
"मेरी सज़ा सिर्फ़ मेरी है इसमें हया का कोई क़सूर नही है। मेरी गुज़ारिश है उसे इस ख़बर से दूर रखिए।"
महल को मालूम था कि ये उसकी बहन का अकेला सहारा है इसलिए उसकी इस गुज़ारिश को मान लिया गया मगर उसपर किसी तरह का रहम ना किया। सिकंदर भाई उसे आसीगाह की ओर ले गए। उसकी सज़ा पर इर्द गिर्द खड़े अफ़राद ख़ुश हो गए। इन सब के बाद इस घेरे में केसरी आ गई
"तुम्हे एक ज़िम्मेदारी सौंपी गई है जिसे पूरा करने में तुम नाकामयाब रही। इस पूरे वाक़ाये में मुझे तुम कहीं क्यों नज़र नही आई?" शेख़ बाबा ने गुस्से में पूछा
"मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझसे उन्होंने कहा था कि वो जबतक अम्मा साहब के साथ है उन्हें मेरी ज़रूरत नही।" केसरी ने डरते घबराते बताया
"और तुम फ़ौरन पीछे हट गई?"
"नहीं, मैने मना किया था।" उसके रोने पर शेख़ बाबा ने अम्मा साहब को देखा
"ये सच है ऐसा ही हुआ था।" अम्मा साहब की आहिस्ता से पीछे से हामी भर दिया। शेख़ बाबा ने थोड़ी सांस भरकर सभी के सामने ऐलान किया
"आइंदा ख़्याल रखा जाएगा की इस तरह की लापरवाही हरगिज़ न हो और ऐसे कोई भी फैसले मुझसे मशवरह किए बग़ैर नही लिया जाएगा।"
इसके बाद उन्होंने दूसरा ऐलान भी किया "अब इस वाक़ाये को कोई भी ना याद करेगा न दोहराएगा, जिस तरह वो वजूद में आया उस तरह उसे नेस्तोनाबूद कर दिया जाए।"
मीरास महल की चार दीवारियों के बीच जन्म लिए एक नए हादसे को कोर्ट रूम में फ़ौरन क़त्ल करके दफना दिया गया। हज़ारों दुख के बीच आज की दास्तान ने सबके दिल पर ऐसे कब्ज़ा किया की पुराने कई किस्सो को, कम से कम कुछ वक़्त के लिए, सभी भूल गए। शेख़ बाबा के हुक्म की तामील हुई मगर फिर भी मीरास महल से मुहब्बत करने वाले लोगो के चेहरे क़ब्र में दफ़न ताज़ा दुख का सोग मनाते दिखे।
कोर्ट रूम से निकलने के बाद नाश्ते की मेज़ पर किसी ने पानी को अपनी आंखों में छुपा मलाल दिखाया, वहीं कोई रोटियों को तोड़कर अपना सोग उसके साथ बांटने लगा और किसी के दिल पर आज दो ज़ख़्मों के ताज़ा निशान बना।
अम्हेल के सामने रखी रोटी को बड़ी मुश्किल से अम्हेल ने शेख़ बाबा के कहने पर ख़त्म किया और उन्होंने भी बड़ी मुश्किलों से 1 रोटी गले के नीचे उतारा। वक़्त बीत जाने के बाद सभी अपने रोज़मर्रा के कामों में लग तो गए मगर महल के खरोचे हुए हीरे, पामाल की हुई मीरास को दुबारा तराशने के लिए सभी अपने अंदर की उदासी को तहख़ाने में बंद करने की कोशिश करने लगे इस उम्मीद में की अहलम भी इस हादसे से जल्द से जल्द उभरकर पहले जैसी हो जाए।