कराची इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रात के समय मुसाफिरों की भारी भीड़ थी।
इमिग्रेशन काउंटर की कतार में एक अधेड़ उम्र का, रईस बिजनेसमैन खड़ा था—चेहरे पर सलीके से तराशी हुई हल्की सफेद दाढ़ी और मूंछें, आंखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा, सिर पर कराकुली टोपी और बदन पर पठानी सूट के ऊपर लेदर की बास्कट। उसके पास दुबई के एक इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारी 'शहरोज़ मलिक' का जाली लेकिन असली जैसा दिखने वाला पासपोर्ट था।
यह कोई और नहीं, बल्कि एजेंट नौशाद इब्राहिम खान था। उसने अपना हुलिया, चाल-ढाल और बोलने का लहज़ा इस कदर बदल लिया था कि एयरपोर्ट के हाई-टेक फेशियल रिकग्निशन कैमरे भी उसे ट्रेस नहीं कर पाए।
इमिग्रेशन अफसर ने पासपोर्ट पर मुहर लगाई और कहा, "वेलकम टू पाकिस्तान, मलिक साहब।"
नौशाद ने एक मधी हुई मुस्कान के साथ पासपोर्ट वापस लिया और एयरपोर्ट से बाहर निकल आया। कराची की उमस भरी हवा ने उसका स्वागत किया। बाहर आते ही उसने बिना नंबर प्लेट वाली एक लोकल टैक्सी पकड़ी और सीधे सदर इलाके के एक पुराने, वीरान पड़े सेफहाउस का रुख किया।
उस सीक्रेट ठिकाने पर पहुंचकर नौशाद ने अंदर से दरवाजा लॉक किया। उसने नकली दाढ़ी और चश्मा उतारा, ठंडे पानी से चेहरा धोया और फर्श के नीचे छुपा एक खास स्टील बॉक्स निकाला। अंदर साइलेंसर लगी ग्लॉक-19, कार्बन-फाइबर कॉम्बैट नाइफ, जैमर और एक डार्क-वेब लैपटॉप रखा था।
उसने तुरंत लैपटॉप ऑन किया। स्क्रीन पर डिजिटल टाइमर उल्टी गिनती गिन रहा था: 180:12:00। यानी अब उसके पास साढ़े सात दिन का वक्त बचा था।
नौशाद ने स्क्रीन पर हमदान मीर के सबसे महफूज़ ठिकाने—क्लिफ्टन में स्थित 'मीर पैलेस'—का सैटेलाइट मैप खोला। वह जानता था कि हमदान के उस किले में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सीधे अंदर घुसना मुमकिन नहीं था, इसलिए उसे हमदान को किसी बहाने बाहर खींचना था।
उसने डार्क-वेब के जरिए हमदान की शिपिंग कंपनियों और प्राइवेट मीटिंग्स का डेटा खंगालना शुरू कर दिया। साथ ही, उसने अज़गर के लिए एक एनक्रिप्टेड सेफ-लाइन भी एक्टिवेट कर दी ताकि उसके कराची पहुंचते ही आगे का जाल बिछाया जा सके।
नौशाद ने अपनी पिस्टल में मैगज़ीन चढ़ाई, साइलेंसर कसा और अंधेरे में घूरते हुए खुद से कहा:
"तेरी ही मांद में आ चुका हूँ हमदान... अब इस खेल का फैसला यहीं होगा।"
लैपटॉप की नीली रोशनी में नौशाद की आँखें लगातार डेटा खंगाल रही थीं। डार्क-वेब के जरिए हमदान की पर्सनल सेक्रेटरी के एनक्रिप्टेड कैलेंडर को हैक करते ही स्क्रीन पर एक हाई-प्रोफाइल इवेंट की डिटेल चमक उठी।
कराची के सबसे महंगे इलाके डिफेंस फेज-8 में पाकिस्तान के एक पुराने रसूखदार नवाबी घराने में बहुत बड़ी शादी होने जा रही थी। शहर के तमाम राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स और अंडरवर्ल्ड के सफेदपोश चेहरे उस शादी में शरीक होने वाले थे।
लेकिन नौशाद की नज़र उस शादी के मेन हॉल से ज्यादा बैंक्वेट के नीचे बने एक खास अंडरग्राउंड हिस्से पर टिक गई।
हमदान मीर का असल मकसद शादी की दावत नहीं थी। वह सिर्फ दुनिया की आँखों में धूल झोंकने और किसी भी शक से बचने के लिए शादी में शरीक होने का नाटक करने वाला था। असल खेल तो बैंक्वेट हॉल के नीचे मौजूद एक साउंडप्रूफ, सीक्रेट ऑफिस में होना था, जहाँ वह यूरोप के एक बड़े हथियार सप्लायर के साथ 500 मिलियन डॉलर की एक खतरनाक इंटरनेशनल डील फाइनल करने जा रहा था।
नौशाद के चेहरे पर एक सर्द मुस्कान आ गई।
शिकार खुद अपनी मांद से बाहर निकलकर एक ऐसी जगह आ रहा था जहाँ भीड़भाड़ का फायदा उठाया जा सकता था। नौशाद ने तुरंत अपने पुराने ब्लैक-मार्केट कॉन्टैक्ट्स और सीक्रेट डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल किया। कुछ ही मिनटों में उसने शादी के वीआईपी गेस्ट्स के डेटाबेस में सेंध लगाई और दुबई के एक बड़े इन्वेस्टमेंट बैंकर 'नवाबजादा कामरान रज़ा' के नाम का असली डिजिटल इनविटेशन कार्ड और बायोमेट्रिक वीआईपी एक्सेस पास जनरेट कर लिया।
अगली शाम, नौशाद ने अपना नया हुलिया तैयार किया।
उसने एक काले रंग की रॉयल शेरवानी पहनी, जिसकी कलाई पर हीरे के कफ़लिंक्स चमक रहे थे। आंखों पर एक पतला गोल्ड-फ्रेम चश्मा, हाथ में क्लासिक रोलेक्स और चेहरे पर एक नवाबी रईसी का बेपरवाह अंदाज़। उसकी शेरवानी के अंदरूनी अस्तर में साइलेंसर वाली स्लिम मिनी-पिस्टल, कलाई की घड़ी में लेज़र कटर और कान में एक ट्रांसपेरेंट माइक्रो-कॉम छिपा था।
रात के ठीक आठ बजे, नौशाद एक किराए की शानदार विंटेज रोल्स रॉयस से उतरकर उस जगमगाते नवाबी पैलेस के मुख्य गेट पर पहुंचा।
गेट पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड्स ने उसका वीआईपी पास स्कैन किया। स्क्रीन पर हरी बत्ती जल उठी। गार्ड ने झुककर सलाम किया, "तशरीफ़ लाइए कामरान साहब।"
नौशाद ने एक मधी हुई मुस्कान के साथ सिर हिलाया और उस भव्य शादी के हॉल में दाखिल हो गया। चारों तरफ रौशनी, संगीत और अमीरों की भीड़ थी, लेकिन नौशाद की नज़रें केवल एक ही चेहरे को ढूंढ रही थीं—हमदान मीर।