रात का समय था… रेगिस्तान अपनी गहरी खामोशी में डूबा हुआ था, लेकिन उस खामोशी के भीतर भी एक अजीब सी बेचैनी तैर रही थी। हवा आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ चल रही थी ऐसी कि रेत के कण उड़-उड़कर आसमान से बातें करने लगें। दूर-दूर तक फैली वीरानी में बस हवा की सनसनाहट थी, और बीच-बीच में किसी सूखे पेड़ की टहनी के टूटने की आवाज़ जैसे कोई अनकहा राज़ धीरे-धीरे टूट रहा हो। उस रात चाँद भी पूरा नहीं था आधा था… जैसे आसमान ने भी कुछ छुपा रखा हो। उसी वीरान किनारे पर, जहाँ रेत खत्म होकर पानी की लहरों से मिलती थी, एक औरत खड़ी थी उसकी साँसें तेज़ थीं, और हाथों में एक छोटी सी टोकरी कसकर पकड़ी हुई थी। उस टोकरी के भीतर… एक नवजात बच्ची थी
सस्सी–पुन्नू - 1
रात का समय था…रेगिस्तान अपनी गहरी खामोशी में डूबा हुआ था, लेकिन उस खामोशी के भीतर भी एक अजीब बेचैनी तैर रही थी। हवा आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ चल रही थीऐसी कि रेत के कण उड़-उड़कर आसमान से बातें करने लगें। दूर-दूर तक फैली वीरानी में बस हवा की सनसनाहट थी, और बीच-बीच में किसी सूखे पेड़ की टहनी के टूटने की आवाज़ जैसे कोई अनकहा राज़ धीरे-धीरे टूट रहा हो। उस रात चाँद भी पूरा नहीं था आधा था… जैसे आसमान ने भी कुछ छुपा रखा हो।उसी वीरान किनारे पर, जहाँ रेत खत्म होकर पानी की लहरों ...Read More
सस्सी–पुन्नू - 2
सुबह की हल्की रोशनी धीरे-धीरे रेगिस्तान की ठंडी रेत पर फैल रही थी… रात की ठंड अब भी हवा बची हुई थी, लेकिन सूरज की पहली किरणें उसे अपने अंदर समेटने लगी थीं। उसी किनारे के पास, जहाँ रात को लहरों ने एक अनजाना फैसला अपने साथ बहा लिया था, अब सब कुछ फिर से सामान्य लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो… जैसे उस रात की सच्चाई बस हवा में घुलकर खो गई हो।नदी के पास बसे छोटे से बसेरे में एक साधारण सा घर था मिट्टी की दीवारें, ऊपर खपरैल की छत… और बाहर बंधी ...Read More
सस्सी–पुन्नू - 3
दोपहर का वक्त था…सूरज आसमान के बिल्कुल बीचों-बीच ठहरा हुआ था, और उसकी तपिश रेत को इस तरह जला थी जैसे हर कण में आग भर दी गई हो। हवा चल तो रही थी, पर उसमें ठंडक नहीं थीबस गर्मी का बोझ था, जो साँसों के साथ भीतर उतरता चला जाता था। दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान अपनी उसी पुरानी खामोशी में डूबा था… लेकिन उस खामोशी के भीतर अब एक हल्की-सी हलचल थी जैसे कोई कहानी धीरे-धीरे आकार ले रही हो।सस्सी अब बच्ची नहीं रही थी।वक्त ने उसकी मासूमियत को छुआ नहीं था… बस उसे और गहरा कर दिया ...Read More
सस्सी–पुन्नू - 4
सुबह का उजाला धीरे-धीरे रेगिस्तान की ठंडी रेत पर फैल रहा था… रात की नमी अभी पूरी तरह गई थी, और हवा में एक हल्की-सी ठंडक बाकी थी, जो हर साँस के साथ अंदर उतरकर मन को शांत कर देती थी। आसमान हल्का नीला था,और सूरज अभी क्षितिज के किनारे से झाँक रहा थाजैसे धीरे-धीरे दुनिया को जगाने की तैयारी कर रहा हो। गाँव अपनी रोज़ की लय में जागने लगा था… कहीं चूल्हे जलने की खुशबू, कहीं पानी भरने जाती औरतों की धीमी बातेंऔर इन सबके बीच, सस्सी अपने आँगन में खड़ी थी—चुप, स्थिर… जैसे किसी अनकहे एहसास ...Read More
सस्सी–पुन्नू - 5
शाम पूरी तरह ढल चुकी थी…आसमान अब गहरे नीले रंग में डूब गया था, और उसमें टिमटिमाते तारे ऐसे रहे थे जैसे किसी ने काली चादर पर छोटे-छोटे दीप जला दिए हों। हवा अब ठंडी हो गई थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी खामोशी थीऐसी खामोशी, जो सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी उतरती चली जाती है। सस्सी धीरे-धीरे घर की ओर लौट रही थी… उसके कदम हल्के थे, पर मन भारी। रेत पर चलते हुए उसके पैरों के निशान पीछे छूटते जा रहे थेजैसे हर कदम के साथ वो खुद को कहीं पीछे छोड़ती जा रही हो।घर के आँगन में ...Read More
सस्सी–पुन्नू - 6
सुबह अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी… आसमान हल्का-सा धुँधला था, जैसे रात और दिन के बीच कोई समझौता चल रहा हो। हवा में ठंडक थी, पर उसके भीतर एक हल्की-सी बेचैनी भी घुली हुई थी जैसे आज कुछ अलग होने वाला हो। सस्सी बहुत जल्दी उठ गई थी, बिना किसी वजह के… या शायद एक ऐसी वजह के साथ, जिसे वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसने आँगन में कदम रखा, और कुछ पल वहीं खड़ी रह गई सिर्फ हवा को महसूस करते हुए… जैसे वही उसे कुछ बताने वाली हो।गाँव धीरे-धीरे जाग रहा था, ...Read More