सुबह की हल्की रोशनी धीरे-धीरे रेगिस्तान की ठंडी रेत पर फैल रही थी… रात की ठंड अब भी हवा में बची हुई थी, लेकिन सूरज की पहली किरणें उसे अपने अंदर समेटने लगी थीं। उसी किनारे के पास, जहाँ रात को लहरों ने एक अनजाना फैसला अपने साथ बहा लिया था, अब सब कुछ फिर से सामान्य लग रहा था
जैसे कुछ हुआ ही न हो… जैसे उस रात की सच्चाई बस हवा में घुलकर खो गई हो।
नदी के पास बसे छोटे से बसेरे में एक साधारण सा घर था मिट्टी की दीवारें, ऊपर खपरैल की छत… और बाहर बंधी एक पुरानी रस्सी, जिस पर भीगे कपड़े सूख रहे थे।
इस घर में रहने वाले लोग ज़्यादा कुछ नहीं थे
बस एक दंपत्ति, जिनकी ज़िंदगी साधारण थी, लेकिन दिल बहुत बड़ा था। वो लोग हर दिन की तरह अपने काम में लगे हुए थे, बिना ये जाने कि आज उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।
तभी…
दरवाज़े के बाहर हल्की सी आवाज़ आई जैसे कुछ खिसककर रेत पर रुका हो।
औरत ने चौंककर दरवाज़े की तरफ देखा।
“सुना तुमने?” उसने धीमे से कहा।
आदमी ने पहले अनदेखा किया… लेकिन आवाज़ फिर आई इस बार थोड़ी साफ़।
दोनों बाहर आए।
दरवाज़े के सामने… रेत पर…
एक टोकरी पड़ी थी।
वो टोकरी, जो रात की लहरों के साथ बहती हुई यहाँ तक पहुँची थी… अब बिल्कुल खामोश थी।
औरत के कदम अपने आप उसकी तरफ बढ़ने लगे… जैसे दिल ने पहले ही कुछ पहचान लिया हो। उसने धीरे से टोकरी का कपड़ा हटाया
और उसी पल…
उसकी साँस रुक गई।
अंदर
एक नन्ही सी बच्ची थी।
ज़िंदा।
उसकी आँखें बंद थीं, साँसें हल्की थीं… लेकिन वो थी।
वो इस दुनिया में थी…
और जैसे अपनी मौजूदगी से ही एक सवाल पूछ रही थी
“क्या मुझे यहाँ रहने दोगे?”
औरत की आँखों में आँसू भर आए
उसने बिना सोचे उसे गोद में उठा लिया इतनी नर्मी से, जैसे वो कोई टूटता हुआ सपना हो।
“ये… ये तो भगवान का इशारा है…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
आदमी कुछ पल चुप रहा
उसकी नज़र उस बच्ची पर थी, फिर अपनी पत्नी पर
“पर लोग क्या कहेंगे?” उसने धीरे से कहा।
“लोग क्या कहते हैं, वो हमने कब सुना?”
इस बार औरत की आवाज़ में डर नहीं था… एक अजीब सा हौसला था।
उसने बच्ची को और कसकर अपने सीने से लगा लिया…
जैसे वो उसे किसी से छीनकर लाई हो।
ये अब हमारी है
उस एक पल में
कोई खून का रिश्ता नहीं बना
पर एक अपनापन पैदा हुआ, जो शायद उससे भी गहरा था।
उस दिन उस घर में पहली बार एक ऐसी हँसी गूँजी, जो पहले कभी नहीं आई थी।
एक सूना आँगन… अब किसी के आने से भर गया था।
उन्होंने उसका नाम रखा
“सस्सी”
दिन बीतने लगे…
सस्सी धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।
उसकी हँसी पूरे घर में गूंजती थी
उसकी छोटी-छोटी बातें, उसकी आँखों की चमक सब कुछ अलग था।
लेकिन
हर कहानी में एक खामोश सच होता है
जो सही वक्त आने पर सामने आता है।
कभी-कभी, जब सस्सी आईने में खुद को देखती
तो उसे एक अजीब सा एहसास होता।
वो बाकी बच्चों जैसी नहीं थी।
उसकी आँखों में कुछ और था
उसके चेहरे में कुछ ऐसा, जो इस घर से मेल नहीं खाता था।
“अम्मा… मैं बाकी सब जैसी क्यों नहीं दिखती?”
एक दिन उसने मासूमियत से पूछा।
औरत एक पल के लिए रुक गई
उसके चेहरे पर हल्की सी घबराहट आई, जिसे उसने तुरंत छुपा लिया।
“क्योंकि तू सबसे अलग है…”
उसने मुस्कुराकर कहा, लेकिन उसकी आँखों में वो मुस्कान नहीं पहुँची।
सस्सी ने कुछ और नहीं पूछा
पर उस दिन उसके अंदर एक छोटा सा सवाल जन्म ले चुका था।
शाम ढल रही थी
सूरज धीरे-धीरे रेत के पीछे छिप रहा था।
सस्सी आँगन में बैठी थी…
उसकी नज़र दूर आसमान पर थी
जैसे वो कुछ ढूँढ रही हो, जो उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था।
हवा हल्की थी
पर उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी चल रही थी।
जैसे उसकी कहानी
अभी शुरू ही होने वाली हो।