Sassi–Punnu – 5 in Hindi Mythological Stories by Aarushi Singh Rajput books and stories PDF | सस्सी–पुन्नू - 5

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सस्सी–पुन्नू - 5

शाम पूरी तरह ढल चुकी थी…

आसमान अब गहरे नीले रंग में डूब गया था, और उसमें टिमटिमाते तारे ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने काली चादर पर छोटे-छोटे दीप जला दिए हों। हवा अब ठंडी हो गई थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी खामोशी थी

ऐसी खामोशी, जो सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी उतरती चली जाती है। सस्सी धीरे-धीरे घर की ओर लौट रही थी… उसके कदम हल्के थे, पर मन भारी। रेत पर चलते हुए उसके पैरों के निशान पीछे छूटते जा रहे थे

जैसे हर कदम के साथ वो खुद को कहीं पीछे छोड़ती जा रही हो।

घर के आँगन में पहुँचते ही उसने देखा

उसकी माँ चूल्हे के पास बैठी थी। आग की हल्की-हल्की लौ उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और उस रोशनी में उसकी आँखों की थकान साफ़ दिख रही थी। सस्सी कुछ पल वहीं खड़ी रही… चुपचाप… जैसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन शब्द उसके पास नहीं थे। फिर वो धीरे-से आकर माँ के पास बैठ गई।

कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही…

सिर्फ चूल्हे में जलती लकड़ियों की आवाज़ थी टूटती, सुलगती… जैसे कोई पुरानी बात फिर से जल उठी हो।
“अम्मा…”

आखिरकार सस्सी ने धीमे से पुकारा।

माँ ने उसकी तरफ देखा

“हाँ, बोल बेटी…”

सस्सी ने कुछ पल उसकी आँखों में देखा…

फिर नज़र झुका ली।

“क्या… हर इंसान को पता होता है कि वो कौन है?”
ये सवाल अचानक था… लेकिन पूरी तरह अनजाना नहीं।
माँ के चेहरे पर एक पल के लिए वही पुरानी घबराहट उभरी जो वो हर बार छुपा लेती थी।

“क्यों पूछ रही है?”

उसने सामान्य बनने की कोशिश की।

सस्सी ने गहरी साँस ली…

“बस… ऐसा लगता है… जैसे मैं खुद को जानती ही नहीं हूँ।”
ये कहते वक्त उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें सच्चाई थी सीधी, बिना किसी आड़ के।

माँ कुछ पल चुप रही

फिर उसने अपना हाथ सस्सी के सिर पर रखा—बहुत हल्के से।

“हर किसी को सब कुछ जानना जरूरी नहीं होता…”
उसने कहा,

“कुछ बातें वक्त पर खुद सामने आती हैं।”

सस्सी ने उस जवाब को सुना…

पर उसके मन में उठती हलचल शांत नहीं हुई।
क्योंकि अब उसके सवाल सिर्फ शब्द नहीं थे 
वो एहसास बन चुके थे।

उस रात…

सस्सी को नींद नहीं आई।

वो अपने बिस्तर पर लेटी थी, लेकिन उसकी आँखें छत पर टिकी थीं। बाहर हवा चल रही थी

धीमी, लेकिन लगातार… जैसे कोई उसे पुकार रहा हो। हर बार जब वो आँखें बंद करती, तो उसे वही एहसास घेर लेता—कि वो कहीं और की है… कि उसकी कहानी इस छोटे से घर से शुरू नहीं हुई।

वो उठकर बाहर आ गई।

आँगन में चाँदनी फैली हुई थी… हल्की, ठंडी… और बहुत शांत। उसने आसमान की तरफ देखा—तारे वैसे ही थे, जैसे हर रात होते हैं… लेकिन आज, उन्हें देखते हुए उसे लगा जैसे वो उससे कुछ कह रहे हैं।

“मैं… सच में कौन हूँ?”

उसने फिर से खुद से पूछा।

और इस बार…

उस सवाल के साथ उसकी आँखों में हल्की-सी नमी भी आ गई।

अगली सुबह…

गाँव अपनी रोज़ की तरह जाग चुका था।

कुएँ के पास औरतों की भीड़ थी हँसी, बातें, रोज़मर्रा की शिकायतें… सब कुछ वैसे ही था। सस्सी भी वहाँ पहुँची, अपने घड़े के साथ। वो हमेशा की तरह चुपचाप अपने काम में लगी रही… लेकिन आज उसकी नज़रें बार-बार इधर-उधर जा रही थीं—जैसे वो कुछ ढूँढ रही हो, जिसे वो खुद भी नहीं समझ पा रही थी।

तभी, पास खड़ी दो औरतों की धीमी बातें उसके कानों में पड़ीं 

“सुना है… कल एक बड़ा काफिला आने वाला है।”
एक ने कहा।

“हाँ, बलोचिस्तान से… बहुत बड़े लोग होते हैं वहाँ के…”
दूसरी ने जवाब दिया।

“कहते हैं, उनके साथ एक राजकुमार भी है…”

सस्सी के हाथ एक पल के लिए रुक गए।

उसने अनजाने में उन औरतों की तरफ देखा…

फिर तुरंत नज़र हटा ली।

लेकिन उसके दिल में…

एक हल्की-सी हलचल उठ चुकी थी।

क्यों—वो नहीं जानती थी।

दिन धीरे-धीरे बीतता गया…

पर वो एक बात, जो उसने सुबह सुनी थी—बार-बार उसके मन में लौटकर आ रही थी।

एक काफिला…

दूर कहीं से…

और उसके साथ कोई, जो इस दुनिया से थोड़ा अलग है।
सस्सी खुद से सवाल करती रही 

“मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है?”

लेकिन दिल…

हर बार वही जवाब देता 

“शायद… कुछ बदलने वाला है।”

शाम ढलने लगी…

आसमान फिर से उसी सुनहरे रंग में रंग गया।

सस्सी अपने घर के बाहर खड़ी थी…

उसकी नज़र दूर रास्ते पर थी—जहाँ से कभी-कभी काफिले गुजरते थे।

हवा हल्की थी…

पर उसके दिल की धड़कनें थोड़ी तेज़।

वो खुद भी नहीं समझ पा रही थी

कि वो इंतज़ार कर रही है… या बस यूँ ही देख रही है।
लेकिन कहीं न कहीं…

उसके अंदर एक एहसास जाग चुका था 

जैसे