आसमान हल्का-सा धुँधला था, जैसे रात और दिन के बीच कोई खामोश समझौता चल रहा हो। हवा में ठंडक थी, पर उसके भीतर एक हल्की-सी बेचैनी भी घुली हुई थी जैसे आज कुछ अलग होने वाला हो।
सस्सी बहुत जल्दी उठ गई थी, बिना किसी वजह के… या शायद एक ऐसी वजह के साथ, जिसे वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसने आँगन में कदम रखा, और कुछ पल वहीं खड़ी रह गई सिर्फ हवा को महसूस करते हुए… जैसे वही उसे कुछ बताने वाली हो।
गाँव धीरे-धीरे जाग रहा था, लेकिन आज उसकी लय में कुछ बदला हुआ था। लोग सामान्य से थोड़ा ज़्यादा जल्दी उठे थे, और उनके चेहरों पर एक हल्की-सी उत्सुकता थी। बच्चों की आवाज़ें थोड़ी तेज़ थीं, और औरतों की बातें कुछ ज़्यादा फुसफुसाहट में बदल गई थीं।
सस्सी ने ये सब देखा… पर कुछ कहा नहीं। वो बस चुपचाप अपने काम में लगी रही, लेकिन उसका ध्यान बार-बार बाहर की तरफ चला जाता—उस रास्ते की ओर, जहाँ से काफिले गुजरते थे।
दिन चढ़ने लगा… सूरज ऊपर आने लगा… और उसके साथ ही गर्मी भी। रेत धीरे-धीरे तपने लगी, और हवा में वही सूखी गर्माहट लौट आई, जो इस जगह की पहचान थी। लेकिन आज उस गर्मी के बावजूद, गाँव के लोग बार-बार उसी दिशा में देख रहे थे
जैसे किसी का इंतज़ार हो। सस्सी भी खुद को रोक नहीं पाई… उसने घड़ा नीचे रखा और घर के बाहर आकर खड़ी हो गई।
दूर… बहुत दूर…
रेत के पार…
एक हल्का-सा धुंधला साया दिखाई दे रहा था।
पहले तो वो बस एक भ्रम-सा लगा…
लेकिन धीरे-धीरे वो साया साफ़ होने लगा।
ऊँटों की लंबी कतार…
उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज़ हवा में घुलने लगी
धीमी, लयबद्ध… जैसे कोई पुराना गीत।
काफिला आ रहा था।
गाँव में हलचल बढ़ गई… बच्चे दौड़ने लगे, औरतें अपने काम छोड़कर बाहर आ गईं… मर्द रास्ते के किनारे खड़े होकर देखने लगे। हर किसी की आँखों में जिज्ञासा थी
कौन हैं ये लोग? कहाँ से आए हैं? क्या लेकर आए हैं?
सस्सी भी वहीं खड़ी थी…
लेकिन उसका मन बाकी सबसे अलग था।
वो काफिले को देख रही थी
ध्यान से… जैसे उसकी नज़र किसी खास चीज़ को ढूँढ रही हो, जिसे वो खुद भी नहीं पहचानती।
काफिला अब और पास आ चुका था।
ऊँटों के कदम रेत पर गहरे निशान छोड़ते जा रहे थे… और उनके साथ चलने वाले लोग अलग पोशाक, अलग अंदाज़… उनकी मौजूदगी में एक अजीब-सी ठहराव था। ये लोग इस गाँव के नहीं थे—ये साफ़ दिख रहा था।
और फिर…
सस्सी की नज़र एक जगह जाकर ठहर गई।
एक ऊँट के पास….
चलता हुआ एक युवक।
उसका चेहरा पूरी तरह साफ़ नहीं दिख रहा था… धूप और धूल के बीच धुंधला-सा… लेकिन उसकी चाल में एक अजीब-सी शांति थी
जैसे उसे कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं हो। उसकी आँखें इधर-उधर नहीं भटक रही थीं… वो सीधा देख रहा था, जैसे अपने ही ख्यालों में खोया हुआ हो।
सस्सी का दिल एक पल के लिए तेज़ धड़क उठा।
उसने समझने की कोशिश की—ये क्या है?
क्यों उसकी नज़र बार-बार उसी पर जा रही है?
वो खुद को समझाती रही
“ये बस एक काफिला है… रोज़ आते हैं…”
लेकिन दिल… मानने को तैयार नहीं था।
काफिला धीरे-धीरे गाँव के बीच से गुजरने लगा।
कुछ लोग रुककर पानी लेने लगे… कुछ ने आस-पास देखा… और कुछ बस चलते रहे।
उस युवक ने भी एक पल के लिए अपना कदम धीमा किया… और तभी
उसकी नज़र सस्सी से मिली।
बस एक पल के लिए।
ना कोई मुस्कान…
ना कोई इशारा…
सिर्फ एक सीधी, खामोश नज़र।
लेकिन उस एक पल में
जैसे समय रुक गया।
सस्सी ने कुछ नहीं कहा…
वो बस खड़ी रही।
और फिर
वो नज़र हट गई।
काफिला आगे बढ़ता गया…
धीरे-धीरे… जैसे आया था, वैसे ही दूर होता गया।
आवाज़ें कम होने लगीं…
घंटियों की धुन हल्की पड़ गई…
और फिर… बस रेत रह गई।
खामोश… वैसी ही, जैसी पहले थी।
लेकिन सस्सी के अंदर
कुछ बदल चुका था।
वो वहीं खड़ी रही… काफी देर तक…
उस रास्ते को देखती हुई, जहाँ अब कुछ नहीं था।
उसने धीरे से अपनी साँस छोड़ी…
जैसे अभी तक वो उसे रोककर रखे हुए थी।
वो पल…
वो नज़र…
उसके मन में कहीं गहराई में उतर चुकी थी।
और शायद
उसे खुद भी अभी ये समझ नहीं आया था कि
ये सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी…
ये उसकी कहानी का मोड़ था।