दोपहर का वक्त था…
सूरज आसमान के बिल्कुल बीचों-बीच ठहरा हुआ था, और उसकी तपिश रेत को इस तरह जला रही थी जैसे हर कण में आग भर दी गई हो। हवा चल तो रही थी, पर उसमें ठंडक नहीं थी
बस गर्मी का बोझ था, जो साँसों के साथ भीतर उतरता चला जाता था। दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान अपनी उसी पुरानी खामोशी में डूबा था…
लेकिन उस खामोशी के भीतर अब एक हल्की-सी हलचल थी
जैसे कोई कहानी धीरे-धीरे आकार ले रही हो।
सस्सी अब बच्ची नहीं रही थी।
वक्त ने उसकी मासूमियत को छुआ नहीं था… बस उसे और गहरा कर दिया था। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक थी
न सिर्फ खूबसूरती की, बल्कि उस अनजाने एहसास की, जो उसे बाकी सबसे अलग बनाता था। उसकी आँखें… उनमें जैसे कोई दूर की दुनिया बसती थी एक ऐसी दुनिया, जिसका रास्ता उसे खुद भी नहीं पता था।
गाँव की औरतें अक्सर जब उसे देखतीं, तो एक पल के लिए ठहर जातीं।
“ये लड़की… किसी आम घर की नहीं लगती…”
उनकी फुसफुसाहट हवा में तैरती रहती।
और सस्सी…
वो सब सुनती थी।
हर शब्द उसके अंदर कहीं जाकर टिक जाता था
जैसे कोई अधूरी पहेली, जिसका जवाब उसे चाहिए था।
उस दिन भी…
वो अपने घर के छोटे से कमरे में बैठी थी, जहाँ एक पुराना सा आईना दीवार पर टंगा था।
आईना थोड़ा टूटा हुआ था, किनारों से धुंधला… लेकिन इतना साफ कि उसमें चेहरा दिख सके।
सस्सी धीरे-धीरे उसके सामने गई…
कुछ पल बस खुद को देखती रही।
उसने अपने चेहरे को छुआ
आँखों को, गालों को…
जैसे पहली बार खुद को पहचानने की कोशिश कर रही हो।
“मैं… सच में कौन हूँ?”
उसने बहुत धीमे से खुद से पूछा।
कमरे में कोई नहीं था…
पर फिर भी उसे लगा जैसे उसका सवाल दीवारों से टकराकर वापस उसी के पास आ गया हो।
बाहर आँगन में उसकी माँ (जिसने उसे पाला था) चूल्हे पर खाना बना रही थी। धुएँ की हल्की-सी गंध हवा में फैल रही थी…
लेकिन सस्सी का मन वहाँ नहीं था। वो धीरे-धीरे बाहर आई और माँ के पास बैठ गई।
कुछ देर तक वो चुप रही…
फिर अचानक
“अम्मा… अगर कोई अपना न हो… तो क्या वो फिर भी अपना बन सकता है?”
माँ के हाथ एक पल के लिए रुक गए।
उसने सस्सी की तरफ देखा…
उसकी आँखों में वही सवाल था, जो शायद सालों पहले उसके अपने दिल में भी उठा था।
“कभी-कभी…”
माँ ने धीरे से कहा,
“अपनापन खून से नहीं… दिल से बनता है।”
सस्सी ने उस जवाब को सुना…
पर उसका मन पूरी तरह शांत नहीं हुआ।
क्योंकि कुछ सवाल ऐसे होते हैं
जो जवाब मिलने के बाद भी खत्म नहीं होते।
शाम होते-होते गाँव में एक अजीब-सी चहल-पहल शुरू हो गई।
दूर से ऊँटों की घंटियों की आवाज़ आ रही थी
एक काफिला गाँव के पास से गुजरने वाला था।
बच्चे दौड़-दौड़कर बाहर आने लगे…
औरतें अपने काम छोड़कर देखने लगीं…
जैसे कोई नया रंग इस सादे से दिन में घुलने वाला हो।
सस्सी भी बाहर आई।
उसने पहली बार इतने करीब से एक काफिला देखा
ऊँटों की लंबी कतार… उनके गलों में बंधी घंटियाँ…
और उन पर बैठे लोग अलग कपड़े, अलग अंदाज़।
उसकी आँखें सब कुछ अपने अंदर समेट लेना चाहती थीं।
तभी
एक ऊँट के पास चलते हुए एक युवक पर उसकी नज़र ठहर गई।
वो बाकी सबसे अलग था।
उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी…
और आँखों में… जैसे कोई गहराई, जो सीधे दिल तक उतर जाए।
सस्सी का दिल एक पल के लिए रुक सा गया।
वो समझ नहीं पाई…
ये क्या था।
उसने पहले कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं किया था।
वो बस उसे देखती रही…
और वो काफिला… धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
कुछ ही पलों में वो चेहरा भीड़ में खो गया…
जैसे आया ही न हो।
लेकिन सस्सी के अंदर
कुछ बदल चुका था।
उस रात…
जब वो सोने गई
तो पहली बार,
उसकी आँखों में कोई सपना नहीं था…
बस एक चेहरा था।
हवा धीरे-धीरे चल रही थी…
रेत अब ठंडी होने लगी थी…
पर सस्सी के अंदर
एक नई आग जल चुकी थी।
एक ऐसा एहसास…
जिसका नाम उसे अभी नहीं पता था।
लेकिन वो जानती थी
ये वही चीज़ है…
जो उसकी कहानी को बदलने वाली है।