शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी (भाग-2)

“ कौन है बे? किससे बातें कर रहा लालू? “
“ दो लड़के आये हैं भैया. पूछ रहे महाराज हैं क्या?”
“महाराज!!!!! कौन महाराज? जा कह दे यहां कोई महाराज नहीं रहते. “
“अबे रुक लालू… क्या पूछ रहे, महाराज?”
“हां भैया.”
“जा कह दे, महाराज अभी ध्यान कर रहे.”
साधु यानि सत्यम का दिमाग तुरन्त चलने लगा था. समझ गया कि उस दोपहर जरूर किसी ने उसे पीली धोती पहन के पानी लाते देखा है. लालू कुछ समझा, कुछ नहीं. हवेली के बचे-खुचे हिस्से की देख-रेख के लिये यहां रह रहे चौकीदार ’तिवारी’ ने गांव जाने के पहले अपने भतीजे को यहां बुलाया था और खुद अपने गांव गया था, तीन चार महीनों के लिये. यही समय तो कटाई और फिर बारिश के बाद बुवाई का होता है, सो तिवारी अब अगस्त में ही लौटने वाला था. भतीजा अपने साथ एक नौकरनुमा दोस्त भी ले आया था कि इत्ती बड़ी भुतहा हवेली में वो अकेला कैसे रहेगा? हवेली के कुंऎ का पानी बहुत नीचे चला गया था, देर सबेर नहाने वाले सत्यम को अध नहाये ही पानी लेने निकलना पड़ा. पिताजी की पीली थोती और पीला गमछा जो उन्होंने मन्दिर में हो रहे किसी महायज्ञ के लिये खरीदे थे, सामने ही टंगे दिखे, सो उन्हें ही बदन और सिर पर लपेट के चल दिया था पानी लेने . अब बस्ती से आये दो लड़कों द्वारा दिया गया “महाराज” सम्बोधन इस बेरोजगार युवक को भा गया. आनन-फानन लालू को उसने विश्वास में लिया. एक त्रिशूल और चिमटे का इंतज़ाम रातोंरात किया गया. ये इंतज़ाम बहुत मुश्किल नहीं था क्योंकि सड़क के किनारे, पेड़ के नीचे कहीं भी शिव जी को बिठा देने की परम्परा है हमारे यहां. एक गोल बटइया को कहीं भी स्थापित किया जाता है, सामने त्रिशूल गाड़ दिया जाता है. बस हो गया शिव मन्दिर. सो त्रिशूल का मिलना मुश्किल नहीं था. चिमटा जरूर उन्हें दुकान से जुगाड़ना पड़ा.
अगले दो दिन बाद ही, हवेली की हवा बदली हुई थी. नज़ारा बदला हुआ था. हवेली के ढहते बरामदे के बीचोंबीच पुरानी ईंटों, जिनकी हवेली में कोई कमी न थी, और मिट्टी से हवन कुंड तैयार किया गया. हवन कुंड के सामने त्रिशूल गाड़ दिया गया. इस त्रिशूल पर मातारानी के रंग-बिरंगे कपड़े बंधे थे. हवन कुंड में सूखे गोबर को जला के इस आग में नये चिमटे को तपा के पुराना किया जा रहा था. हवन कुंड के सामने ही एक पुरानी चटाई बिछी थी. बरामदे की दीवार पर ’ओम’, स्वस्तिक, और त्रिशूल के चित्र गेरू और गोबर मिला के बना दिये गये थे. कुल मिला के साधुई माहौल पैदा हो गया था. लालू को हिदायत दी गयी थी कि कोई भी महाराज को पूछे तो बताया जाये कि महाराज एक महीने के एकान्तवास में हैं. असल में में सत्यम चाहता था कि उसकी दाढ़ी मूंछ ज़रा सम्मानजनक बढ़त पा जाये तो लोगों को दर्शन दिये जायें.
सुबह घंटा-घड़ियाल के अभाव में लालू ने थाली ही बजानी शुरु कर दी. सबेरे-सबेरे क्रिकेट खेलने पहुंचे लड़कों ने भी आवाज़ें सुनी. हवेली की ओर से केवल सन्नाटा सुनने वाले लड़कों को ये थाली बजाने की आवाज़ें हवेली तक खींच ले गयीं. लालू यही तो चाहता था. सामने त्रिशूल, हवन कुंड, उसमें जलती आग, सिंदूर सब देख के लड़कों की बोलती बन्द हो गयी. लालू ने जब थाली बजाना बन्द कर दिया तब लड़कों ने हथेली की चार उंगलियों को अंगूठे की तरफ़ बायें से दांये घुमाते हुए “ यहां क्या हो रहा है?” का इशारा किया. लालू ने भी चुप रहने का इशारा किया. और कुछ इस तरह दबे पांव , लभगभ पंजे की उंगलियों पर चलता बच्चों को एक ओर ले गया, जैसे किसी के ध्यान में खलल न डालना चाहता हो. लड़कों को इन पहुंचे हुए संत/महाराज की जानकारी हो चुकी थी. वे कितने बड़े बाल ब्रह्मचारी हैं, ये लालू ने हाथ को आसमान की तरफ़ पूरी ऊंचाई तक तानते हुए बता दिया था. कितने सिद्ध हैं ये भी त्रिशूल की तरफ़ इशारा कर बताया गया. बताया तो ये भी गया कि महाराज अभी एक महीने के एकान्तवास में हैं. रमता जोगी, बहता पानी हैं महाराज… हिमालय से आये हैं. ये स्थान उन्हें अच्छा लगा सो अपनी यात्रा यहां रोक दी. कितने दिनों के लिये, ये नहीं पता. महाराज की चरण रज अब यहां के लोगों को मिलेगी, ये तुम सब का सौभाग्य है. और ये भी कि जब ये कल्प टूटेगा तब यहां भजन कीर्तन होगा. लालू को ये कहने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि अपनी-अपनी मम्मियों को बता देना.
(जारी)

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