Woman flying in the forbidden space - 5 in Hindi Novel Episodes by Ranjana Jaiswal books and stories PDF | वर्जित व्योम में उड़ती स्त्री - 5

वर्जित व्योम में उड़ती स्त्री - 5

भाग पाँच

फिर बरसात का मौसम आ गया | ये मौसम मुझे बहुत भारी पड़ता है | मन घबराता है | एक अनजानी पीड़ा परेशान करती है | बादल के गरजने से भय नहीं लगता | बस जी चाहता है कि मैं भी उनके साथ उड़ूँ ....भागूँ ....दौड़ूँ ...पर मेरे पास पंख कहाँ हैं ? बारिश में प्रिय के साथ भींगने का भी मन होता है पर प्रिय कहाँ ? वही सूना कमरा....अंधेरा....अकेलापन और उदासी ...| खिड़की से वर्षा की बूंदें आकर कमरे को भिंगोती हैं फिर खिड़की भी बंद करनी पड़ जाती है | बाहर का सौंदर्य-बादलों का उमड़ना...बिजली की चमक, इंद्र्धनुषी रंग, वर्षा -बूंदों का नृत्य कुछ भी दिखाई नहीं देता | वृक्षों का मदिरा में मत्त शराबी- सा झूमना ...धरती की सोंधी गंध ...हरियाली कुछ भी नहीं | इन सबके बीच भी मन प्यासा .....शुष्क !कैसी है ये प्यास !...ये शुष्कता...!.ठूंठ –सा मन !पर क्या सच ही ठूँठ होता है मन ..? .क्या यह अपने अंदर नव किसलय नहीं छिपाए रखता है ? क्या उसे इंतजार नहीं है कि कोई झोंका आए और उसे झकझोर कर जगा दे? ऐसा हुआ तो फिर लोग उस ठूँठ को देखते रह जाएंगे | पर वह झोंका आता ही नहीं ...वह तो प्रेम के साथ आएगा न !...जो इस ठूँठ का सर्वस्व है ...प्यार है .....| 
मैं अपने विचारों में खोई हुई थी कि अचानक बिजली आ गयी | अब कमरे की हर वस्तु दिखाई देने लगी | खिड़की को खोला तो फिर बारिश की एक लहर आई और मेरे चेहरे को भींगों गई | तप्त चेहरे पर यह ठंडी फुहार भली लगी | मैं कुछ देर वहीं खड़ी रही | 
तन-बदन में विस्मयकारी परिवर्तन, मन में भी कई बदलाव मानो मैं कोई और ही हूँ इस 'मैं' को मैं नहीं पहचानती| मेरे इस रूपांतरित अस्तित्व में मेरे तन -मन के आसमान पर भय, लज्जा सुख-स्वप्न सब बिजली की तरह कौंधते हैं  | अपने आप से बात करने के क्रम में तुमसे भी बात कर लेती हूँ यह जानते हुए भी कि तुम कोई जबाब नहीं दोगे | बस इस तरह इशारा करोगे कि खुद ही अपने सवालों के जवाब पा लूँ| तुम मेरी बात नहीं समझते | लगता है कि तुम मेरी चेतना पर तो हावी हो जाते हो पर मेरे चैतन्य से हमेशा दूर रहते हो | यह तो तय है कि हम एक साथ एक सामान्य जीवन नहीं जी सकते, फिर शिकायत कैसी ? पर हाय रे मन | 
पानी ऐसे गिर रहा है कि अगस्त का महीना लग रहा है | पानी की तेज बौछार से आम के बौर झर गए थे | बौर की खुशबू में नमी है | आम के बौर हों या महुआ के फूल दोनों की गंध एक- सी लगती है | इनकी गन्ध से मन को चक्कर आने लगता है | बांस की पत्तियाँ पीली पड़कर झरने लगी हैं | आम के पेड़ के शरीर का रंग और नीम के पेड़ के शरीर का रंग एक जैसा लग रहा है| बरगद में छोटे -छोटे लाल फल लगे हैं कुछ फल जमीन पर बिखरे हैं| बंदर चुन-चुनकर उन्हें खा रहे हैं । 
तुम्हारे पास वक्त ही नहीं है कि तुम प्रेम की गुनगुनाहट में पूरा दिन गुजारो, मेरी रुनझुन साध की तरफ एक नजर डालो भले ही मैं अपने चाहत के गुलाब की पंखुरी –पंखुरी नोचकर आँखों की तलैया में बहा दूँ | मेरी चाह के धागे में तुमने रंग-बिरंगी पतंग तो बांध दी है पर खुद आड़ में जाकर छिप गए हो | 
कभी -कभी मेरे सीने में भयंकर हूक जाग उठती है, मानो सीने में अब तक जो कुछ मौजूद था, कोई भेड़िया उसे नोंच-नोंचकर खा गया | कोई टीस भरा सुर, शायद सच्चे गायक को रूला सकता है | तुमसे कुछ मांगते हुए मेरे भीतर का सागर छटपटाता है | 
मुझे सुबह -सवेरे अपनी छत से आसमान देखना सुखद लगता है। रोज़ ही आसमान का रंग अलग होता है । कभी कहीं गहरा, कहीं हल्का नीला रंग!कभी आसमानी, गुलाबी और सफेद रंग । बादल भी नित नए । कभी नीले कभी सफेद कभी गुलाबी । हवा के सहारे आसमान में तैरते कभी वे रूई के फाहे सरीखे लगते हैं कभी छोटे 'मोटे पहाड़ के शिखर से बिल्कुल निष्कलुष, स्वच्छ, बेदाग। 
देखते ही देखते पूरब दिशा की में हल्की लाली छाती है और फिर वह लाली गहरी होती चली जाती है।  !सब कुछ कितना सुंदर मनमोहक !सिर्फ दृष्टि का सुख ही नहीं मिलता, मन भी ताजा और प्रफुल्लित हो उठता है।  शीतल, सुगन्धित, शांत हवा आसमान से धरती तक टहलती है। कभी उसकी रफ़तार तेज हो जाती है कभी धीमी। चारों तरफ के झूमते पेड़- पौधे, हंसते -मुस्कुराते फूल सुप्रभातं कहते हैं और फिर सोने में सुहागे की तरह धीरे -धीरे सूरज नज़र आने लगता है पर एकाएक नहीं। देर तक वह बादलों से खेलता है । कभी उनके पीछे छुप जाता है कभी उनकी ओट से झांकता है। कभी सामने आ जाता है। वह गोल -मटोल, लाल चेहरे वाले नटखट बच्चे की तरह लगता है। यही बच्चा थोड़ी देर में उग्र से उग्रतर होता जाएगा। माँ कहती थी वह जलते हुए उगता है और जलते हुए ही डूबता है। आसमान में रहते उसे कभी शीतलता, सुकून नहीं मिल पाता जैसे संघर्ष- क्षेत्र में मुझे  नहीं मिला।  जीवन के ऊषाकाल से लेकर उम्र के सांध्य पहर तक मैं भी तो जलती ही रही हूँ। सूरज समुद्र की गोद में विश्राम पाता है, वहीं ताज़ा दम होता है पर मेरे लिए तो कोई गोद नहीं रही, जहाँ मैं विश्राम ले सकूं। जबकि मुझे भी सूरज की तरह दूसरी सुबह संघर्ष के लिए जाना पड़ता है सूरज प्रकृति से बंधा है तो मैं भी  मनुष्य की प्रकृति से बंधी हूँ। जलना दोनों को है। 
उम्र के इस सांध्य पहर में ही मैं इतने इत्मीनान और अहसास के साथ प्रकृति को देख पा रही हूँ। वर्ना रोटी की आपा-धापी में न तो मुझे अवकाश मिला था, न इसकी जरूरत ही महसूस हुई थी। प्रकृति की अहमियत भी तो दुनिया को अब समझ में आ रही है, जब कोविड 19 नाम का भयावह जीव अपना विशाल जबड़ा खोले सबको निगल जाने को तैयार है। चारों तरफ अनिश्चितता का माहौल है। हर रात बिस्तर पर जाते हुए  डर लगा रहता है कि पता नहीं कल का सवेरा देखने को मिले न मिले। दिन में भी भय सताता रहता है कि किसी असावधानी से यह मृत रक्तबीज जीवित न हो जाए। सिर्फ मनुष्य को शिकार बनाने वाला यह रक्तबीज जाने मनुष्य के किस पाप की सज़ा है!ईश्वर के किस वरदान से अमर है!सर्वश्रेष्ठ दिमाग वाला मनुष्य, मंगल, चाँद, एवरेस्ट तक जा पहुंचने वाला मनुष्य एक सूक्ष्म, न दिखाई देने वाले, मृतप्राय जीव से हार रहा है। उसका विशाल शरीर इसके एक अदृश्य, सूक्ष्म तमाचे से धराशायी हो जा रहा है। जाने कितने कवि, लेखक, कलाकार, डॉक्टर, मीडियाकर्मी इसके शिकार हो चुके है।  सामान्य लोगों की तो गिनती ही नहीं। चारों तरफ हाहाकार है। लॉकडाउन है। घर से बाहर निकलने की मनाही है। ऐसे में लोग अवसाद -ग्रस्त हो रहे हैं। जिनके पास परिवार है उनका समय तो निकल जा रहा है पर मुझ जैसे अकेले लोग क्या करें? 
जाने किस प्रेरणा से मैंने घर की छत पर सुबह -शाम टहलना, बैठना शुरू कर दिया है। धीरे -धीरे छत से दूर -दूर तक नज़र आते पेड़, गमलों में लगे पौधे, उगता -ढलता सूरज, सोलह कला दिखाता चाँद, अदृश्य मगर उपस्थित हवा, रंग -बिरंगे बादल सब मेरे साथी बन गए हैं। अकेलेपन का अहसास जाता रहा है। मैं अपनी जिंदगी का नए सिरे से मूल्यांकन कर पा रही हूँ। मेरी लेखनी सब कुछ संजों रही है अतीत वर्तमान सब। 
अरे, ये क्या!यह समय जीवन के बारे में सोचने का नहीं, प्रकृति को देखने का समय है। तो देखूँ ...। 
आत्मालाप करते हुए मैंने अपनी आंखें फिर से आकाश की ओर उठा दी हैं। 
सूरज थोड़ा और आगे आ गया है। थोड़ी देर पहले उस पर कुछ धब्बे से दिखाई दे रहे थे। मैं सोच रही थी कि ये धब्बे किसी पहाड़ की छाया है या बादलों की। या फिर सूरज में भी चांद की तरह ही दाग है पर सूरज ज्यों -ज्यों आगे बढ़ता जा रहा है उसका रूप निखरता जा रहा है। बेदाग, अरूण, शांत सुंदर मुख। रात -भर माँ की गोद में विश्राम कर चुके बच्चे -सा।  ज्यों -ज्यों वह धरती के करीब आता जा रहा है, वह सुर्ख से सुर्खतर होता जा रहा है। पूर्ण युवा, तेजस्वी और नाराज़-सा। उसकी किरणें पहले धरती को सहला रही थी, प्यार कर रही थी और अब झुलसाने को तैयार है। 
सूरज धरती से प्यार करता है इसलिए रोज़ उसको देखने आता है । अपनी किरणों से उसको स्पर्श करता है पर उसकी बुरी दशा से दुःखी हो जाता है। चारों ओर फैला प्रदूषण ...असमानता....बीमारी.....जीते -जागते नरक- सी स्थिति उसे अच्छी नहीं लगती। वह उसकी दशा सुधारना चाहता है। धरती पर फैले प्रदूषण को अपनी तीब्र किरणों से खींच लेता है, उसके अंधेरे कोनों को उजाले से भर देता है। उसकी फसलों में जान डाल देता है। दिन भर वह इसी प्रयास में लगा रहता कि धरती स्वच्छ, सुंदर समृद्ध और स्वर्ग -सी हो जाए। इस प्रयास में वह अपनी सारी ऊर्जा खो देता है और थककर फिर सागर की गोद में सो जाता है। पर सोने से पहले चाँद को अपनी जगह तैनात कर जाता है ताकि उसकी प्रेयसी धरती पर अंधेरा न होने पाए। अगली सुबह फिर उसका वही कर्म शुरू हो जाता है। यही तो प्रेम है। बदले में वह धरती से कुछ नहीं चाहता, पर अपना सर्वस्व उसे दे देना चाहता है। उसे सुधारना चाहता है उसे आबाद करना चाहता है। निरन्तर आगे बढ़ाना चाहता है उसे सुखी, सम्पन्न, समृद्ध और खुशहाल बनाना चाहता है। उसकी यथास्थिति से वह खुश नहीं होता। 
काश, ऐसा प्रेम करने वाला मुझे भी मिला होता ! मैं अपने अतीत के पन्ने पलटती हूँ। 
कितने पुरूष तो आए मेरे जीवन में, पर उनमें क्या कोई भी ऐसा था, जो मेरी बेहतरी के लिए कुछ करना चाहता हो। सभी तो मेरी यथास्थिति से लाभ उठाना चाहते थे। मुझसे ही सुख पाना चाहते थे। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि मैं किस नरक में जी रही हूँ।  सभी मुझे उसी नरक के साथ प्यार करने का दावा करते थे। प्यार भी क्या, कुछ देर मेरे साथ उसी नरक में बिताना और वह भी सारी दुनिया से छिपकर। ये कैसा प्यार था!क्या वह प्यार भी था!वह तो सिर्फ एक लालसा थी मुझे भोगने की इच्छा -मात्र!किसी ने भी निःस्वार्थ भाव से मुझे प्यार नहीं किया और अपने स्वार्थी प्यार को भी अहसान, दया, सहानुभूति कहा। और जब अपने उद्देश्य में सफल या असफल हुए, अपने -अपने स्वर्ग में लौट गए। जाते -जाते मुझ पर कुछ लांछन ही लगाते गए। आखिरकार मैंने खुद अपने ही प्रयासों से ही अपने लिए स्वर्ग का निर्माण किया। अपनी स्थिति को अनुकूल किया और यह तभी सम्भव हुआ जब मैं पुरूष -प्रेम के भ्रामक जाल से निकल पाई। 
मुझे आज भी समझ में नहीं आता कि कैसे मैं एक के बाद एक पुरूषों के जाल में उलझती गई। एक से निराश हुई तो दूसरे की तरफ़ मुड़ी, फिर तीसरे की तरफ़ पर क्या कहीं भी मेरे दुःखते दिल को सहारा मिला? किसी से मुझे सच्चा प्रेम मिला? फिर मेरी भटकन का क्या रहस्य था!मैं न तो गलत स्त्री थी न पेशेवर। बस अकेली थी और अपने अकेलेपन को भरना चाहती थी और वो भी किसी पुरुष के प्रेम से। मैं सुंदर थी शिक्षित थी आत्मनिर्भर थी । कोई भी कमी नहीं थी मुझमें, सिवाय इसके कि मैं अकेली थी और मेरे मन में पुरूष के लिए आकर्षण था। पुरुष के प्रेम की चाहत थी, तो इसमें बुरा क्या था!यह तो नैचुरल है ..स्वाभाविक है ..प्राकृतिक है। स्त्री पुरुष के बीच का आकर्षण तो कुदरती सच है न!अब मुझे किसी एक पुरूष से सम्पूर्ण प्यार नहीं मिला, तो मैं उसे दूसरे में तलाशने लगी और यह गिनती गणनीय हो गई। 
इस बात का मुझे अपराध -बोध भी रहा। मैं अपने -आप को यह सब करने से रोकती भी रही। मेरी शिक्षा, मेरी बुद्धि, मेरी मजबूत शख्सियत इन सबके ख़िलाफ़ थी पर मेरे अचेतन में प्रेम की भूखी- प्यासी, अतृप्त, न जाने कौन -सी स्त्री बैठी थी, जो मेरे बुद्धि -विवेक पर हावी होकर मुझसे अकरणीय भी करा ले जाती थी। प्रेम की धुन सुनते ही मैं पागल होकर सुध -बुध खो देती। मुझे दीन -दुनिया की परवाह नहीं रह जाती। मैं पात्र -अपात्र का भी ख्याल नहीं करती। कोयला भी मुझे हीरा लगता। दुनिया की सारी सच्ची प्रेमिकाओं की आत्मा जैसे मुझमें समा जाती। मैं अपना सर्वस्व अपने प्रेम- पात्र में उलीच देने को आतुर हो जाती। मैं बौराई नदी -सी सारे कूल- किनारों को तोड़ने को बेचैन हो जाती। मेरा इतना आवेग...इतना प्रेम छिछले पात्र वाले प्रेमी नहीं सम्भाल पाते और भाग खड़े होते। मैं छटपटाती- तड़पती उन्हें पुकारती रहती पर वे पलट कर भी नहीं देखते। कई तो मुझे बदनाम और चरित्र-हीन तक कह जाते। मैं आहत होकर दुःख से भर जाती। दिन, महीने, वर्ष बीत जाते इस भंवर से उबरने में। पर ज्यों ही मैं संभलती दूसरा दस्तक देने लगता। मैं वर्षो उसकी उपेक्षा करती, उससे दूर भागती, पर फिर एक दिन अचेतन की स्त्री मुझ पर हावी हो जाती। वह तर्क देती कि जिसके लिए संन्यासिनी बनी फिर रही हो वह तो दूसरी स्त्री के साथ अपने स्वर्ग में है। मुझे क्रोध आ जाता कि फिर मैं ही क्यों प्रेम -सुख से वंचित रहूँ! और फिर कहानी अलग ढंग से शुरू होती, पर उसका अंत वही होता। 
मैं सोच ही नहीं पाती थी कि आखिर मेरे भीतर की अचेतन स्त्री इन सबसे सबक क्यों नहीं लेती ? मैं बाद में अपने जीवन से जा चुके पुरुषों को कहीं देखती, तो शर्म से गड़ जाती। वे किसी भी दृष्टि से मेरे योग्य नहीं थे। न उनका कोई व्यक्तित्व था, न शख्शियत। बिल्कुल साधारण जीव थे वे!चरित्र से भी गिरे हुए!और उन्हीं के लिए मैं पागल हुई थी !छि:!वे दुबारा मेरे जीवन में आना चाहे तो मुझे उबकाई आ जाएगी।  मैं अक्सर सोचती कि अपने भीतर की इस अचेतन स्त्री को मार दूँगी। मैं अपनी देह को अपनी शख्शियत पर हावी नहीं होने दूँगी। 
पर ऐसा होता नहीं । मेरा संकल्प कमजोर पड़ जाता।  मेरी अचतेन स्त्री मुझे तर्क ही ऐसा देती।  वह कहती कि तुमने किसी को तलाश नहीं किया। किसी के पास खुद नहीं गई। जो भी आया खुद आया तुम्हारे पास। अपनी मरज़ी से आया। तुमने पढ़ा है कि जो तुम्हारा होगा, खुद तुम्हारे पास आएगा। जो आए उसे दुत्कारो मत, जो चला गया, उसके पीछे मत जाओ। न पछताओ। आगे बढ़ो। अतीत को पकड़कर बैठना ज़िंदगी का अपमान करना है। 
वह मुझे इसी मंत्र को जीने का तंत्र बनाकर चलने का मश्वरा देती और मुझ -सी प्रबुद्ध स्त्री उस बुद्धिहीन की बात पर अमल करने लग जाती। 
क्या यह गलत था !पाप था !चरित्रहीनता थी! जीने के लिए प्यार चाहना क्या अपराध है!आज मेरे सारे प्रेमी भौतिक सुख -सुविधाओं तथा अपने बाल -बच्चों में रमे इज़्ज़तदार बने हुए हैं!कभी मिलते हैं तो मेरे अकेलेपन पर तरस खाते हुए कहते हैं कि अभी तक भटक ही रही हो। 
मैं उनसे क्या कहूँ? 
एकाएक बड़े ही जोर -शोर की आवाजों से मेरी नींद टूट गई।  खिड़की से देखा तो चीखती -चिल्लाती, क्रोधित आंधी अपने प्रचंड कालिका रूप में है, सामने जो भी आता है उसे नेस्तनाबूद करने पर आमादा। पर वह भी कमजोरों का ही कुछ बिगाड़ पा रही है। बड़े, मजबूत, पुराने पेड़ मानो उसे चुनौती देते हुए उसका रौद्र रूप देख रहे हैं पर छोटे पेड़ -पौधे हाथ जोड़े खड़े हैं । लताएं तो उसके चरणों में लोट -पोट गई हैं । हल्की चीजें उड़कर कहाँ से कहाँ पहुंच गई हैं। आज सूरज कहीं सुरक्षित जगह छिपा है पर उससे फूटते प्रकाश से सुबह का आभास हो रहा है। । आकाश आसमानी से भूरा काला हो चुका है उसके सीने में दबी बिजली रह -रहकर दमक उठती है मानो बहन आंधी को शांत हो जाने की सलाह दे रही हो कि अब आगे का मोर्चा बहन वर्षा और मैं संभाल लूंगी। 
और सच ही जैसे आंधी मान गयी है उसकी रफ़्तार धीरे- धीरे कम होती गयी है और उधर जोरों की बारिश होने लगी है बीच में दाँत किटकिटाती, सुंदर तन्वंगी बिजली बड़े पेड़ों को धमका रही है -बच्चू मुझसे मत भिड़ना वरना नेस्तनाबूद कर दूंगी। बादल भी बिजली के समर्थन में गरज रहे हैं पर बारिश उन्हें समझा रही है । वह उनके क्रोध पर पानी फेरने की कोशिश में है । आज पूरा आसमान स्त्रीमय है। स्त्री का क्रोधित, सौम्य और सुंदर शीतल रूप एक साथ दिख रहा है। 
इधर धरती भी खुश है । अपनी तीनों बहनों से मिलकर उसकी आंखें, मन, शरीर सब खुशी के आंसुओं से सराबोर है। 
मेरा मन हर्षित है । आज मैं छत पर नहीं जा पाऊँगी तो क्या, खिड़की से आसमान के नजारे तो देख ही सकती हूँ। मैंने अपनी कुर्सी खिड़की के पास डाल ली है। बीच -बीच में उठकर मैं अपना सिर खिड़की से बाहर निकालती है। थोड़ी -सी भीग जाने पर उन्हें भीतर कर लेती हूँ!मुझे बचपन के दिन याद आते हैं जब मैं पड़ोसी बच्चों और भाई -बहनों के साथ जी- भर बारिश का लुत्फ उठाती थी। आंखें बंद करने पर काग़ज़ की वे टेढ़ी -मेढ़ी नौकाएं बारिश के पानी में तैरती नज़र आती हैं।   घुटने तक पानी में छपाछप कूदना।  ओलों को बटोरकर बताशे की तरह खाना और उसके फ़ीके स्वाद पर भी लहालोट हो जाना, बारिश रूक जाने पर आस -पास की गड़हियों का मुआयना करना कि कहाँ पर गिरई मछलियां होंगी। मेढ़क के नन्हे पूंछ वाले बच्चों और मछलियों में अंतर न कर पाना। बादलों के काला वस्त्र पहनते ही सड़क पर फ्रॉक घुमाकर नाच- नाचकर गीत गाना-काले मेघा पानी दे...!सब याद आ रहा है। 
बचपन की सारी भोली मूर्खताएं जीवन से भरी हुई थीं। न दीन -दुनिया की चिंता न किसी की परवाह। न गाली -मार का डर!वह बच्ची आज भी मुझमें जिंदा है और मौका मिलते ही अपना बचपन जी लेती है। 
मैंने अपनी बाहें खिड़की से बाहर निकालीं। टपाटप कुछ बूंदें उन पर गिरीं। रोंगटें सिंहर उठे। अद्भुत रोमांच, अजीब- सी गुदगुदी!
कुछ ऐसा ही महसूस होता था, जब सौम्य मुझे छूता था।  उसकी अंगुली ज्यों -ही मेरी हथेली पर कुछ लिखती थी, मैं एक सुखद अहसास से भर जाती थी।  ऐसा लगता था कि मेरा शरीर आंधी में उड़ रहा कोई पत्ता हो कि या फिर बर्फ़ का कोई टुकड़ा, जो पिघल रहा हो और पिघलते -पिघलते गायब हो जाएगा।  'पानी ही ते हिम भया हिम है गया बिलाय'। मैं देह से जैसे रूह तक पहुंच जाती थी। आँखें बंद जैसे ब्रह्म से एकाकार हो रही होऊँ, जबकि सौम्य धीरे -धीरे आग के गोले -सा होता जाता था। आवेग और उत्तेजना से वह काँपने लगता था।  वह सिर्फ देह बनने लगता था। देह और रूह आपस में टकराते थे और फिर दोनों की मूर्छा टूट जाती थी। 
ऐसा क्यों होता है? स्त्री और पुरूष जब एक- दूसरे की जरूरत हैं, पूरक हैं, तो फिर उनमें देह, मन आत्मा के स्तर पर इतनी भिन्नता क्यों ? स्त्री पुरूष का मन पाने के लिए तन समर्पित करती है, ताकि दोनों की रूह एक हो जाए । पर पुरूष मन और रूह की बात सिर्फ स्त्री -देह को पाने के लिए करता है। प्रेम के क्षणों में भी उसका मन सोया रहता है और रूह पर उसका विश्वास नहीं होता। उसके लिए देह- मात्र ही सच है । उसी में वह सुख खोजता है ...पाता है । पाकर ऊबता है और खीझकर दूर हो जाता है। वह समझ ही नहीं पाता कि प्रेम में उसे स्त्री जैसी आत्मिक सुख की अनुभूति क्यों नहीं हो पाती!जो सुख ....जो तृप्ति स्त्री पाती है, वह उसे क्यों नहीं मिल पाता है? वह नहीं जान पाता कि स्त्री प्रेम में मुक्त हो जाती है...अपने आप को भूल जाती है । वह पूरी तरह उन क्षणों को जीती है, इसलिए उसे आनंद मिलता है। पुरूष प्रेम के क्षणों में भी उलझा रहता है । उसका मन कहीं ...शरीर कहीं और रहता है, इसलिए उसे तृप्ति नहीं मिलती। स्त्री देह समर्पित कर पुरुष से बंध जाती है । पुरूष देह पाकर मुक्त हो जाता है। पा ली गई स्त्री का आकर्षण चुक जाता है। 
फोन की कर्कश ध्वनि से मेरी विचारधारा टूट गई। जाने क्या- क्या चलता रहता है मेरे दिमाग में!अभी घर का कितना काम बाकी है। बारिश तो कब की बंद हो गई। सूरज भी तपने लगा।  बाहर अभी तक सन्नाटा है। लॉकडाउन ने लोगों को घर में रहना सीखा दिया है । 
पड़ोस के घर में पति -पत्नी के बीच जमकर लड़ाई हो रही है। दोनों कामकाजी है पर इस समय घर पर ही रह रहे हैं। पत्नी अध्यापिका है पति किसी प्राइवेट फर्म में । जवानी में कदम रख चुके दो बच्चे हैं। विवाह के इतने वर्षों बाद भी दोनों जैसे दो ध्रुव हों, फिर भी निभाए जा रहे हैं। 
मैं सोचती हूँ कि लोग किस तरह समझौता करके ज़िन्दगी गुजार लेते हैं ? ऐसा क्या है, जो उन्हें समझौता करने पर मजबूर करता है!किसी आचार्य का कहना है कि
लालच ही मनुष्य को समझौता करने पर मजबूर करता है। 
कई बार ऐसा होता है कि आप ऐसे व्यक्ति से अपने जुड़ाव का प्रदर्शन करते हैं, जिसे आप बिलकुल पसन्द नहीं करते या जिससे मन ही मन नफरत करते हैं। जिसकी आदतें, चाहतें या हरकतें आपको नहीं भातीं, पर आप मुस्कुराते रहते हैं आखिर क्यों? क्यों आप अपनी इच्छा, अपने मन, अपनी आत्मा के ख़िलाफ़ आचरण करते हैं? इसके पीछे बस एक ही कारण होता है--लालच!उस व्यक्ति से उम्मीद या उस पर निर्भरता और वो भी ज्यादातर आर्थिक निर्भरता। स्त्रियाँ अधिकतर इसीलिए अनचाहे पति, प्रेमी, दोस्त की ज्यादतियों को सह लेती हैं क्योंकि उन्हें उनसे सुरक्षा, सहयोग और सहारा मिलता है। वे स्त्रियाँ जो आर्थिक रूप से स्वनिर्भर नहीं हैं, जो अपनी जरूरतों के लिए किसी न किसी पुरुष पर निर्भर हैं, उन्हें हमेशा उस पुरूष को खुश रखना पड़ता है। उसके हिसाब से चलना पड़ता है। खुद को उसका विश्वसनीय सिद्ध करना पड़ता है। अपने चरित्र का प्रूफ देना पड़ता है। यदि वे ऐसा नहीं करतीं तो सबसे पहले उनसे जो सुरक्षा छीन ली जाती है, वह है आर्थिक। 
जो स्त्रियाँ आर्थिक रूप से कमज़ोर नहीं है वे पुरूष का प्रेम पाने के लिए कई तरह के समझौते करती हैं। 
एक और वज़ह है सामाजिक नैतिकता, जिसका सारा बोझ स्त्री के सिर पर लाद दिया गया है। स्त्री से एक -तरफा उम्मीद की जाती है कि वह अपनी घर -गृहस्थी, परिवार -समाज के प्रति अपने सारे दायित्वों का निर्वाह करे। वह भी पूर्ण निष्ठा और नैतिकता से। जो स्त्री ऐसा नहीं कर पाती उसकी निंदा की जाती है।  उसको इज्जत की नज़र से नहीं देखा जाता। वह समाज में अपना सम्मान खो देती है। यही वह 
लालच है जो स्त्री को, तमाम तरह के समझौते करने पर विवश कर देता है। 
शाम हो चली है प्रकृति में भी और जिंदगी में भी। 
सच है कि सुबह होती है तो सांझ भी होगी। पर गौर से देखो तो सांझ भी सुबह से कम सुंदर नहीं होती।  उस समय आकाश में सुबह से ज्यादा रंग होता है । सूरज भी कुछ अधिक ही लाल होता है। घर लौटते हुए पक्षी, बथानों की तरफ़ सरपट भागती गाएं, मंथर गति से चलती हवा, हँसते -खिलखिलाते, सुबह तक के लिए विदा लेते आत्मीय पेड़- पौधे और प्रिय -मिलन के लिए बेताब अपने। सब कुछ कितना सुहाना!कहाँ हैं इसमें निराशा !कहां हैं उदासी!प्रकृति में सांझ अशुभ नहीं होती, वर्ना सन्ध्या- वंदना का चलन नहीं होता। प्रभाती भले छूट जाए संध्या-वंदन करना कहाँ भूलते हैं धार्मिक जन!
फिर क्यों मैं अक्सर उदास हो जाती हूँ? वैसे उदासी का ये रोग आज का नहीं, बहुत पुराना है। शायद बचपन से या फिर मां के गर्भ या उससे भी बहुत पीछे पूर्वजन्म से। 

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