Chetna in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | चेतना

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चेतना

 

किसी का मन मसोस कर रह जाना किसी के लिए बड़ी ही प्रसन्नता की बात होती है। किसी का हार जाना, न जाने क्यों जलने वालों को जीत की अनुभूति करवा देता है। क्यों किसी का कुछ बिगड़ जाना, किसी को बहूत बड़ी खुशी दे देता है।

परीक्षा में अव्वल लाने की बात करने वाला रमेश जब फेल कर गया तो जलनेवालों की खुशी का कोई ठीकाना न रहा।

मयंक ने ’’ फेलवर ’’ कहा तो, आरव ने ’’ लूजर ’’ कहकर रमेश का मजाक उड़ाया, और दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया। दोनों अपने-अपने घर चले गए।

मन मसोस कर खड़ा रमेश रूआंसा हो गया था और बहूत हद तक अपने आप को लूजर मान चुका था। अब रमेश न तो दुसरी बार परीक्षा देने की सोच पा रहा था और न ही कोई सपना संजो पा रहा था। एक तो रमेश की आत्मग्लानी का डोज और उस पर फेलवर और लूजर संबंधित डबल डोज रमेश को दुर तक अन्दर झकझोर कर रख दिया था।

एक कमरे में खुद को बंद कर लेना और अपने आप को सबसे अलग-थलग कर लेना ही रमेश ने अच्छा समझा और रमेश ने वैसा ही किया।

रमेश की माँ ने पुछा ’’ कोई परेशानी है क्या बेटा, रमेश ने ’ ना ’ में सिर हिलाया, माँ के हाथ से भोजन की थाली लिया और अपने आप को फिर से बंद कर लिया।

रमेश की माँ ’’ सुनो तो, कुछ तो बोलो। ’’ बोलती रह गयी लेकिन रमेश पर माँ की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। माँ भी मन मसोस कर रह गयी। रात में दरवाजे पर एक दस्तक हुई। दस्तक की तीव्रता को महसूस कर रमेश समझ गया कि यह दस्तक माँ के हाथ का नहीं है, बल्कि पिता जी के हाथ का है। माँ होती तो एकबारगी नज़रअंदाज भी कर देता लेकिन पिता जी के लिए दरवाजा खोलना ही था।

रामेश ने दरवाजा तो पिता जी के लिए खोला था लेकिन वास्तव में रमेश ने दरवाजा अपनी सोयी हुई चेतना को जगाने के लिए खोला था। पिता जी सोफा पर आकर बैठ गए।

उनकी आँखें नींद से बोझिल थीं, इसलिए वो चुपचाप रमेश को निहार रहे थे। कहा तो कुछ भी नहीं, उनके हाथ में अखबार की कटिंग थी।

 पिता जी ने रमेश की ओर अखबार बढ़ाते हुए कहा ’’ अखबार के इन पन्नों को एक बार मन की गहराई तक पढ़ लेना। उन्होंने रमेश के ललाट को चुमा, सिर पर हाथ फेरा और फिर चुपचाप कमरे से बाहर निकल गए।

रमेश ने अखबार के पन्नों पर सरसरी निगाह डाली और मन ही मन सोचा कि इन अखबार के पन्नों पर आखिर क्या ही होगा।रमेश ने एक पन्ना को अपनी मन से पढ़ा, दुसरे-तीसरे पन्नों तक उसकी उत्सूकता के साथ उसकी जागृति में भी थोड़ा सा इजाफा हुआ। रमेश ने सोचा कि पिताजी कब से इन पन्नों को जुगाड़ कर रहे थे जिसमें कि लोगों की असफलता से लेकर सुफलता तक की कहानी भरी पड़ी है। अब रमेश ने नम की गहरायी में उत्सूकता और जागृति को एहसास किया।

जिसके दम पर रमेश ने अगली प्रतीक्षा अव्वल श्रेणी में उत्तीर्ण ही नहीं किया कारवाँ बढ़ते-बढ़ते सरकारी नौकरी तक भी नहीं रूकी।

 

समाप्त।