rishto ka ehsas Tere Naam in Hindi Motivational Stories by Dharmpal Sroj books and stories PDF | रिश्तों का एहसास

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रिश्तों का एहसास


एक ऐसा सफर, जिसमें मंजिल से ज्यादा रास्ते ने सिखाया
पूरनपुर की सुबह में एक अलग ही अपनापन था।
सूरज निकलने से पहले ही खेतों की पगडंडियों पर लोगों के कदमों की आहट सुनाई देने लगती थी। कहीं किसान अपने बैलों के साथ खेत की तरफ निकल रहा होता, कहीं कोई मजदूर अपने कंधे पर औजार रखे काम की तलाश में जा रहा होता और कहीं किसी छोटे-से घर के आँगन में चूल्हे से उठता धुआँ बता देता कि किसी माँ ने अपने परिवार के लिए दिन की शुरुआत कर दी है।
पूरनपुर के आसपास बसे गाँवों में जिंदगी बहुत साधारण थी, लेकिन उन साधारण लोगों के सपने साधारण नहीं थे।
चार फिरोजपुर भी उन्हीं गाँवों में से एक था।
गाँव की सड़क के दोनों तरफ खेत फैले थे। बरसात के दिनों में रास्ते कीचड़ से भर जाते और गर्मियों में वही रास्ते धूल उड़ाते। सर्दियों की सुबह कोहरा इतना घना होता कि सामने खड़ा आदमी भी कुछ दूरी से दिखाई नहीं देता।
लेकिन गाँव के लोगों को इन सबकी आदत थी।
उन्हें मौसम से ज्यादा अपनी जिम्मेदारियों की चिंता रहती थी।
इसी गाँव में अर्जुन रहता था।
अर्जुन कोई बहुत बड़ा आदमी नहीं था। उसके पास न बड़ी जमीन थी, न पक्की हवेली और न ही ऐसी आमदनी जिसका भरोसा अगले कई वर्षों तक किया जा सके।
उसका घर छोटा था।
घर में उसके माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्य रहते थे। पिता दिन-रात मेहनत करते थे। कभी खेत में काम मिलता, कभी मजदूरी, कभी कोई छोटा-मोटा काम।
माँ घर संभालती थीं।
उनके पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन एक चीज बहुत थी—अपने बच्चों के लिए उम्मीद।
माँ अक्सर अर्जुन से कहा करती थीं,
“बेटा, हमारे पास पैसा कम है तो क्या हुआ? मेहनत करने वाले हाथ और उम्मीद रखने वाला दिल किसी से कम नहीं होता।”
अर्जुन उस समय माँ की बात सुनकर बस मुस्कुरा देता।
उसे कहाँ पता था कि आने वाले वर्षों में यही दो बातें उसकी पूरी जिंदगी का सहारा बनेंगी।
बचपन के सपने
अर्जुन बचपन से ही बाकी बच्चों से थोड़ा अलग था।
गाँव के बच्चे खेलते थे तो वह भी खेलता था, लेकिन कुछ देर बाद वह चुपचाप किनारे बैठ जाता और लोगों को देखने लगता।
किसान खेत में कैसे काम करते हैं।
मजदूर कैसे सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं।
बूढ़े लोग चारपाई पर बैठकर पुरानी बातें क्यों याद करते हैं।
बच्चे स्कूल से लौटकर इतना खुश क्यों होते हैं।
उसे हर चीज के पीछे की कहानी जानने की इच्छा होती थी।
उसके पास एक पुरानी कॉपी थी।
कॉपी के कई पन्ने फटे हुए थे। कुछ पन्नों पर स्कूल का काम था, कुछ पर अधूरी कविताएँ और कुछ पर अर्जुन के अपने विचार।
वह कभी-कभी गाँव के बारे में लिखता।
“आज खेतों में बहुत हवा चल रही थी।”
“आज माँ बहुत थकी हुई लग रही थीं।”
“आज पिता देर से घर आए।”
उस समय उसे नहीं पता था कि वह लिखना सीख रहा है।
उसे बस इतना पता था कि मन में जो बात आती है, उसे कागज पर लिख देने से मन हल्का हो जाता है।
एक दिन पिता काम से लौटे।
उनके कपड़ों पर मिट्टी लगी थी।
चेहरा थका हुआ था।
अर्जुन ने उन्हें देखा और पूछा,
“बाबा, बहुत थक गए?”
पिता ने मुस्कुराकर कहा,
“थकान तो काम करने वालों की साथी है बेटा।”
अर्जुन चुप हो गया।
कुछ देर बाद उसने पूछा,
“आप रोज इतना काम करते हो, फिर भी पैसे कम क्यों पड़ जाते हैं?”
पिता ने बेटे की तरफ देखा।
कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“क्योंकि घर चलाना सिर्फ रोटी खरीदने का नाम नहीं है।”
“दवा चाहिए।”
“कपड़े चाहिए।”
“पढ़ाई चाहिए।”
“कभी कोई अचानक जरूरत आ जाती है।”
“जिंदगी में खर्च कभी खत्म नहीं होता।”
अर्जुन उस दिन बहुत देर तक पिता की बात सोचता रहा।
उसने पहली बार महसूस किया कि गरीबी सिर्फ पैसे की कमी नहीं होती।
गरीबी कभी-कभी उन इच्छाओं को भी रोक देती है जिन्हें इंसान पूरा करना चाहता है।
स्कूल से जिंदगी की पाठशाला तक
अर्जुन पढ़ना चाहता था।
लेकिन घर की परिस्थितियाँ हमेशा उसके पक्ष में नहीं थीं।
एक तरफ पढ़ाई थी और दूसरी तरफ घर की जरूरतें।
जब भी पिता की आमदनी कम होती, अर्जुन का मन परेशान हो जाता।
वह सोचता,
“अगर मैं भी काम करूँ तो घर में थोड़ी मदद हो जाएगी।”
माँ चाहती थीं कि वह पढ़े।
एक दिन माँ ने कहा,
“बेटा, पढ़ाई मत छोड़ना।”
अर्जुन ने पूछा,
“अगर घर में पैसे की जरूरत हो तो?”
माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“गरीबी से लड़ने का सबसे मजबूत हथियार ज्ञान है।”
अर्जुन ने सिर हिला दिया।
लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी इच्छा के हिसाब से नहीं चलती।
कुछ समय बाद घर की जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगीं।
पिता की कमाई से घर चलाना मुश्किल हो रहा था।
अर्जुन ने आखिरकार फैसला किया कि वह काम करेगा।
उस दिन उसने माँ को अपना फैसला बताया।
माँ कुछ देर तक चुप रहीं।
उनकी आँखें नम हो गईं।
“बेटा, मजबूरी में लिया गया फैसला जिंदगी भर का पछतावा मत बनाना।”
अर्जुन ने माँ का हाथ पकड़कर कहा,
“माँ, मैं पढ़ाई छोड़ रहा हूँ, सपने नहीं।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।
उस दिन अर्जुन की जिंदगी बदल गई।
उसकी उम्र छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारियाँ बड़ी हो गई थीं।
पूरनपुर की ओर पहला कदम
अर्जुन को पता चला कि पूरनपुर में कुछ जगह मजदूरी का काम मिल सकता है।
अगली सुबह वह जल्दी उठ गया।
माँ ने उसके लिए रोटियाँ बाँधीं।
“रास्ते में खा लेना।”
अर्जुन ने पूछा,
“माँ, अगर काम नहीं मिला तो?”
माँ ने मुस्कुराकर कहा,
“तो कल फिर कोशिश करना।”
अर्जुन घर से निकल पड़ा।
चार फिरोजपुर की गलियाँ पीछे छूटती गईं।
वह पगडंडी से सड़क पर आया।
पूरनपुर की तरफ बढ़ते हुए उसके मन में तरह-तरह के विचार चल रहे थे।
क्या उसे काम मिलेगा?
क्या मजदूरी ठीक मिलेगी?
क्या वह परिवार की मदद कर पाएगा?
इन सवालों का कोई जवाब उसके पास नहीं था।
लेकिन उसके पास कोशिश करने की हिम्मत थी।
पूरनपुर पहुँचकर उसने कई जगह काम पूछा।
किसी ने मना कर दिया।
किसी ने कहा,
“अभी जरूरत नहीं है।”
किसी ने कहा,
“कल आना।”
अर्जुन पूरे दिन घूमता रहा।
शाम तक उसे कोई पक्का काम नहीं मिला।
वह थका हुआ एक पेड़ के नीचे बैठ गया।
माँ की दी हुई रोटियाँ निकालीं।
रोटी खाते हुए उसकी आँखें भर आईं।
उसे लगा कि वह अपने परिवार के लिए कुछ भी नहीं कर पा रहा।
फिर उसने खुद से कहा,
“एक दिन से जिंदगी तय नहीं होती।”
वह उठा।
और वापस गाँव की तरफ चल पड़ा।