योगकुण्डलिनी उपनिषद--योगकुण्डलिनी उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध योग-उपनिषद् है। परम्परागत पाठ में इसके 3 अध्याय और लगभग 171 मंत्र/श्लोक माने जाते हैं। इसमें प्राण, चित्त, मिताहार, आसन, प्राणायाम, कुण्डलिनी, नाड़ी, बन्ध, खेचरी विद्या और अन्ततः आत्म-ब्रह्मज्ञान का विवेचन है।मंगलाचरणयोगकुण्डल्युपनिषद्योगसिद्धिहृदासनम् ।निर्विशेषब्रह्मतत्त्वं स्वमात्रमिति चिन्तये ॥अर्थ:योगकुण्डलिनी उपनिषद् जिस योगसिद्धि के हृदय-आसन का वर्णन करती है, उस भेदरहित ब्रह्मतत्त्व को अपने ही स्वरूप के रूप में मैं चिन्तन करता हूँ।शान्ति-मन्त्रॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम दोनों मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन और साधना करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति, शान्ति, शान्ति।अध्याय-- ११- हरिः ॐ ॥ हेतुद्वयं हि चित्तस्य वासना च समीरणः ।तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तद्द्वावपि विनश्यतः ॥ १॥अर्थ:चित्त के दो प्रमुख कारण हैं—वासना और प्राणवायु। इनमें से किसी एक का निरोध हो जाने पर दोनों का निरोध हो जाता है।२--तयोरादौ समीरस्य जयं कुर्यान्नरः सदा ।मिताहारश्चासनं च शक्तिश्चालस्तृतीयकः ॥ २॥अर्थ:मनुष्य को पहले प्राणवायु पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। इसके लिए मिताहार, आसन और शक्ति-चालन—ये तीन साधन बताए गए हैं।३-एतेषां लक्षणं वक्ष्ये शृणु गौतम सादरम् ।सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशविवर्जितः ॥ ३॥अर्थ:हे गौतम! अब मैं इन साधनों के लक्षण बताता हूँ। ऐसा भोजन करना चाहिए जो स्निग्ध, पौष्टिक और मधुर हो तथा पेट का एक-चौथाई भाग खाली रखा जाए।४-भुज्यते शिवसम्प्रीत्यै मिताहारः स उच्यते ।आसनं द्विविधं प्रोक्तं पद्मं वज्रासनं तथा ॥ ४॥अर्थ:जो भोजन संयमपूर्वक शिव की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, उसे मिताहार कहते हैं। आसन दो प्रकार के बताए गए हैं—पद्मासन और वज्रासन।५-ऊर्वोरुपरि चेद्धत्ते उभे पादतले यथा ।पद्मासनं भवेदेतत्सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ५॥अर्थ:दोनों पैरों के तलवों को विपरीत जंघाओं के ऊपर स्थापित करने से पद्मासन बनता है। उपनिषद् इसे पापों का नाश करने वाला आसन कहती है।६--वामाङ्घ्रिमूलकन्दाधो ह्यन्यं तदुपरि क्षिपेत् ।समग्रीवशिरःकायो वज्रासनमितीरितम् ॥ ६॥अर्थ:बाएँ पैर की एड़ी को मूल-कन्द के नीचे और दूसरे पैर को उसके ऊपर रखकर गर्दन, सिर और शरीर को सीधा रखना—यह वज्रासन कहा गया है।७-कुण्डल्येव भवेच्छक्तिस्तां तु सञ्चालयेद्बुधः ।स्वस्थानादाभ्रुवोर्मध्यं शक्तिचालनमुच्यते ॥ ७॥अर्थ:कुण्डलिनी ही शक्ति है। ज्ञानी साधक उसे उसके स्थान से भ्रूमध्य तक ले जाने का अभ्यास करता है। इसे शक्ति-चालन कहा गया है।८--तत्साधने द्वयं मुख्यं सरस्वत्यास्तु चालनम् ।प्राणरोधमथाभ्यासादृज्वी कुण्डलिनी भवेत् ॥ ८॥अर्थ:इस साधना में दो बातें प्रमुख हैं—सरस्वती नाड़ी का संचालन और प्राण का निरोध। निरन्तर अभ्यास से कुण्डलिनी शक्ति जागृत/ऊर्ध्वगामी होने की बात कही गई है।९--तयोरादौ सरस्वत्याश्चालनं कथयामि ते ।अरुन्धत्येव कथिता पुराविद्भिः सरस्वती ॥ ९॥अर्थ:इन दोनों में पहले मैं सरस्वती के संचालन की विधि बताता हूँ। प्राचीन विद्वानों ने सरस्वती को अरुन्धती भी कहा है।१०--यस्याः सञ्चालनेनैव स्वयं चलति कुण्डली ।इडायां वहति प्राणे बद्ध्वा पद्मासनं दृढम् ॥ १०॥अर्थ:जिसके संचालन से कुण्डलिनी स्वयं गतिशील होती है, उस साधना में जब प्राण इड़ा नाड़ी में प्रवाहित हो, तब साधक को दृढ़ पद्मासन में स्थित होना बताया गया है।११--द्वादशाङ्गुलदैर्घ्यं च अम्बरं चतुरङ्गुलम् ।विस्तीर्य तेन तन्नाडीं वेष्टयित्वा ततः सुधीः ॥ ११॥अर्थ:इसके बाद बारह अंगुल लम्बे और चार अंगुल चौड़े वस्त्र को फैलाकर उससे संबंधित नाड़ी-स्थान को लपेटने का निर्देश मिलता है।१२--अङ्गुष्ठतर्जनीभ्यां तु हस्ताभ्यां धारयेद् दृढम् ।स्वशक्त्या चालयेद्वामे दक्षिणेन पुनः पुनः ॥ १२॥अर्थ:दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी से उसे दृढ़ता से पकड़कर अपनी शक्ति के अनुसार बाएँ और दाएँ बार-बार चलाने का वर्णन है।१३--मुहूर्तद्वयपर्यन्तं निर्भयाच्चालयेत्सुधीः ।ऊर्ध्वमाकर्षयेत्किञ्चित्सुषुम्णां कुण्डलीगताम् ॥ १३॥अर्थ:साधक को निर्धारित समय तक इस अभ्यास को करना और सुषुम्ना में स्थित कुण्डलिनी को ऊपर की ओर ले जाने का निर्देश दिया गया है।१४--तेन कुण्डलिनी तस्याः सुषुम्णाया मुखं व्रजेत् ।जहाति तस्मात्प्राणोऽयं सुषुम्णां व्रजति स्वतः ॥ १४॥अर्थ:इससे कुण्डलिनी सुषुम्ना के द्वार तक पहुँचती है और तब प्राण अपने सामान्य मार्ग को छोड़कर सुषुम्ना में प्रवेश करता है।१५--तुन्दे तु तानं कुर्याच्च कण्ठसङ्कोचने कृते ।सरस्वत्यां चालनेन वक्षसश्चोर्ध्वगो मरुत् ॥ १५॥अर्थ:कण्ठ-संकोच के साथ उदर को उचित प्रकार से साधते हुए सरस्वती के संचालन से प्राणवायु को ऊपर की ओर ले जाने का वर्णन है।१६--सूर्येण रेचयेद्वायुं सरस्वत्यास्तु चालने ।कण्ठसङ्कोचनं कृत्वा वक्षसश्चोर्ध्वगो मरुत् ॥ १६॥अर्थ:सरस्वती के संचालन के समय सूर्य-नाड़ी से रेचक करने तथा कण्ठ को संकुचित रखने से प्राण ऊपर की ओर जाता है—ऐसा उपनिषद् में कहा गया है।१७--तस्मात्सञ्चालयेन्नित्यं शब्दगर्भां सरस्वतीम् ।यस्याः सञ्चालनेनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते ॥ १७॥अर्थ:इसलिए साधक को शब्दमयी सरस्वती का नियमित अभ्यास करना चाहिए। उपनिषद् कहती है कि इसके संचालन से योगी रोगों से मुक्त होता है।१८--गुल्मं जलोदरः प्लीहा ये चान्ये तुन्दमध्यगाः ।सर्वे ते शक्तिचालेन रोगा नश्यन्ति निश्चयम् ॥ १८॥अर्थ:उदर तथा प्लीहा आदि से संबंधित अनेक रोग शक्ति-चालन से नष्ट होते हैं—ऐसा इस प्राचीन योगग्रन्थ में वर्णित है।१९--प्राणरोधमथेदानीं प्रवक्ष्यामि समासतः ।प्राणश्च दहनो वायुरायामः कुम्भकः स्मृतः ॥ १९॥अर्थ:अब मैं संक्षेप में प्राण-निरोध का वर्णन करता हूँ। प्राणवायु के आयाम अर्थात् उसके नियमन और धारण को कुम्भक कहा गया है।२०--स एव द्विविधः प्रोक्तः सहितः केवलस्तथा ।यावत्केवलसिद्धिः स्यात्तावत्सहितमभ्यसेत् ॥ २०॥अर्थ:कुम्भक दो प्रकार का कहा गया है—सहित कुम्भक और केवल कुम्भक। जब तक केवल-कुम्भक की सिद्धि न हो, तब तक सहित-कुम्भक का अभ्यास करना बताया गया है। महत्त्वपूर्ण: आगे के श्लोकों में सूर्यभेदन, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, कुम्भक, बन्ध, कुण्डलिनी का ऊर्ध्वगमन और फिर दूसरे अध्याय में खेचरी विद्या तथा तीसरे अध्याय में आत्म-ब्रह्मज्ञान आता है। उपलब्ध पूर्ण पाठ परम्परा में तीन अध्यायों में 171 श्लोकों तक जाता है।श्लोक २१--सूर्योज्जायी शीतली च भस्त्री चैव चतुर्थिका ।भेदैरेव समं कुम्भो यः स्यात्सहितकुम्भकः ॥ २१॥हिन्दी अर्थ:सूर्यभेदन, उज्जायी, शीतली और भस्त्रिका—इन विभिन्न प्राणायामों के साथ जो कुम्भक किया जाता है, उसे सहित कुम्भक कहा जाता है।श्लोक २२पवित्रे निर्जने देशे शर्करादिविवर्जिते ।धनुःप्रमाणपर्यन्ते शीताग्निजलवर्जिते ॥ २२॥अर्थ:प्राणायाम का अभ्यास पवित्र और एकान्त स्थान में करना चाहिए, जहाँ कंकड़-पत्थर आदि न हों और अत्यधिक ठंड, अग्नि अथवा जल का व्यवधान न हो।श्लोक २३पवित्रे नात्युच्चनीचे ह्यासने सुखदे सुखे ।बद्धपद्मासनं कृत्वा सरस्वत्यास्तु चालनम् ॥ २३॥अर्थ:स्वच्छ, न बहुत ऊँचे और न बहुत नीचे, सुखद आसन पर बैठकर पद्मासन बाँधना और सरस्वती नाड़ी के संचालन का अभ्यास करना चाहिए।श्लोक २४दक्षनाड्या समाकृष्य बहिष्ठं पवनं शनैः ।यथेष्टं पूरयेद्वायुं रेचयेदिडया ततः ॥ २४॥अर्थ:दाहिनी नाड़ी से बाहर की वायु को धीरे-धीरे भीतर खींचकर फेफड़ों को भरना और फिर इड़ा नाड़ी से वायु बाहर निकालना बताया गया है।श्लोक २५कपालशोधने वापि रेचयेत्पवनं शनैः ।चतुष्कं वातदोषं तु कृमिदोषं निहन्ति च ॥ २५॥अर्थ:वायु को धीरे-धीरे बाहर निकालना कपाल-शोधन में भी उपयोगी बताया गया है। उपनिषद् के अनुसार यह वात-संबंधी दोषों तथा कृमि-दोष को दूर करता है।श्लोक २६पुनः पुनरिदं कार्यं सूर्यभेदमुदाहृतम् ।मुखं संयम्य नाडिभ्यामाकृष्य पवनं शनैः ॥ २६॥अर्थ:इस अभ्यास को बार-बार करना चाहिए। इसे सूर्यभेदन कहा गया है। मुख को बंद रखकर नाड़ियों के माध्यम से वायु को धीरे-धीरे ग्रहण किया जाता है।श्लोक २७यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ।पूर्ववत्कुम्भयेत्प्राणं रेचयेदिडया ततः ॥ २७॥अर्थ:जब वायु कण्ठ से हृदय तक ध्वनि के साथ पहुँचती है, तब पूर्वविधि से प्राण को रोककर बाद में इड़ा नाड़ी से बाहर निकालना चाहिए।श्लोक २८शीर्षोदितानलहरं गलश्लेष्महरं परम् ।सर्वरोगहरं पुण्यं देहानलविवर्धनम् ॥ २८॥अर्थ:उज्जायी कुम्भक के प्रभाव से सिर में उत्पन्न उष्णता तथा कण्ठ का कफ दूर होता है। इसे शरीर की अग्नि बढ़ाने वाला और रोगों को दूर करने वाला बताया गया है।श्लोक २९नाडीजलोदरं धातुगतदोषविनाशनम् ।गच्छतस्तिष्ठतः कार्यमुज्जाय्याख्यं तु कुम्भकम् ॥ २९॥अर्थ:यह नाड़ियों और शरीर के भीतर के दोषों को दूर करने वाला कहा गया है। चलते या स्थिर रहते हुए किया जाने वाला यह कुम्भक उज्जायी कुम्भक कहलाता है।श्लोक ३०जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत्कुम्भकादनु ।शनैस्तु घ्राणरन्ध्राभ्यां रेचयेदनिलं सुधीः ॥ ३०॥अर्थ:जीभ के द्वारा वायु को भीतर खींचकर पूर्ववत् कुम्भक करना और फिर दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे वायु बाहर निकालना चाहिए।श्लोक ३१गुल्मप्लीहादिकान्दोषान्क्षयं पित्तं ज्वरं तृषाम् ।विषाणि शीतली नाम कुम्भकोऽयं निहन्ति च ॥ ३१॥अर्थ:यह शीतली कुम्भक कहलाता है। उपनिषद् के अनुसार यह गुल्म, प्लीहा आदि के दोष, पित्त, ज्वर, अधिक प्यास और विष के प्रभाव को दूर करने वाला है।श्लोक ३२ततः पद्मासनं बद्ध्वा समग्रीवोदरः सुधीः ।मुखं संयम्य यत्नेन प्राणं घ्राणेन रेचयेत् ॥ ३२॥अर्थ:इसके बाद पद्मासन में बैठकर गर्दन और उदर को सीधा रखते हुए, मुख बंद करके नासिका से प्राण को बाहर निकालना चाहिए।श्लोक ३३यथा लगति कण्ठात्तु कपाले सस्वनं ततः ।वेगेन पूरयेत्किञ्चिधृत्पद्मावधि मारुतम् ॥ ३३॥अर्थ:जब कण्ठ से कपाल तक वायु की ध्वनि अनुभव हो, तब कुछ मात्रा में वायु को तीव्रता से हृदय-कमल तक भरना चाहिए।श्लोक ३४पुनर्विरेचयेत्तद्वत्पूरयेच्च पुनः पुनः।यथैव लोहकाराणां भस्त्रा वेगेन चाल्यते ॥ ३४॥अर्थ:फिर उसी प्रकार वायु को बाहर निकालकर बार-बार भीतर भरना चाहिए, जैसे लोहार की धौंकनी तीव्र गति से चलती है।श्लोक ३५तथैव स्वशरीरस्थं चालयेत्पवनं शनैः ।यथा श्रमो भवेद्देहे तथा सूर्येण पूरयेत् ॥ ३५॥अर्थ:इसी प्रकार शरीर में स्थित वायु को संचालित करना चाहिए। जब शरीर में श्रम अनुभव हो, तब सूर्य-नाड़ी से वायु ग्रहण करनी चाहिए।श्लोक ३६यथोदरं भवेत्पूर्णं पवनेन तथा लघु ।धारयन्नासिकामध्यं तर्जनीभ्यां विना दृढम् ॥ ३६॥अर्थ:वायु से उदर को भरकर शरीर को हल्का रखते हुए नासिका को तर्जनी के प्रयोग के बिना उचित प्रकार से नियंत्रित रखना चाहिए।श्लोक ३७कुम्भकं पूर्ववत्कृत्वा रेचेयेदिडयानिलम् ।कण्ठोत्थितानलहरं शरीराग्निविवर्धनम् ॥ ३७॥अर्थ:पूर्वविधि से कुम्भक करके इड़ा से वायु बाहर निकालनी चाहिए। यह कण्ठ से उत्पन्न अग्नि को बढ़ाने वाला और शरीर की जठराग्नि को प्रबल करने वाला कहा गया है।श्लोक ३८कुण्डलीबोधकं पुण्यं पापघ्नं शुभदं सुखम् ।ब्रह्मनाडीमुखान्तस्थकफाद्यर्गलनाशनम् ॥ ३८॥अर्थ:यह कुण्डलिनी को जागृत करने वाला, शुभ और सुखदायक कहा गया है। ब्रह्मनाड़ी के मुख पर स्थित कफ आदि के अवरोध को दूर करने वाला भी बताया गया है।श्लोक ३९गुणत्रयसमुद्भूतग्रन्थित्रयविभेदकम् ।विशेषेणैव कर्तव्यं भस्त्राख्यं कुम्भकं त्विदम् ॥ ३९॥अर्थ:यह भस्त्रिका कुम्भक तीन गुणों से उत्पन्न तीन ग्रन्थियों के भेदन में सहायक बताया गया है। इसलिए इसका विशेष रूप से अभ्यास करने की बात कही गई है।श्लोक ४०चतुर्णामपि भेदानां कुम्भके समुपस्थिते ।बन्धत्रयमिदं कार्यं योगिभिर्वीतकल्मषैः ॥ ४०॥अर्थ:इन चार प्रकार के कुम्भकों के अभ्यास में निष्पाप योगियों द्वारा तीन बन्धों का प्रयोग करना चाहिए।श्लोक ४१प्रथमो मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयणाभिधः ।जालन्धरस्तृतीयस्तु तेषां लक्षणमुच्यते ॥ ४१॥अर्थ:तीन बन्ध हैं—मूलबन्ध,उड्डीयानबन्ध,जालन्धरबन्ध।अब इनके लक्षण बताए जाते हैं।श्लोक ४२अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् ।आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ॥ ४२॥अर्थ:अपानवायु सामान्यतः नीचे की ओर जाती है। उसे संकुचन द्वारा ऊपर की ओर ले जाना मूलबन्ध कहलाता है।श्लोक ४३अपाने चोर्ध्वगे याते सम्प्राप्ते वह्निमण्डले ।ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुनाऽऽहता ॥ ४३॥अर्थ:जब अपान ऊपर जाकर अग्निमण्डल तक पहुँचता है, तब वायु के प्रभाव से अग्नि की ज्वाला अधिक प्रबल और ऊँची होती है।श्लोक ४४ततो यातौ वह्न्यपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् ।तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा ॥ ४४॥अर्थ:अग्नि और अपान जब प्राण के साथ मिलते हैं, तब अत्यन्त प्रज्वलित अग्नि उत्पन्न होती है और शरीर की आन्तरिक अग्नि भी प्रबल होती है।श्लोक ४५तेन कुण्डलिनी सुप्ता सन्तप्ता सम्प्रबुध्यते ।दण्डाहतभुजङ्गीव निःश्वस्य ऋजुतां व्रजेत् ॥ ४५॥अर्थ:उस उष्णता से सुप्त कुण्डलिनी जागृत होती है और दण्ड से स्पर्श की गई सर्पिणी के समान सीधी होकर ऊपर की ओर बढ़ती है—ऐसा योग-परम्परा में वर्णित है।श्लोक ४६बिलप्रवेशतो यत्र ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् ।तस्मान्नित्यं मूलबन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ॥ ४६॥अर्थ:कुण्डलिनी जिस मार्ग से ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश करती है, उस कारण योगियों को मूलबन्ध का नियमित अभ्यास करने की बात कही गई है।श्लोक ४७कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः ।बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥ ४७॥अर्थ:कुम्भक के अन्त में और रेचक के आरम्भ में उड्डीयानबन्ध किया जाना बताया गया है। इससे प्राण सुषुम्ना की ओर ऊपर उठता है।श्लोक ४८तस्मादुड्डीयणाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः ।सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेद्दृढम् ॥ ४८॥अर्थ:प्राण के ऊपर उठने के कारण इसे उड्डीयानबन्ध कहा गया है। इसके अभ्यास में वज्रासन आदि की स्थिति का वर्णन किया गया है।श्लोक ४९गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् ।पश्चिमं तानमुदरे धारयेद्-हृदये गले ॥ ४९॥अर्थ:गुल्फ के समीप स्थित कन्द-स्थान को दबाते हुए उदर, हृदय और कण्ठ में उचित प्रकार से खिंचाव बनाए रखने का निर्देश है।श्लोक ५०शनैः शनैर्यदा प्राणस्तुन्दसन्धिं निगच्छति ।तुन्ददोषं विनिर्धूय कर्तव्यं सततं शनैः ॥ ५०॥अर्थ:जब प्राण धीरे-धीरे उदर के मध्य भाग में पहुँचता है, तब उदर के दोषों को दूर करने के लिए यह अभ्यास धीरे-धीरे और निरन्तर करना चाहिए।श्लोक ५१पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः ।कण्ठसङ्कोचरूपोऽसौ वायुमार्गनिरोधकः ॥ ५१॥अर्थ:पूरक के अन्त में जालन्धरबन्ध करना चाहिए। यह कण्ठ के संकोच का रूप है और वायु के मार्ग को नियंत्रित करता है।श्लोक ५२अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसङ्कोचने कृते ।मध्ये पश्चिमतानेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥ ५२॥अर्थ:नीचे के भाग को संकुचित करने और कण्ठ को नियंत्रित करने पर तथा मध्य भाग में उचित खिंचाव होने पर प्राण ब्रह्मनाड़ी की ओर जाता है।श्लोक ५३पूर्वोक्तेन क्रमेणैव सम्यगासनमास्थितः ।चालनं तु सरस्वत्याः कृत्वा प्राणं निरोधयेत् ॥ ५३॥अर्थ:पूर्व में बताए क्रम से उचित आसन में बैठकर सरस्वती नाड़ी का संचालन करते हुए प्राण को रोकना चाहिए।श्लोक ५४प्रथमे दिवसे कार्यं कुम्भकानां चतुष्टयम् ।प्रत्येकं दशसङ्ख्याकं द्वितीये पञ्चभिस्तथा ॥ ५४॥अर्थ:उपनिषद् अभ्यास की एक क्रमिक संख्या बताती है—पहले दिन चार प्रकार के कुम्भक प्रत्येक दस बार और अगले दिन क्रम में वृद्धि करने का निर्देश है।श्लोक ५५विशत्यलं तृतीयेऽह्नि पञ्चवृद्ध्या दिने दिने ।कर्तव्यः कुम्भको नित्यं बन्धत्रयसमन्वितः ॥ ५५॥अर्थ:तीसरे दिन बीस बार तक और फिर प्रतिदिन पाँच की वृद्धि का निर्देश दिया गया है। कुम्भक को तीनों बन्धों के साथ करने की बात कही गई है।श्लोक ५६दिवा सुप्तिर्निशायां तु जागरादतिमैथुनात् ।बहुसङ्क्रमणं नित्यं रोधान्मूत्रपुरीषयोः ॥ ५६॥अर्थ:दिन में अधिक सोना, रात में जागना, अत्यधिक मैथुन, बहुत अधिक घूमना-फिरना तथा मूत्र-मल के वेग को रोकना—इनसे बचने का निर्देश है।श्लोक ५७विषमाशनदोषाच्च प्रयासप्राणचिन्तनात् ।शीघ्रमुत्पद्यते रोगः स्तम्भयेद्यदि संयमी ॥ ५७॥अर्थ:अनियमित भोजन और अत्यधिक परिश्रम आदि से रोग शीघ्र उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए संयमी व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए।श्लोक ५८योगाभ्यासेन मे रोग उत्पन्न इति कथ्यते ।ततोऽभ्यासं त्यजेदेवं प्रथमं विघ्न उच्यते ॥ ५८॥अर्थ:“योगाभ्यास के कारण मुझे रोग हुआ”—ऐसा मानकर अभ्यास को छोड़ देना प्रथम विघ्न कहा गया है।श्लोक ५९द्वितीयं संशयाख्यं च तृतीयं च प्रमत्तता ।आलस्याख्यं चतुर्थं च निद्रारूपं तु पञ्चमम् ॥ ५९॥अर्थ:योग के मार्ग में विघ्न हैं—दूसरा संशय, तीसरा प्रमाद, चौथा आलस्य, और पाँचवाँ अधिक निद्रा।श्लोक ६०षष्ठं तु विरतिर्भ्रान्तिः सप्तमं परिकीर्तितम् ।विषमं चाष्टमं चैव अनाख्यं नवमं स्मृतम् ॥ ६०॥अर्थ:छठा विघ्न विरक्ति/अभ्यास से हटना, सातवाँ भ्रान्ति, आठवाँ विषमता, और नौवाँ अनाख्य अर्थात् ऐसा अवरोध जिसका स्पष्ट नाम या स्वरूप बताना कठिन है।श्लोक ६१अलब्धिर्योगतत्त्वस्य दशमं प्रोच्यते बुधैः ।इत्येतद्विघ्नदशकं विचारेण त्यजेद्बुधः ॥ ६१॥अर्थ:योगतत्त्व की उपलब्धि न होना दसवाँ विघ्न कहा गया है। विवेकी साधक को इन दसों विघ्नों को पहचानकर उनसे बचना चाहिए।श्लोक ६२प्राणाभ्यासस्ततः कार्यो नित्यं सत्त्वस्थया धिया ।सुषुम्ना लीयते चित्तं तथा वायुः प्रधावति ॥ ६२॥अर्थ:इसके बाद सात्त्विक और स्थिर बुद्धि से प्रतिदिन प्राण का अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास से चित्त सुषुम्ना में लीन होने लगता है और प्राण उसी मार्ग में प्रवाहित होता है।श्लोक ६३शुष्के मले तु योगी च स्याद्गतिश्चलिता ततः ।अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् ॥ ६३॥अर्थ:जब शरीर के मल-दोष सूख जाते हैं और योगी की गति स्थिर होने लगती है, तब वह अपान की नीचे जाने वाली प्रवृत्ति को बलपूर्वक ऊपर की ओर ले जाता है।श्लोक ६४आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ।अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥ ६४॥अर्थ:इस संकुचन को मूलबन्ध कहा जाता है। ऊपर उठाया गया अपान अग्नि के साथ आगे बढ़ता है।श्लोक ६५प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् ।मिलित्वा कुण्डलीं याति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥ ६५॥अर्थ:फिर अग्नि प्राण के स्थान की ओर जाती है और प्राण तथा अपान शीघ्र ही परस्पर मिलकर सुप्त कुण्डलिनी की ओर जाते हैं।श्लोक ६६तेनाग्निना च सन्तप्ता पवनेनैव चालिता ।प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्ना वदनान्तरे ॥ ६६॥अर्थ:अग्नि से तप्त और वायु से प्रेरित होकर कुण्डलिनी अपना स्वरूप विस्तार करती हुई सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है।श्लोक ६७ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा रजोगुणसमुद्भवम् ।सुषुम्ना वदने शीघ्रं विद्युल्लेखेव संस्फुरेत् ॥ ६७॥अर्थ:इसके बाद रजोगुण से संबंधित ब्रह्मग्रन्थि का भेदन करती हुई कुण्डलिनी सुषुम्ना के मुख में बिजली की चमक के समान प्रकाशित होती है।श्लोक ६८विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरं हृदि संस्थिता ।ऊर्ध्वं गच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥ ६८॥अर्थ:हृदय में स्थित विष्णुग्रन्थि को पार करके शक्ति ऊपर जाती है। आगे स्थित रुद्रग्रन्थि की ओर उसका आरोहण होता है।श्लोक ६९भ्रुवोर्मध्ये तु संभिद्य याति शीतांशुमण्डलम् ।अनाहताख्यं यच्चक्रं दलैः षोडशभिर्युतम् ॥ ६९॥अर्थ:भ्रूमध्य को पार करके वह चन्द्रमण्डल की ओर जाती है। यहाँ अनाहत नामक चक्र, जो सोलह दलों से युक्त बताया गया है, का वर्णन आता है।श्लोक ७०तत्र शीतांशुसञ्जातं द्रवं शोषयति स्वयम् ।चलिते प्राणवेगेन रक्तं पीतं रवेर्ग्रहात् ॥ ७०॥अर्थ:वहाँ चन्द्र से उत्पन्न द्रव को वह स्वयं ग्रहण करती है। प्राण की गति से सूर्य से संबंधित रक्ततत्त्व भी प्रभावित होता है—ऐसा योगिक प्रतीक-वर्णन यहाँ मिलता है।श्लोक ७१यातेन्दुचक्रं यत्रास्ते शुद्धश्लेष्मद्रवात्मकम् ।तत्र सिक्तं ग्रसत्युष्णं कथं शीतस्वभावकम् ॥ ७१॥अर्थ:जहाँ चन्द्रचक्र स्थित है और शीतल द्रव का वर्णन किया गया है, वहाँ उसकी शीतल प्रकृति और उष्णता के परस्पर संबंध का विवेचन किया गया है।श्लोक ७२तथैव रभसा शुक्लं चन्द्ररूपं हि तप्यते ।ऊर्ध्वं प्रवहति क्षुब्धा तदैवं भ्रमतेतराम् ॥ ७२॥अर्थ:इसी प्रकार चन्द्रस्वरूप शुक्ल-तत्त्व तीव्रता से तप्त होता है और फिर ऊपर की ओर प्रवाहित होता है। शक्ति के जागरण से उसकी गति अत्यन्त तीव्र हो जाती है।श्लोक ७३तस्यास्वादवशाच्चित्तं बहिष्ठं विषयेषु यत् ।तदेव परमं भुक्त्वा स्वस्थः स्वात्मरतो युवा ॥ ७३॥अर्थ:उस दिव्य अनुभव के प्रभाव से जो चित्त पहले बाहरी विषयों में लगा हुआ था, वह उसी उच्चतर आनन्द का अनुभव करके शान्त हो जाता है और साधक अपने आत्मस्वरूप में रमण करने लगता है।श्लोक ७४प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली ।क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलीयते ॥ ७४॥अर्थ:कुण्डलिनी प्रकृति के आठ घुमाव रूपों से संबंधित अवस्था को पार करती है और शिव को अपने भीतर समाहित करके उसी में लीन हो जाती है।श्लोक ७५इत्यधोर्ध्वरजः शुक्लं शिवे तदनु मारुतः ।प्राणापानौ समौ याति सदा जातौ तथैव च ॥ ७५॥अर्थ:नीचे और ऊपर स्थित रज तथा शुक्ल तत्त्व शिव में एकीकृत होते हैं। इसके बाद प्राण और अपान समान अवस्था को प्राप्त होते हैं।श्लोक ७६भूतेऽल्पे चाप्यनल्पे वा वाचके त्वतिवर्धते ।धवयत्यखिला वाता अग्निमूषाहिरण्यवत् ॥ ७६॥अर्थ:सूक्ष्म अथवा स्थूल सभी तत्त्वों में प्राण की गति व्याप्त होती है। जैसे अग्नि सोने की अशुद्धियों को दूर करती है, वैसे ही यह वायु शरीर के दोषों को दूर करने वाली कही गई है।श्लोक ७७आधिभौतिकदेहं तु आधिदैविकविग्रहे ।देहोऽतिविमलं याति चातिवाहिकतामियात् ॥ ७७॥अर्थ:स्थूल, आधिभौतिक शरीर का रूपान्तरण आधिदैविक अवस्था की ओर होता है। शरीर अत्यन्त निर्मल होकर सूक्ष्म, दिव्य गति वाली अवस्था को प्राप्त होता है—ऐसा उपनिषद् का योगिक वर्णन है।श्लोक ७८जाड्यभावविनिर्मुक्तममलं चिन्मयात्मकम् ।तस्यातिवाहिकं मुख्यं सर्वेषां तु मदात्मकम् ॥ ७८॥अर्थ:जड़ता से मुक्त होकर शरीर निर्मल और चैतन्यमय स्वरूप को प्राप्त होता है। उसकी सूक्ष्म अवस्था चेतना के स्वरूप से संबंधित बताई गई है।श्लोक ७९जायाभवविनिर्मुक्तिः कालरूपस्य विभ्रमः ।इति तं स्वस्वरूपा हि मती रज्जुभुजङ्गवत् ॥ ७९॥अर्थ:पत्नी, जन्म-भव आदि के संबंध में जो संसार-बुद्धि है, वह काल से उत्पन्न भ्रम के समान है। अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होने पर यह भ्रम उसी प्रकार मिट जाता है जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम मिट जाता है।श्लोक ८०मृषैवोदेति सकलं मृषैव प्रविलीयते ।रौप्यबुद्धिः शुक्तिकायां स्त्रीपुंसोर्भ्रमतो यथा ॥ ८०॥अर्थ:जो कुछ अज्ञान के कारण उत्पन्न दिखाई देता है, वह मिथ्या रूप से ही प्रकट और लीन होता है। जैसे सीप में चाँदी दिखाई देना वास्तविक चाँदी नहीं, केवल भ्रम है; वैसे ही संसार की अनेक भेद-बुद्धियाँ भी अज्ञानजनित हैं।श्लोक ८१पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं लिङ्गसूत्रात्मनोरपि ।स्वापाव्याकृतयोरैक्यं स्वप्रकाशचिदात्मनोः ॥ ८१॥अर्थ:पिण्ड और ब्रह्माण्ड में एकता है। इसी प्रकार लिङ्गशरीर और सूत्रात्मा में, सुषुप्ति और अव्यक्त अवस्था में तथा स्वयं प्रकाशित चैतन्य और आत्मा में एकत्व है। यह श्लोक योगकुण्डलिनी उपनिषद् के अद्वैत-तत्त्वज्ञान का अत्यन्त महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। श्लोक २१–८१ का संक्षिप्त क्रमइन ६१ श्लोकों में उपनिषद् का क्रम इस प्रकार है:कुम्भक → सूर्यभेदन → उज्जायी → शीतली → भस्त्रिका → तीन बन्ध → योगाभ्यास के विघ्न → प्राण का सुषुम्ना में प्रवेश → कुण्डलिनी का जागरण → ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि, रुद्रग्रन्थि → चक्रों का आरोहण → शिव में शक्ति का लय → पिण्ड-ब्रह्माण्ड की एकता → आत्मज्ञान.।श्लोक ८२शक्तिः कुण्डलिनी नाम बिसतन्तुनिभा शुभा ।मूलकन्दं फणाग्रेण दृष्ट्वा कमलकन्दवत् ॥ ८२॥हिन्दी अर्थ:कुण्डलिनी नामक शक्ति अत्यन्त पवित्र है और कमल के तन्तु के समान सूक्ष्म कही गई है। वह मूलाधार में स्थित कन्द को अपने फण के अग्रभाग से घेरकर स्थित रहती है, जैसे कोई सर्प कमल-कन्द को घेरे हुए हो।श्लोक ८३मुखेन पुच्छं संगृह्य ब्रह्मरन्ध्रसमन्विता ।पद्मासनगतः स्वस्थो गुदमाकुञ्च्य साधकः ॥ ८३॥हिन्दी अर्थ:कुण्डलिनी अपने मुख से अपनी पूँछ को पकड़कर स्थित है और उसका संबंध ब्रह्मरन्ध्र तक बताया गया है। साधक पद्मासन में स्थिर होकर तथा मूलस्थान को संकुचित करके योगाभ्यास करता है।श्लोक ८४वायुमूर्ध्वगतं कुर्वन्कुम्भकाविष्टमानसः ।वाय्वाघातवशादग्निः स्वाधिष्ठानगतो ज्वलन् ॥ ८४॥हिन्दी अर्थ:कुम्भक में मन को स्थिर करके साधक प्राणवायु को ऊपर की ओर ले जाता है। प्राणवायु के प्रभाव से स्वाधिष्ठान में स्थित अग्नि प्रज्वलित होती है।श्लोक ८५ज्वलनाघातपवनाघातोरून्निद्रितोऽहिराट् ।ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा विष्णुग्रन्थिं भिनत्त्यतः ॥ ८५॥हिन्दी अर्थ:अग्नि और प्राणवायु के प्रभाव से महान् सर्प के समान सुप्त कुण्डलिनी जागृत होती है। जागृत होकर वह पहले ब्रह्मग्रन्थि का और उसके बाद विष्णुग्रन्थि का भेदन करती है।श्लोक ८६रुद्रग्रन्थिं च भित्त्वैव कमलानि भिनत्ति षट् ।सहस्रकमले शक्तिः शिवेन सह मोदते ॥ ८६॥हिन्दी अर्थ:कुण्डलिनी आगे रुद्रग्रन्थि का भेदन करती हुई छह कमलों अर्थात् छह चक्रों को पार करती है। अन्त में वह सहस्रार-कमल में पहुँचकर शिव के साथ आनन्दमय एकत्व को प्राप्त करती है।इसके बाद—सैवावस्था परा ज्ञेया सैव निर्वृतिकारिणी इति ॥अर्थ:वही अवस्था परम अवस्था जानने योग्य है; वही परम शान्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली है।इति प्रथमोऽध्यायः।द्वितीय अध्याय-- द्वितीय अध्याय में श्लोक १ से ४९ तक खेचरी विद्या का वर्णन है। श्लोक १अथाहं सम्प्रवक्ष्यामि विद्यां खेचरिसंज्ञिकाम् ।यथा विज्ञानवानस्या लोकेऽस्मिन्नजरोऽमरः ॥ १॥हिन्दी अर्थ:अब मैं खेचरी विद्या का वर्णन करता हूँ। इस विद्या को जानने वाला साधक इस संसार में जरा और मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने की अवस्था प्राप्त करता है—ऐसा उपनिषद् में कहा गया है। श्लोक २मृत्युव्याधिजराग्रस्तो दृष्ट्वा विद्यामिमां मुने ।बुद्धिं दृढतरां कृत्वा खेचरीं तु समभ्यसेत् ॥ २॥अर्थ:हे मुनि! मृत्यु, रोग और वृद्धावस्था से पीड़ित मनुष्य को इस विद्या को देखकर दृढ़ निश्चय के साथ खेचरी का अभ्यास करना चाहिए।श्लोक ३जरामृत्युगदघ्नो यः खेचरीं वेत्ति भूतले ।ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव तदभ्यासप्रयोगतः ॥ ३॥अर्थ:जो व्यक्ति खेचरी विद्या को उसके शास्त्रीय अर्थ और अभ्यास की परम्परा सहित जानता है, वह जरा और मृत्यु से मुक्ति प्राप्त करने वाला कहा गया है।श्लोक ४तं मुने सर्वभावेन गुरुं मत्वा समाश्रयेत् ।दुर्लभा खेचरी विद्या तदभ्यासोऽपि दुर्लभः ॥ ४॥अर्थ:हे मुनि! ऐसे गुरु को पूर्ण श्रद्धा से गुरु मानकर आश्रय लेना चाहिए। खेचरी विद्या दुर्लभ है और उसका वास्तविक अभ्यास भी अत्यन्त दुर्लभ है।श्लोक ५अभ्यासं मेलनं चैव युगपन्नैव सिध्यति ।अभ्यासमात्रनिरता न विन्दन्ते ह मेलनम् ॥ ५॥अर्थ:खेचरी में केवल अभ्यास और उसका वास्तविक “मेलन” एक साथ सहज ही सिद्ध नहीं होते। केवल अभ्यास में लगे रहने वाले साधक को मेलन की सिद्धि प्राप्त नहीं होती।श्लोक ६अभ्यासं लभते ब्रह्मञ्जन्मजन्मान्तरे क्वचित् ।मेलनं तु जन्मनां शतान्तेऽपि न लभ्यते ॥ ६॥अर्थ:अभ्यास की उपलब्धि भी अनेक जन्मों के बाद कहीं प्राप्त होती है; और मेलन की सिद्धि तो सैकड़ों जन्मों के बाद भी अत्यन्त दुर्लभ कही गई है।श्लोक ७अभ्यासं बहुजन्मान्ते कृत्वा तद्भावसाधितम् ।मेलनं लभते कश्चिद्योगी जन्मान्तरे क्वचित् ॥ ७॥अर्थ:बहुत जन्मों तक अभ्यास और साधना करने के बाद कोई विरला योगी किसी जन्म में मेलन की उपलब्धि प्राप्त करता है।श्लोक ८यदा तु मेलनं योगी लभते गुरुवक्त्रतः ।तदा तत्सिद्धिमाप्नोति यदुक्ता शास्त्रसन्ततौ ॥ ८॥अर्थ:जब योगी गुरु के मुख से मेलन की शिक्षा प्राप्त करता है, तब वह शास्त्रों में वर्णित उस सिद्धि को प्राप्त करता है।श्लोक ९ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव मेलनं लभते यदा ।तदा शिवत्वमाप्नोति निर्मुक्तः सर्वसंसृतेः ॥ ९॥अर्थ:जब साधक ग्रन्थ और उसके वास्तविक तत्त्वार्थ—दोनों के माध्यम से मेलन को जान लेता है, तब वह संसार के बन्धन से मुक्त होकर शिवत्व को प्राप्त होता है।श्लोक १०शास्त्रं विनापि संबोद्धुं गुरवोऽपि न शक्नुयुः ।तस्मात्सुदुर्लभतरं लभ्यं शास्त्रमिदं मुने ॥ १०॥अर्थ:इस शास्त्र के बिना गुरु भी इसके रहस्य को पूर्णतः समझा नहीं सकते। इसलिए हे मुनि, यह शास्त्र अत्यन्त दुर्लभ माना गया है।श्लोक ११यावन्न लभ्यते शास्त्रं तावद्गां पर्यटेद्यतिः ।यदा संलभ्यते शास्त्रं तदा सिद्धिः करे स्थिता ॥ ११॥अर्थ:जब तक ऐसा शास्त्र उपलब्ध न हो, तब तक साधक को उसकी खोज करनी चाहिए। शास्त्र प्राप्त होने पर सिद्धि का मार्ग उसके हाथ में आ जाता है।श्लोक १२न शास्त्रेण विना सिद्धिर्दृष्टा चैव जगत्त्रये ।तस्मान्मेलनदातारं शास्त्रदातारमच्युतम् ॥ १२॥अर्थ:तीनों लोकों में शास्त्रीय मार्गदर्शन के बिना सिद्धि प्राप्त होना नहीं देखा गया। इसलिए मेलन और शास्त्र का ज्ञान देने वाले गुरु का आश्रय लेना चाहिए।श्लोक १३तदभ्यासप्रदातारं शिवं मत्वा समाश्रयेत् ।लब्ध्वा शास्त्रमिदं मह्यमन्येषां न प्रकाशयेत् ॥ १३॥अर्थ:अभ्यास की शिक्षा देने वाले गुरु को शिवस्वरूप मानकर आश्रय लेना चाहिए। उपनिषद् इस ज्ञान को गुरु-परम्परा में गोपनीय रखने की बात कहती है।श्लोक १४तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गोपनीयं विजानता ।यत्रास्ते च गुरुर्ब्रह्मन्दिव्ययोगप्रदायकः ॥ १४॥अर्थ:इसलिए इस ज्ञान को जानने वाला साधक इसे सावधानीपूर्वक सुरक्षित रखे और उस गुरु की शरण जाए जो दिव्य योग का उपदेश देता है।श्लोक १५तत्र गत्वा च तेनोक्तविद्यां संगृह्य खेचरीम् ।तेनोक्तः सम्यगभ्यासं कुर्यादादावतन्द्रितः ॥ १५॥अर्थ:ऐसे गुरु के पास जाकर उनसे खेचरी विद्या प्राप्त करनी चाहिए और उनके निर्देश के अनुसार प्रारम्भ से ही सावधानीपूर्वक अभ्यास करना चाहिए।श्लोक १६अनया विद्यया योगी खेचरीसिद्धिभाग्भवेत् ।खेचर्या खेचरीं युञ्जन्खेचरीबीजपूरया ॥ १६॥अर्थ:इस विद्या के द्वारा योगी खेचरी-सिद्धि का अधिकारी होता है। खेचरी की साधना और उसके बीज-मन्त्र के द्वारा यह योग आगे बढ़ता है।श्लोक १७खेचराधिपतिर्भूत्वा खेचरेषु सदा वसेत् ।खेचरावसथं वह्निमम्बुमण्डलभूषितम् ॥ १७॥अर्थ:खेचरी-सिद्धि प्राप्त योगी खेचरों का अधिपति होकर दिव्य अवस्था में स्थित होता है। यहाँ अग्नि और जल-मण्डल से युक्त सूक्ष्म योगिक क्षेत्र का वर्णन है।श्लोक १८आख्यातं खेचरीबीजं तेन योगः प्रसिध्यति ।सोमांशनवकं वर्णं प्रतिलोमेन चोद्धरेत् ॥ १८॥अर्थ:खेचरी-बीज के द्वारा योग की सिद्धि होती है। आगे चन्द्र से संबंधित अक्षर-विन्यास को विशेष क्रम में ग्रहण करने का निर्देश है।श्लोक १९तस्मात्त्र्यंशकमाख्यातमक्षरं चन्द्ररूपकम् ।तस्मादप्यष्टमं वर्णं विलोमेन परं मुने ॥ १९॥अर्थ:उससे संबंधित तीन अंश वाले अक्षर को चन्द्ररूप कहा गया है। फिर आठवें वर्ण को विपरीत क्रम से ग्रहण करने का निर्देश दिया गया है।श्लोक २०तथा तत्परमं विद्धि तदादिरपि पञ्चमी ।इन्दोश्च बहुभिन्ने च कूटोऽयं परिकीर्तितः ॥ २०॥अर्थ:हे मुनि! इसे परम रहस्य समझो। चन्द्र से संबंधित अक्षर-विन्यास को यहाँ “कूट” कहा गया है।श्लोक २१गुरूपदेशलभ्यं च सर्वयोगप्रसिद्धिदम् ।यत्तस्य देहजा माया निरुद्धकरणाश्रया ॥ २१॥अर्थ:यह ज्ञान गुरु के उपदेश से ही प्राप्त होता है और योग की सिद्धि में सहायक माना गया है। इससे शरीर और इन्द्रियों से संबंधित माया के प्रभाव का निरोध होता है।श्लोक २२स्वप्नेऽपि न लभेत्तस्य नित्यं द्वादशजप्यतः ।य इमां पञ्च लक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः ॥ २२॥अर्थ:जो साधक इस मन्त्र का अत्यन्त अनुशासित रूप से पाँच लाख जप करता है, उसके लिए विशेष सिद्धि का वर्णन किया गया है। यह मन्त्र-साधना गुरु-परम्परा से संबंधित मानी गई है।श्लोक २३तस्य श्रीखेचरीसिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते ।नश्यन्ति सर्वविघ्नानि प्रसीदन्ति च देवताः ॥ २३॥अर्थ:ऐसे साधक में खेचरी-सिद्धि स्वतः प्रकट होती है, सभी विघ्न दूर होते हैं और देवताएँ प्रसन्न होती हैं—ऐसा उपनिषद् में कहा गया है।श्लोक २४वलीपलितनाशश्च भविष्यति न संशयः ।एवं लब्ध्वा महाविद्यामभ्यासं कारयेत्ततः ॥ २४॥अर्थ:इस महाविद्या की सिद्धि से झुर्रियों और बालों के सफेद होने आदि वृद्धावस्था के लक्षणों के नष्ट होने का वर्णन है। इसके बाद अभ्यास करना चाहिए।श्लोक २५अन्यथा क्लिश्यते ब्रह्मन्न सिद्धिः खेचरीपथे ।यदभ्यासविधौ विद्यां न लभेद्यः सुधामयीम् ॥ २५॥अर्थ:हे ब्रह्मन्! यदि अमृतमयी विद्या अभ्यास की उचित परम्परा से प्राप्त न हो, तो साधक को खेचरी के मार्ग में कष्ट होता है और सिद्धि प्राप्त नहीं होती।श्लोक २६ततः संमेलकादौ च लब्ध्वा विद्यां सदा जपेत् ।नान्यथा रहितो ब्रह्मन्न किञ्चित्सिद्धिभाग्भवेत् ॥ २६॥अर्थ:मेलन आदि की उचित शिक्षा प्राप्त करके साधक को निरन्तर उस विद्या का जप करना चाहिए। इसके बिना सिद्धि प्राप्त नहीं होती—ऐसा ग्रन्थ का कथन है।श्लोक २७यदिदं लभ्यते शास्त्रं तदा विद्यां समाश्रयेत् ।ततस्तदोदितां सिद्धिमाशु तां लभते मुनिः ॥ २७॥अर्थ:जब यह शास्त्र प्राप्त हो जाए, तब साधक को उसमें बताई विद्या का आश्रय लेना चाहिए। इसके बाद वह बताई गई सिद्धि को शीघ्र प्राप्त करता है—ऐसा कहा गया है।श्लोक २८–४७ — खेचरी की शारीरिक प्रक्रिया का ग्रन्थ-वर्णनयहाँ से पाठ में जीभ को तालुमूल की ओर ले जाने और उससे संबंधित अत्यन्त विशिष्ट शारीरिक क्रियाओं का वर्णन है। इन्हें केवल ऐतिहासिक/शास्त्रीय विवरण के रूप में समझना चाहिए।श्लोक २८तालुमूलं समुत्कृष्य सप्तवासरमात्मवित् ।स्वगुरूक्तप्रकारेण मलं सर्वं विशोधयेत् ॥ २८॥अर्थ:आत्मज्ञानी साधक गुरु द्वारा बताए हुए तरीके से तालु के मूल को साधने और उससे संबंधित शुद्धि की प्रक्रिया करता है।श्लोक २९स्नुहिपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् ।समादाय ततस्तेन रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ २९॥अर्थ:मूल पाठ में अत्यन्त तीक्ष्ण उपकरण द्वारा जीभ के नीचे के भाग से अत्यल्प मात्रा में काटने की प्रक्रिया का उल्लेख है।श्लोक ३०हित्वा सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रकर्षयेत् ।पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ ३०॥अर्थ:इसके बाद विशेष चूर्ण लगाने और सात दिन बाद फिर अत्यल्प मात्रा में काटने का वर्णन किया गया है।श्लोक ३१एवं क्रमेण षण्मासं नित्योद्युक्तः समाचरेत् ।षण्मासाद्रसनामूलं सिराबद्धं प्रणश्यति ॥ ३१॥अर्थ:ग्रन्थ में इस प्रक्रिया को क्रमशः छह महीने तक करने का वर्णन है, जिसके परिणामस्वरूप जीभ के मूल से जुड़ा बन्धन हटने की बात कही गई है।श्लोक ३२अथ वागीश्वरीधाम शिरो वस्त्रेण वेष्टयेत् ।शनैरुत्कर्षयेद्योगी कालवेलाविधानवित् ॥ ३२॥अर्थ:इसके बाद योगी विशेष विधि से जीभ को धीरे-धीरे ऊपर की ओर ले जाने का अभ्यास करता है।श्लोक ३३पुनः षण्मासमात्रेण नित्यं सङ्घर्षणान्मुने ।भ्रूमध्यावधि चाप्येति तिर्यक्कणबिलावधिः ॥ ३३॥अर्थ:निरन्तर अभ्यास से छह महीने के बाद जीभ की गति भ्रूमध्य के क्षेत्र तक पहुँचने का वर्णन है।श्लोक ३४अधश्च चुबुकं मूलं प्रयाति क्रमचारिता ।पुनः संवत्सराणां तु तृतीयादेव लीलया ॥ ३४॥अर्थ:क्रमिक अभ्यास में जीभ की गति नीचे के मूल से आगे बढ़ती है और समय के साथ उसकी पहुँच और अधिक विस्तृत बताई गई है।श्लोक ३५केशान्तमूर्ध्वं क्रमति तिर्यक् शाखावधिर्मुने ।अधस्तात्कण्ठकूपान्तं पुनर्वर्षत्रयेण तु ॥ ३५॥अर्थ:आगे के अभ्यास में जीभ के ऊपर और नीचे विभिन्न सूक्ष्म मार्गों तक पहुँचने का वर्णन किया गया है।श्लोक ३६ब्रह्मरन्ध्रं समावृत्य तिष्ठेदेव न संशयः ।तिर्यक् चूलितलं याति अधः कण्ठबिलावधि ॥ ३६॥अर्थ:अन्ततः जीभ ब्रह्मरन्ध्र के क्षेत्र को आवृत करती हुई और नीचे कण्ठ के मार्ग तक पहुँचती है—ऐसा योगिक वर्णन है।श्लोक ३७शनैः शनैर्मस्तकाच्च महावज्रकपाटभित् ।पूर्वं बीजयुता विद्या ह्याख्याता यतिदुर्लभा ॥ ३७॥अर्थ:धीरे-धीरे साधना द्वारा सिर के भीतर के अत्यन्त सूक्ष्म मार्ग को खोलने की प्रतीकात्मक बात कही गई है। यह विद्या अत्यन्त दुर्लभ बताई गई है।श्लोक ३८तस्याः षडङ्गं कुर्वीत तया षट्स्वरभिन्नया ।कुर्यादेवं करन्यासं सर्वसिद्ध्यादिहेतवे ॥ ३८॥अर्थ:उस विद्या के छह अंगों का अभ्यास करना चाहिए और छह स्वरों से संबंधित विन्यास के साथ करन्यास आदि करने का निर्देश है।श्लोक ३९शनैरेवं प्रकर्तव्यमभ्यासं युगपन्नहि ।युगपद्वर्तते यस्य शरीरं विलयं व्रजेत् ॥ ३९॥अर्थ:यह अभ्यास धीरे-धीरे करना चाहिए, एक साथ नहीं। ग्रन्थ चेतावनी देता है कि इसे अचानक करने से शरीर को हानि हो सकती है।श्लोक ४०तस्माच्छनैः शनैः कार्यमभ्यासं मुनिपुङ्गव ।यदा च बाह्यमार्गेण जिह्वा ब्रह्मबिलं व्रजेत् ॥ ४०॥अर्थ:इसलिए हे श्रेष्ठ मुनि, अभ्यास क्रमशः और धीरे-धीरे करना चाहिए। जब जीभ सूक्ष्म ब्रह्ममार्ग की ओर पहुँचती है, तब आगे की खेचरी अवस्था का वर्णन आता है।श्लोक ४१तदा ब्रह्मार्गलं ब्रह्मन्दुर्भेद्यं त्रिदशैरपि ।अङ्गुल्यग्रेण संघृष्य जिह्वामात्रं निवेशयेत् ॥ ४१॥अर्थ:उस अवस्था में ब्रह्मद्वार के अवरोध को पार करने की बात कही गई है और जीभ को उस मार्ग में स्थापित करने का वर्णन है।श्लोक ४२एवं वर्षत्रयं कृत्वा ब्रह्मद्वारं प्रविश्यति ।ब्रह्मद्वारे प्रविष्टे तु सम्यङ्मथनमाचरेत् ॥ ४२॥अर्थ:ग्रन्थ में तीन वर्ष के क्रमिक अभ्यास के बाद ब्रह्मद्वार में प्रवेश की बात कही गई है और उसके बाद विशेष “मन्थन” की चर्चा आती है।श्लोक ४३मथनेन विना केचित्साधयन्ति विपश्चितः ।खेचरीमन्त्रसिद्धस्य सिध्यते मथनं विना ॥ ४३॥अर्थ:कुछ विद्वान साधक मन्थन के बिना भी सिद्धि प्राप्त करते हैं। जिसे खेचरी-मन्त्र की सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उसके लिए मन्थन आवश्यक नहीं रहता—ऐसा कहा गया है।श्लोक ४४जपं च मथनं चैव कृत्वा शीघ्रं फलं लभेत् ।स्वर्णजां रौप्यजां वापि लोहजां वा शलाकिकाम् ॥ ४४॥अर्थ:जप और मन्थन दोनों के द्वारा फल शीघ्र प्राप्त होने की बात कही गई है। यहाँ विभिन्न धातुओं की शलाका का उल्लेख है।श्लोक ४५नियोज्य नासिकारन्ध्रं दुग्धसिक्तेन तन्तुना ।प्राणान्निरुध्य हृदये सुखमासनमात्मनः ॥ ४५॥अर्थ:प्राचीन पाठ में नासिका से संबंधित एक विशेष प्रक्रिया और प्राण को रोककर हृदय में स्थिर होकर सुखपूर्वक आसन लगाने का वर्णन है।श्लोक ४६शनैः सुमथनं कुर्याद्भ्रूमध्ये न्यस्य चक्षुषी ।षण्मासं मथनावस्था भावेनैव प्रजायते ॥ ४६॥अर्थ:आँखों को भ्रूमध्य में स्थिर करके धीरे-धीरे मन्थन का अभ्यास करने का वर्णन है। छह महीने के अभ्यास से मन्थन की अवस्था उत्पन्न होने की बात कही गई है।श्लोक ४७यथा सुषुप्तिर्बालानां यथा भावस्तथा भवेत् ।न सदा मथनं शस्तं मासे मासे समाचरेत् ॥ ४७॥अर्थ:यह अवस्था बालक की गहरी नींद जैसी शान्त और सहज कही गई है। मन्थन का अभ्यास निरन्तर नहीं करना चाहिए; ग्रन्थ में उसे समय-समय पर करने की बात कही गई है।श्लोक ४८सदा रसनया योगी मार्गं न परिसंक्रमेत् ।एवं द्वादशवर्षान्ते संसिद्धिर्भवति ध्रुवा ॥ ४८॥अर्थ:योगी को जीभ की साधना में निरन्तर सावधानी रखनी चाहिए और निर्धारित मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। इस प्रकार बारह वर्ष के अभ्यास के अन्त में पूर्ण सिद्धि होने की बात कही गई है।श्लोक ४९शरीरे सकलं विश्वं पश्यत्यात्माविभेदतः ।ब्रह्माण्डोऽयं महामार्गो राजदन्तोर्ध्वकुण्डली ॥ ४९॥हिन्दी अर्थ:सिद्ध योगी अपने शरीर में सम्पूर्ण विश्व को देखता है और आत्मा से उसका कोई भेद नहीं देखता। यह शरीर ही ब्रह्माण्ड का महान् मार्ग है और उसके भीतर कुण्डलिनी की ऊर्ध्वगति का वर्णन किया गया है। इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ — इस प्रकार योगकुण्डलिनी उपनिषद् का द्वितीय अध्याय समाप्त होता है। इस अध्याय का सारद्वितीय अध्याय का मुख्य विषय खेचरी विद्या है। इसका दार्शनिक निष्कर्ष श्लोक ४९ में विशेष रूप से आता है—“शरीरे सकलं विश्वम्”, अर्थात् योग-दृष्टि में शरीर और ब्रह्माण्ड के बीच एक गहरा संबंध माना गया है। इसके बाद तृतीय अध्याय आरम्भ होता है, जिसमें मेलन-मन्त्र, कुण्डलिनी और अन्ततः आत्मतत्त्व का विवेचन आता है। तृतीय अध्याय-- योगकुण्डलिनी उपनिषद् का तृतीय अध्याय कुल 35 मन्त्रों का है। प्रमाणित संस्कृत पाठ में द्वितीय अध्याय के बाद तृतीय अध्याय “मेलनमनुः” से आरम्भ होता है और 35वें मन्त्र पर उपनिषद् समाप्त होती है। मेलनमन्त्रःह्रीं भं सं पं फं सं क्षम्।मन्त्र १अमावास्या च प्रतिपत्पौर्णमासी च शङ्कर ।अस्याः का वर्ण्यते संज्ञा एतदाख्याहि तत्त्वतः ॥ १॥अर्थ:हे शंकर! अमावस्या, प्रतिपदा और पूर्णिमा—इनका यहाँ क्या संकेत अथवा संज्ञा है? कृपया इसका वास्तविक तत्त्व बताइए।मन्त्र २प्रतिपद्दिनतोऽकाले अमावास्या तथैव च ।पौर्णमास्यां स्थिरीकुर्यात्स च पन्था हि नान्यथा ॥ २॥अर्थ:प्रतिपदा के समय, अमावस्या के समय और पूर्णिमा में साधना को स्थिर करना चाहिए। यही मार्ग है, दूसरा कोई मार्ग नहीं—ऐसा उपनिषद् कहता है।मन्त्र ३कामेन विषयाकाङ्क्षी विषयात्काममोहितः ।द्वावेव सन्त्यजेन्नित्यं निरञ्जनमुपाश्रयेत् ॥ ३॥अर्थ:मनुष्य विषयों की इच्छा और विषयों से उत्पन्न कामना-मोह—इन दोनों का निरन्तर त्याग करे और निष्कलंक परम तत्त्व का आश्रय ले।मन्त्र ४अपरं सन्त्यजेत्सर्वं यदिच्छेदात्मनो हितम् ।शक्तिमध्ये मनः कृत्वा मनः शक्तेश्च मध्यगम् ॥ ४॥अर्थ:जो आत्मकल्याण चाहता है, वह अन्य सभी आसक्तियों का त्याग करे। मन को शक्ति के मध्य में और शक्ति को मन के मध्य में स्थित करे।मन्त्र ५मनसा मन आलोक्य तत्त्यजेत्परमं पदम् ।मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थितिकारणम् ॥ ५॥अर्थ:मन के द्वारा मन को ही देख कर उससे भी आगे परम पद को प्राप्त करे। मन ही बिन्दु है और वही उत्पत्ति तथा स्थिति का कारण माना गया है।मन्त्र ६मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् ।न च बन्धनमध्यस्थं तद्वै कारणमानसम् ॥ ६॥अर्थ:मन से बिन्दु उत्पन्न होता है, जैसे दूध में घृत का तत्त्व निहित रहता है। मन ही बन्धन का कारण बनता है।मन्त्र ७चन्द्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम् ।ज्ञात्वा सुषुम्नां तद्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ॥ ७॥अर्थ:जहाँ चन्द्र और सूर्य के मध्य स्थित शक्ति है, वहीं बन्धन है। सुषुम्ना को जानकर और उसके मार्ग को भेदकर प्राणवायु को उसके मध्य में ले जाना चाहिए।मन्त्र ८स्थित्वासौ बैन्दवस्थाने घ्राणरन्ध्रे निरोधयेत् ।वायुं बिन्दुं समाख्यातं सत्त्वं प्रकृतिमेव च ॥ ८॥अर्थ:बिन्दु-स्थान में स्थित होकर वायु को नासिका के मार्ग में नियंत्रित करे। यहाँ वायु, बिन्दु और प्रकृति के सत्त्व का सम्बन्ध साधना में बताया गया है।मन्त्र ९षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डलम् ।मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं तृतीयकम् ॥ ९॥अर्थ:छः चक्रों को भली प्रकार जानकर साधक आनन्द के क्षेत्र में प्रवेश करे। वे हैं—मूलाधार, स्वाधिष्ठान और तीसरा मणिपूर चक्र।मन्त्र १०अनाहतं विशुद्धं च आज्ञाचक्रं च षष्ठकम् ।आधारं गुदमित्युक्तं स्वाधिष्ठानं तु लैङ्गिकम् ॥ १०॥अर्थ:चौथा अनाहत, पाँचवाँ विशुद्ध और छठा आज्ञाचक्र है। मूलाधार का स्थान गुदप्रदेश तथा स्वाधिष्ठान का स्थान लिङ्गप्रदेश कहा गया है।मन्त्र ११मणिपूरं नाभिदेशं हृदयस्थमनाहतम् ।विशुद्धिः कण्ठमूले च आज्ञाचक्रं च मस्तकम् ॥ ११॥अर्थ:मणिपूर नाभि में, अनाहत हृदय में, विशुद्धि कण्ठ के मूल में और आज्ञाचक्र मस्तक में स्थित बताया गया है। मन्त्र १२षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डले ।प्रविशेद्वायुमाकृष्य तयैवोर्ध्वं नियोजयेत् ॥ १२॥अर्थ:छः चक्रों को जानकर साधक आनन्दमण्डल में प्रवेश करे। प्राणवायु को आकर्षित करके उसी मार्ग से उसे ऊपर की ओर ले जाए।मन्त्र १३एवं समभ्यसेद्वायुं स ब्रह्माण्डमयो भवेत् ।वायुं बिन्दुं तथा चक्रं चित्तं चैव समभ्यसेत् ॥ १३॥अर्थ:इस प्रकार वायु का अभ्यास करने वाला साधक ब्रह्माण्डमय भाव को प्राप्त होता है। उसे वायु, बिन्दु, चक्र और चित्त—इन सभी का अभ्यास करना चाहिए।मन्त्र १४समाधिमेकेन समममृतं यान्ति योगिनः ।यथाग्निर्दारुमध्यस्थो नोत्तिष्ठेन्मथनं विना ॥ १४॥अर्थ:योगी समाधि के द्वारा अमृतस्वरूप अवस्था को प्राप्त होते हैं। जैसे लकड़ी में छिपी अग्नि मन्थन के बिना प्रकट नहीं होती, वैसे ही साधना के बिना अन्तःस्थित ज्ञान प्रकट नहीं होता।मन्त्र १५विना चाभ्यासयोगेन ज्ञानदीपस्तथा न हि ।घटमध्यगतो दीपो बाह्ये नैव प्रकाशते ॥ १५॥अर्थ:अभ्यासयोग के बिना ज्ञान का दीपक प्रकाशित नहीं होता। जैसे घड़े के भीतर रखा दीपक बाहर प्रकाश नहीं कर पाता।मन्त्र १६भिन्ने तस्मिन्घटे चैव दीपज्वाला च भासते ।स्वकायं घटमित्युक्तं यथा दीपो हि तत्पदम् ॥ १६॥अर्थ:जब वह घड़ा टूट जाता है तब दीपक की ज्योति प्रकाशित होती है। यहाँ शरीर को घड़े के समान और उसके भीतर के आत्मप्रकाश को दीपक के समान समझाया गया है।मन्त्र १७गुरुवाक्यसमाभिन्ने ब्रह्मज्ञानं स्फुटीभवेत् ।कर्णधारं गुरुं प्राप्य कृत्वा सूक्ष्मं तरन्ति च ॥ १७॥अर्थ:गुरु के वचन से जब अज्ञान का आवरण टूटता है, तब ब्रह्मज्ञान स्पष्ट होता है। गुरु को नाविक के समान प्राप्त करके साधक संसार-सागर को पार करता है।मन्त्र १८अभ्यासवासनाशक्त्या तरन्ति भवसागरम् ।परायामङ्कुरीभूय पश्यन्तां द्विदलीकृता ॥ १८॥अर्थ:अभ्यास और संस्कार-शक्ति के द्वारा साधक संसार-सागर को पार करता है। वाणी की परा अवस्था में वह अंकुर के समान रहती है और आगे द्विदल रूप में अनुभव की जाती है।मन्त्र १९मध्यमायां मुकुलिता वैखर्यां विकसीकृता ।पूर्वं यथोदिता या वाग्विलोमेनास्तगा भवेत् ॥ १९॥अर्थ:वाणी मध्यमा अवस्था में कली के समान और वैखरी अवस्था में विकसित होती है। जो वाणी बाहर प्रकट होती है, साधना में उसे विपरीत क्रम से उसके मूल की ओर ले जाना है।मन्त्र २०तस्या वाचः परो देवः कूटस्थो वाक्प्रबोधकः ।सोऽहमस्मीति निश्चित्य यः सदा वर्तते पुमान् ॥ २०॥अर्थ:उस वाणी से परे कूटस्थ परम देव है, जो वाणी को चेतना प्रदान करता है। जो पुरुष दृढ़तापूर्वक जानता है—“सोऽहम्, वह परम तत्त्व ही मैं हूँ”—वह उसी ज्ञान में स्थित रहता है। मन्त्र २१शब्दैरुच्चावचैर्नीचैर्भाषितोऽपि न लिप्यते ।विश्वश्च तैजसश्चैव प्राज्ञश्चेति च ते त्रयः ॥ २१॥अर्थ:वह ज्ञानी ऊँचे-नीचे अथवा विभिन्न शब्दों से बोलता हुआ भी उनसे बँधता नहीं। जाग्रत् में विश्व, स्वप्न में तैजस और सुषुप्ति में प्राज्ञ—ये तीन अवस्थागत रूप बताए गए हैं।मन्त्र २२विराड्ढिरण्यगर्भश्च ईश्वरश्चेति ते त्रयः ।ब्रह्माण्डं चैव पिण्डाण्डं लोका भूरादयः क्रमात् ॥ २२॥अर्थ:विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—ये तीन व्यापक तत्त्व बताए गए हैं। ब्रह्माण्ड और पिण्डाण्ड तथा भू आदि लोकों का भी इसी क्रम में विचार किया जाता है।मन्त्र २३स्वस्वोपाधिलयादेव लीयन्ते प्रत्यगात्मनि ।अण्डं ज्ञानाग्निना तप्तं लीयते कारणैः सह ॥ २३॥अर्थ:अपनी-अपनी उपाधियों के लय होने पर ये सब अन्तःस्थित आत्मा में लीन हो जाते हैं। ज्ञानाग्नि से तप्त ब्रह्माण्ड भी अपने कारणों सहित लीन हो जाता है।मन्त्र २४परमात्मनि लीनं तत्परं ब्रह्मैव जायते ।ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ॥ २४॥अर्थ:जब सब परमात्मा में लीन हो जाता है, तब केवल परब्रह्म ही शेष रहता है। वह अत्यन्त शांत और गंभीर है—न वहाँ सामान्य प्रकाश है, न अन्धकार।मन्त्र २५अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किञ्चिदवशिष्यते ।ध्यात्वा मध्यस्थमात्मानं कलशान्तरदीपवत् ॥ २५॥अर्थ:वहाँ ऐसा सत्य-तत्त्व शेष रहता है जिसका सामान्य शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। साधक को अपने मध्य स्थित आत्मा का ध्यान कलश के भीतर स्थित दीपक के समान करना चाहिए।मन्त्र २६अङ्गुष्ठमात्रमात्मानमधूमज्योतिरूपकम् ।प्रकाशयन्तमन्तस्थं ध्यायेत्कूटस्थमव्ययम् ॥ २६॥अर्थ:अंगुष्ठमात्र, धूमरहित ज्योति के समान प्रकाशित होने वाले, भीतर स्थित, कूटस्थ और अविनाशी आत्मा का ध्यान करना चाहिए।मन्त्र २७विज्ञानात्मा तथा देहे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितः ।मायया मोहितः पश्चाद्बहुजन्मान्तरे पुनः ॥ २७॥अर्थ:विज्ञानस्वरूप आत्मा देह में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं से सम्बद्ध दिखाई देता है। माया से मोहित जीव अनेक जन्मों तक इस चक्र में रहता है।मन्त्र २८सत्कर्मपरिपाकात्तु स्वविकारं चिकीर्षति ।कोऽहं कथमयं दोषः संसाराख्य उपागतः ॥ २८॥अर्थ:सत्कर्मों के परिपक्व होने पर साधक आत्म-विचार करने लगता है—“मैं कौन हूँ? संसार नामक यह दोष अथवा बन्धन मुझ पर कैसे आया?”मन्त्र २९जाग्रत्स्वप्ने व्यवहरन्त्सुषुप्तौ क्व गतिर्मम ।इति चिन्तापरो भूत्वा स्वभासा च विशेषतः ॥ २९॥अर्थ:वह विचार करता है—जाग्रत् और स्वप्न में मैं व्यवहार करता हूँ, लेकिन सुषुप्ति में मेरी गति क्या होती है? इस प्रकार वह अपने ही आत्मप्रकाश में गहन चिन्तन करता है।मन्त्र ३०अज्ञानात्तु चिदाभासो बहिस्तापेन तापितः ।दग्धं भवत्येव तदा तूलपिण्डमिवाग्निना ॥ ३०॥अर्थ:अज्ञान के कारण चैतन्य का प्रतिबिम्ब बाहरी संसार के ताप से संतप्त होता है। ज्ञानाग्नि के प्रकट होने पर वह अज्ञान वैसे ही जल जाता है जैसे अग्नि में रूई का पुंज।मन्त्र ३१दहरस्थः प्रत्यगात्मा नष्टे ज्ञाने ततः परम् ।विततो व्याप्य विज्ञानं दहत्येव क्षणेन तु ॥ ३१॥अर्थ:हृदयस्थ प्रत्यगात्मा का ज्ञान प्रकाशित होने पर वह सम्पूर्ण अज्ञान को क्षणभर में वैसे ही जला देता है जैसे प्रकाश अन्धकार को नष्ट कर देता है।मन्त्र ३२मनोमयज्ञानमयान्सम्यग्दग्ध्वा क्रमेण तु ।घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ॥ ३२॥अर्थ:मन और ज्ञान से बने अज्ञान के आवरण क्रमशः नष्ट होने पर आत्मा भीतर निरन्तर प्रकाशित होती है, जैसे घड़े के भीतर दीपक जलता है।मन्त्र ३३ध्यायन्नास्ते मुनिश्चैवमासुप्तेरामृतेस्तु यः ।जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः स धन्यः कृतकृत्यवान् ॥ ३३॥अर्थ:जो मुनि निद्रा से लेकर मृत्यु तक इस प्रकार आत्मा का ध्यान करता रहता है, उसे जीवन्मुक्त जानना चाहिए। वह धन्य है और उसका जीवन कृतकृत्य हो गया है।मन्त्र ३४जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥ ३४॥अर्थ:जब जीवन्मुक्त पुरुष का शरीर काल के अधीन होकर समाप्त हो जाता है, तब वह देहमुक्त अवस्था में प्रवेश करता है—जैसे वायु अपनी गति के शांत हो जाने पर निश्चल हो जाए।मन्त्र ३५अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययंतथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवंतदेव शिष्यत्यमलं निरामयम् ॥ ३५॥ इत्युपनिषत् ॥अर्थ:जो शब्द से परे, स्पर्श से परे, रूपरहित, अविनाशी, रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त और महत्तत्त्व से भी परे तथा अचल है—वही अन्त में शुद्ध और रोगरहित परम तत्त्व के रूप में शेष रहता है। शान्तिपाठॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥हरिः ॐ तत्सत् ॥अर्थ:परमात्मा हम दोनों—गुरु और शिष्य—की रक्षा करे। हमारा पालन करे। हम दोनों साथ मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति हो, शान्ति हो, शान्ति हो।इति योगकुण्डलिन्युपनिषत् समाप्ता। विशेष ध्यान दें: इस तृतीय अध्याय में मुख्य विषय कुण्डलिनी-साधना से आगे आत्मज्ञान, चक्र, प्राण, वाणी की अवस्थाएँ, ब्रह्मज्ञान, जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति हैं। प्रमाणित संस्कृत पाठ के अनुसार तीसरे अध्याय में 35 मन्त्र हैं।-----××----/--××-+--+--+-×----