उपनिषद in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | रुद्रहृदयो उपनिषद

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रुद्रहृदयो उपनिषद

रुद्रहृदयोपनिषद--रुद्रहृदयोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध शैव उपनिषद् है और उपलब्ध पाठ में 52 मन्त्र/श्लोक हैं।॥ रुद्रहृदयोपनिषत् ॥मंगलाचरणयद्ब्रह्म रुद्रहृदयमहाविद्याप्रकाशितम् ।तद्ब्रह्ममात्रावस्थानपदवीमधुना भजे ॥अर्थ:रुद्रहृदय की महान विद्या द्वारा जिस ब्रह्म का प्रकाश होता है, उस ब्रह्मस्वरूप में स्थित होने की अवस्था का मैं अब आश्रय लेता हूँ।ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति, शान्ति, शान्ति।१. रुद्रहृदय का स्वरूपहृदयं कुण्डली भस्मरुद्राक्षगणदर्शनम् ।तारसारं महावाक्यं पञ्चब्रह्माग्निहोत्रकम् ॥ १॥अर्थ:रुद्रहृदय का तत्त्व कुण्डलिनी, भस्म, रुद्राक्ष के दर्शन, तार-मन्त्र के सार, महावाक्य तथा पंचब्रह्मस्वरूप अग्निहोत्र आदि में प्रकाशित होता है।२. शुकदेव का प्रश्नप्रणम्य शिरसा पादौ शुको व्यासमुवाच ह ।को देवः सर्वदेवेषु कस्मिन्देवाश्च सर्वशः ॥ २॥अर्थ:शुकदेव ने सिर झुकाकर अपने पिता व्यास के चरणों में प्रणाम किया और पूछा—हे पिताजी! सभी देवताओं में सर्वोच्च देव कौन हैं? सभी देवता वास्तव में किसमें स्थित हैं?३. शुकदेव का दूसरा प्रश्नकस्य शुश्रूषणान्नित्यं प्रीता देवा भवन्ति मे ।तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच पिता शुकम् ॥ ३॥अर्थ:मैं किसकी निरन्तर सेवा और उपासना करूँ जिससे सभी देवता मुझसे प्रसन्न हों? शुकदेव की यह बात सुनकर पिता व्यास ने उत्तर दिया।४. रुद्र ही सर्वदेवात्मक हैंसर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वे देवाः शिवात्मकाः ।रुद्रस्य दक्षिणे पार्श्वे रविर्ब्रह्मा त्रयोऽग्नयः ॥ ४॥अर्थ:रुद्र ही समस्त देवताओं के आत्मस्वरूप हैं और सभी देवता शिवस्वरूप हैं। रुद्र के दक्षिण भाग में सूर्य, ब्रह्मा और तीन अग्नियाँ स्थित हैं।५. उमा, विष्णु और सोमवामपार्श्वे उमा देवी विष्णुः सोमोऽपि ते त्रयः ।या उमा सा स्वयं विष्णुर्यो विष्णुः स हि चन्द्रमाः ॥ ५॥अर्थ:रुद्र के वाम भाग में उमा देवी, विष्णु और सोम—ये तीन स्थित हैं। जो उमा हैं, वही विष्णु हैं और जो विष्णु हैं, वही चन्द्रमा हैं।६. हरि और हर की एकताये नमस्यन्ति गोविन्दं ते नमस्यन्ति शङ्करम् ।येऽर्चयन्ति हरिं भक्त्या तेऽर्चयन्ति वृषध्वजम् ॥ ६॥अर्थ:जो गोविन्द को प्रणाम करते हैं, वे वास्तव में शंकर को भी प्रणाम करते हैं। जो भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करते हैं, वे वृषध्वज शिव की भी पूजा करते हैं।७. शिव-विष्णु में भेद न करनाये द्विषन्ति विरूपाक्षं ते द्विषन्ति जनार्दनम् ।ये रुद्रं नाभिजानन्ति ते न जानन्ति केशवम् ॥ ७॥अर्थ:जो विरूपाक्ष शिव से द्वेष करते हैं, वे जनार्दन विष्णु से भी द्वेष करते हैं। जो रुद्र के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते, वे केशव के स्वरूप को भी नहीं जानते।८. रुद्र से ब्रह्मा तकरुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः ।यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः ॥ ८॥अर्थ:रुद्र से सृष्टि का बीज प्रवर्तित होता है और जनार्दन विष्णु उस बीज की योनि हैं। जो रुद्र हैं, वही स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वही अग्नि अर्थात् हुताशन हैं।९. रुद्र-विष्णु-ब्रह्मा की एकताब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत् ।पुंलिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं भगवत्युमा ॥ ९॥अर्थ:रुद्र ब्रह्मा और विष्णु से अभिन्न स्वरूप हैं। यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोमात्मक है। समस्त पुरुषरूप ईशान हैं और समस्त स्त्रीरूप भगवती उमा हैं।१०. समस्त प्राणी उमा-रुद्रात्मकउमारुद्रात्मिकाः सर्वाः प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ।व्यक्तं सर्वमुमारूपमव्यक्तं तु महेश्वरम् ॥ १०॥अर्थ:सभी स्थावर-जंगम प्राणी उमा और रुद्र के स्वरूप हैं। जो कुछ व्यक्त दिखाई देता है वह उमा का रूप है और जो अव्यक्त है वह महेश्वर का स्वरूप है।११. उमा-शंकर योगउमा शङ्करयोगो यः स योगो विष्णुरुच्यते ।यस्तु तस्मै नमस्कारं कुर्याद्भक्तिसमन्वितः ॥ ११॥अर्थ:उमा और शंकर का जो अभिन्न योग है, उसी को विष्णु कहा गया है। जो भक्तिपूर्वक उस एकत्वस्वरूप को नमस्कार करता है, वह परम तत्त्व को नमस्कार करता है।१२. तीन प्रकार का आत्मा-विचारआत्मानं परमात्मानमन्तरात्मानमेव च ।ज्ञात्वा त्रिविधमात्मानं परमात्मानमाश्रयेत् ॥ १२॥अर्थ:आत्मा, परमात्मा और अन्तरात्मा—इन तीन प्रकार के आत्मतत्त्व को जानकर साधक को परमात्मा का आश्रय लेना चाहिए।१३. ब्रह्मा, महेश्वर और विष्णुअन्तरात्मा भवेद्ब्रह्मा परमात्मा महेश्वरः ।सर्वेषामेव भूतानां विष्णुरात्मा सनातनः ॥ १३॥अर्थ:अन्तरात्मा ब्रह्मा है, परमात्मा महेश्वर है और सभी प्राणियों के सनातन आत्मस्वरूप विष्णु हैं।१४. त्रैलोक्य-वृक्षअस्य त्रैलोक्यवृक्षस्य भूमौ विटपशाखिनः ।अग्रं मध्यं तथा मूलं विष्णुब्रह्ममहेश्वराः ॥ १४॥अर्थ:इस त्रिलोकीरूपी वृक्ष का अग्रभाग, मध्यभाग और मूल क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा और महेश्वर हैं।१५. एक ही रुद्र के तीन रूपकार्यं विष्णुः क्रिया ब्रह्मा कारणं तु महेश्वरः ।प्रयोजनार्थं रुद्रेण मूर्तिरेका त्रिधा कृता ॥ १५॥अर्थ:कार्यरूप विष्णु हैं, क्रियारूप ब्रह्मा हैं और कारणरूप महेश्वर हैं। प्रयोजन की सिद्धि के लिए रुद्र ने अपनी एक ही मूर्ति को तीन रूपों में प्रकट किया है।१६. रुद्र का कीर्तनधर्मो रुद्रो जगद्विष्णुः सर्वज्ञानं पितामहः ।श्रीरुद्र रुद्र रुद्रेति यस्तं ब्रूयाद्विचक्षणः ॥ १६॥अर्थ:रुद्र धर्मस्वरूप हैं, विष्णु जगत्स्वरूप हैं और पितामह ब्रह्मा सर्वज्ञानस्वरूप हैं। जो विवेकी पुरुष “श्री रुद्र, रुद्र, रुद्र” का स्मरण करता है—१७. रुद्र-उमा की अभिन्नताकीर्तनात्सर्वदेवस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ।रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ १७॥अर्थ:समस्त देवस्वरूप परमात्मा के कीर्तन से मनुष्य पापों से मुक्त होता है। रुद्र पुरुष हैं और उमा नारी हैं—उन दोनों को बार-बार नमस्कार है।१८. ब्रह्मा-वाणी और विष्णु-लक्ष्मीरुद्रो ब्रह्मा उमा वाणी तस्मै तस्यै नमो नमः ।रुद्रो विष्णुरुमा लक्ष्मीस्तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ १८॥अर्थ:रुद्र ब्रह्मा हैं और उमा वाणी हैं—उन दोनों को नमस्कार। रुद्र विष्णु हैं और उमा लक्ष्मी हैं—उन दोनों को नमस्कार।१९. सूर्य-छाया और सोम-तारारुद्रः सूर्य उमा छाया तस्मै तस्यै नमो नमः ।रुद्रः सोम उमा तारा तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ १९॥अर्थ:रुद्र सूर्य हैं और उमा उनकी छाया हैं। रुद्र सोम हैं और उमा तारा हैं। उन दोनों को बार-बार नमस्कार।२०. दिन-रात और यज्ञ-वेदीरुद्रो दिवा उमा रात्रिस्तस्मै तस्यै नमो नमः ।रुद्रो यज्ञ उमा वेदिस्तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ २०॥अर्थ:रुद्र दिन हैं और उमा रात्रि हैं। रुद्र यज्ञ हैं और उमा यज्ञ की वेदी हैं। उन दोनों को नमस्कार।२१. अग्नि-स्वाहा और वेद-शास्त्ररुद्रो वह्निरुमा स्वाहा तस्मै तस्यै नमो नमः ।रुद्रो वेद उमा शास्तं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ २१॥अर्थ:रुद्र अग्नि हैं और उमा स्वाहा हैं। रुद्र वेद हैं और उमा शास्त्र हैं। उन दोनों को बार-बार नमस्कार।२२. वृक्ष-वल्ली और गन्ध-पुष्परुद्रो वृक्ष उमा वल्ली तस्मै तस्यै नमो नमः ।रुद्रो गन्ध उमा पुष्पं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ २२॥अर्थ:रुद्र वृक्ष हैं और उमा लता हैं। रुद्र सुगन्ध हैं और उमा पुष्प हैं। उन दोनों को नमस्कार।२३. अर्थ-अक्षर और लिङ्ग-पीठरुद्रोऽर्थ अक्षरः सोमा तस्मै तस्यै नमो नमः ।रुद्रो लिङ्गमुमा पीठं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥ २३॥अर्थ:रुद्र अर्थ हैं और उमा अक्षर/शब्द हैं। रुद्र लिङ्ग हैं और उमा उसका पीठस्थान हैं। उन दोनों को बार-बार नमस्कार।२४. सर्वदेवात्मक रुद्र को नमस्कारसर्वदेवात्मकं रुद्रं नमस्कुर्यात्पृथक्पृथक् ।एभिर्मन्त्रपदैरेव नमस्यामीशपार्वती ॥ २४॥अर्थ:सर्वदेवात्मक रुद्र को इन विभिन्न रूपों में अलग-अलग प्रणाम करना चाहिए। इन मन्त्र-पदों द्वारा मैं ईश्वर और पार्वती को नमस्कार करता हूँ।२५. मन्त्र के प्रभाव का वर्णनयत्र यत्र भवेत्सार्धमिमं मन्त्रमुदीरयेत् ।ब्रह्महा जलमध्ये तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २५॥अर्थ:जहाँ-जहाँ इस मन्त्र का श्रद्धापूर्वक उच्चारण किया जाए, वहाँ इसका प्रभाव माना गया है। उपनिषद् अत्यन्त बलपूर्वक कहता है कि ऐसा स्मरण मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से भी मुक्त करने वाला है।२६. परम ब्रह्म का स्वरूपसर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम् ।सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम् ॥ २६॥अर्थ:वह परम ब्रह्म सबका आधार, द्वन्द्वरहित और सनातन है। उसका स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है और वह वाणी तथा मन की पहुँच से परे है।२७. ब्रह्म को जानने परतस्मिन्सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यादिदं शुक ।तदात्मकत्वात्सर्वस्य तस्माद्भिन्नं नहि क्वचित् ॥ २७॥अर्थ:हे शुक! उस परम तत्त्व को भली प्रकार जान लेने पर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् उसी का स्वरूप है। उससे पृथक् वास्तव में कुछ भी नहीं है।२८. परा और अपरा विद्याद्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा च ते ।तत्रापरा तु विद्यैषा ऋग्वेदो यजुरेव च ॥ २८॥अर्थ:जानने योग्य दो प्रकार की विद्याएँ हैं—परा और अपरा। उनमें अपरा विद्या के अन्तर्गत ऋग्वेद और यजुर्वेद आते हैं।२९. अपरा विद्यासामवेदस्तथाथर्ववेदः शिक्षा मुनीश्वर ।कल्पो व्याकरणं चैव निरुक्तं छन्द एव च ॥ २९॥अर्थ:हे मुनिश्वर! सामवेद और अथर्ववेद भी अपरा विद्या में हैं। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त और छन्द भी उसी के अन्तर्गत हैं।३०. परा विद्याज्योतिषं च यथा नात्मविषया अपि बुद्धयः ।अथैषा परमा विद्या ययात्मा परमाक्षरम् ॥ ३०॥अर्थ:ज्योतिष आदि शास्त्र भी अपरा विद्या के क्षेत्र में आते हैं। वह परम विद्या है जिसके द्वारा उस आत्मा को जाना जाता है जो परम अक्षर ब्रह्म है।३१. अक्षर ब्रह्मयत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् ।अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा ॥ ३१॥अर्थ:वह ब्रह्म दिखाई नहीं देता, पकड़ा नहीं जा सकता, उसका कोई गोत्र या भौतिक रूप नहीं है। उसके भौतिक नेत्र-कान नहीं हैं और उसके हाथ-पाँव भी भौतिक अर्थ में नहीं हैं।३२. ब्रह्म सर्वव्यापक हैनित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ।तद्भूतयोनिं पश्यन्ति धीरा आत्मानमात्मनि ॥ ३२॥अर्थ:वह नित्य, व्यापक, सर्वत्र विद्यमान, अत्यन्त सूक्ष्म और अविनाशी है। धीर पुरुष उस समस्त भूतों के कारणरूप तत्त्व को अपने आत्मा में अनुभव करते हैं।३३. सृष्टि का मूलयः सर्वज्ञः सर्वविद्यो यस्य ज्ञानमयं तपः ।तस्मादत्रान्नरूपेण जायते जगदावलिः ॥ ३३॥अर्थ:जो सर्वज्ञ और सबको जानने वाला है, जिसका तप ज्ञानस्वरूप है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत् अन्नरूप अर्थात् स्थूल जगत् के रूप में प्रकट होता है।३४. रज्जु-सर्प का दृष्टान्तसत्यवद्भाति तत्सर्वं रज्जुसर्पवदास्थितम् ।तदेतदक्षरं सत्यं तद्विज्ञाय विमुच्यते ॥ ३४॥अर्थ:यह सम्पूर्ण जगत् सत्य के समान दिखाई देता है, जैसे रस्सी में अज्ञानवश सर्प दिखाई देता है। उस अक्षर सत्य को जान लेने पर मनुष्य बन्धन से मुक्त हो जाता है।३५. ज्ञान से मुक्तिज्ञानेनैव हि संसारविनाशो नैव कर्मणा ।श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं स्वगुरुं गच्छेद्यथाविधि ॥ ३५॥अर्थ:संसार-बन्धन का नाश ज्ञान से ही होता है, केवल कर्म से नहीं। इसलिए साधक को विधिपूर्वक ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए जो शास्त्रज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ हो।३६. गुरु से ब्रह्मविद्यागुरुस्तस्मै परां विद्यां दद्याद्ब्रह्मात्मबोधिनीम् ।गुहायां निहितं साक्षादक्षरं वेद चेन्नरः ॥ ३६॥अर्थ:गुरु उस साधक को ऐसी परा विद्या प्रदान करे जो ब्रह्म और आत्मा का बोध कराने वाली हो। जो मनुष्य हृदय की गुहा में स्थित उस अक्षर ब्रह्म को प्रत्यक्ष जान लेता है—३७. अविद्या का नाशछित्वाऽविद्यामहाग्रन्थिं शिवं गच्छेत्सनातनम् ।तदेतदमृतं सत्यं तद्बोद्धव्यं मुमुक्षिभिः ॥ ३७॥अर्थ:वह अविद्या की महान गाँठ को काटकर सनातन शिव को प्राप्त होता है। यही अमृत और सत्य है; मुक्ति की इच्छा रखने वालों को इसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।३८. धनुष-बाण का दृष्टान्तधनुस्तारं शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ३८॥अर्थ:ॐकार धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य है। साधक को पूर्ण एकाग्रता से उस लक्ष्य को भेदना चाहिए और बाण की तरह ब्रह्म में तन्मय हो जाना चाहिए।३९. शिव ही लक्ष्यलक्ष्यं सर्वगतं चैव शरः सर्वगतो मुखः ।वेध्दा सर्वगतश्चैव शिवलक्ष्यं न संशयः ॥ ३९॥अर्थ:लक्ष्य सर्वव्यापक है, बाण भी उसी व्यापक तत्त्व की ओर अग्रसर है और साधक का चैतन्य भी उसी में स्थित होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शिव ही परम लक्ष्य हैं।४०. स्वयंप्रकाश ब्रह्मन तत्र चन्द्रार्कवपुः प्रकाशतेन वान्ति वाताः सकला देवताश्च ।स एष देवः कृतभावभूतःस्वयं विशुद्धो विरजः प्रकाशते ॥ ४०॥अर्थ:उस परम तत्त्व में सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश नहीं पहुँचता, वायु वहाँ नहीं चलती और देवताओं की शक्ति भी वहाँ स्वतंत्र प्रकाशक नहीं है। वही परम देव स्वयं शुद्ध, निर्मल और स्वयंप्रकाश रूप में प्रकाशित होता है।४१. जीव और ईश्वरद्वौ सुपर्णौ शरीरेऽस्मिञ्जीवेशाक्ष्यौ सह स्थितौ ।तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न महेश्वरः ॥ ४१॥अर्थ:इस शरीर में जीव और ईश्वर—दो साक्षीस्वरूप पक्षी साथ-साथ स्थित हैं। उनमें जीव अपने कर्मों के फल का भोग करता है, महेश्वर कर्मफल का भोक्ता नहीं है।४२. महेश्वर साक्षी हैंकेवलं साक्षिरूपेण विना भोगं महेश्वरः ।प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया तयोः ॥ ४२॥अर्थ:महेश्वर केवल साक्षी रूप में रहते हैं, वे भोग नहीं करते। जीव और ईश्वर में जो भेद दिखाई देता है, वह माया द्वारा कल्पित है।४३. घटाकाश-मठाकाश दृष्टान्तघटाकाशमठाकाशौ यथाकाशप्रभेदतः ।कल्पितौ परमौ जीवशिवरूपेण कल्पितौ ॥ ४३॥अर्थ:जिस प्रकार एक ही आकाश घट और मठ आदि के कारण अलग-अलग दिखाई देता है, उसी प्रकार एक ही परम चैतन्य जीव और शिव के रूप में भिन्न प्रतीत होता है।४४. जीव और शिव का वास्तविक स्वरूपतत्त्वतश्च शिवः साक्षाच्चिज्जीवश्च स्वतः सदा ।चिच्चिदाकारतो भिन्ना न भिन्ना चित्त्वहानितः ॥ ४४॥अर्थ:तत्त्वतः शिव साक्षात् चैतन्य हैं और जीव भी स्वभाव से सदा चैतन्य है। चैतन्य के रूपों में भिन्नता दिखाई दे सकती है, पर चैतन्यत्व की दृष्टि से वास्तविक भेद नहीं है।४५. चैतन्य की एकताचितश्चिन्न चिदाकारद्भिद्यते जडरूपतः ।भिद्यते चेज्जडो भेदश्चिदेका सर्वदा खलु ॥ ४५॥अर्थ:चैतन्य चैतन्य से अलग नहीं होता। यदि भेद माना जाए तो वह जड़ वस्तुओं में ही हो सकता है; चैतन्य तो सदैव एक ही है।४६. चैतन्य का एकत्वतर्कतश्च प्रमाणाच्च चिदेकत्वव्यवस्थितेः ।चिदेकत्वपरिज्ञाने न शोचति न मुह्यति ॥ ४६॥अर्थ:तर्क और प्रमाण दोनों से चैतन्य की एकता सिद्ध होती है। जब साधक चैतन्य के इस एकत्व को जान लेता है, तब वह न शोक करता है और न मोह में पड़ता है।४७. अद्वैत शिवअद्वैतं परमानन्दं शिवं याति तु कैवलम् ॥ ४७॥अर्थ:जो अद्वैत, परम आनन्दस्वरूप शिव है, साधक अन्ततः उसी कैवल्य—पूर्ण मुक्ति—को प्राप्त करता है।४८. “मैं वही हूँ”अधिष्ठानं समस्तस्य जगतः सत्यचिद्घनम् ।अहमस्मीति निश्चित्य वीतशोको भवेन्मुनिः ॥ ४८॥अर्थ:सम्पूर्ण जगत् का आधार सत्य और चैतन्य से परिपूर्ण ब्रह्म है। “मैं वही ब्रह्मस्वरूप हूँ”—ऐसा निश्चय करके मुनि शोक से रहित हो जाता है।४९. आत्मज्योतिस्वशरीरे स्वयं ज्योतिःस्वरूपं सर्वसाक्षिणम् ।क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययावृताः ॥ ४९॥अर्थ:अपने ही शरीर में स्थित स्वयंप्रकाश, सबका साक्षी आत्मतत्त्व शुद्ध अन्तःकरण वाले साधक देखते हैं। जिनके दोष और अज्ञान दूर नहीं हुए हैं, वे माया से आवृत होने के कारण उसे नहीं देख पाते।५०. पूर्ण आत्मस्वरूपएवं रूपपरिज्ञानं यस्यास्ति परयोगिनः ।कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य पूर्णस्वरूपिणः ॥ ५०॥अर्थ:जिस श्रेष्ठ योगी को इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया है, उस पूर्णस्वरूप आत्मज्ञानी के लिए वास्तव में कहीं जाना शेष नहीं रहता।५१. आकाश का दृष्टान्तआकाशमेकं सम्पूर्णं कुत्रचिन्नैव गच्छति ।तद्वत्स्वात्मपरिज्ञानी कुत्रचिन्नैव गच्छति ॥ ५१॥अर्थ:सम्पूर्ण आकाश एक ही है और वह कहीं आता-जाता नहीं। उसी प्रकार अपने आत्मस्वरूप को जानने वाला ज्ञानी भी वास्तविक आत्मा की दृष्टि से कहीं आता-जाता नहीं है।५२. ब्रह्मज्ञान की पूर्णतास यो ह वै तत्परमं ब्रह्म यो वेद वै मुनिः ।ब्रह्मैव भवति स्वस्थः सच्चिदानन्द मातृकः ॥ ५२॥अर्थ:जो मुनि उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। वह अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होकर सत्-चित्-आनन्दमय हो जाता है।समापन शान्ति-मन्त्रॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम दोनों साथ मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें। तीनों प्रकार की शान्ति हो।इति रुद्रहृदयोपनिषत्समाप्ता।उपलब्ध मूल पाठ में यही 52वाँ मन्त्र अंतिम मन्त्र है। मुख्य संदेश: इस उपनिषद् का केंद्रीय विचार है कि रुद्र, उमा, विष्णु, ब्रह्मा तथा सम्पूर्ण देव-देवी रूप अन्ततः एक ही परम तत्त्व की अभिव्यक्तियाँ हैं; आत्मा और परमात्मा के वास्तविक एकत्व का ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है। ------×--------×-------×-------×---