Avantika - 1 in Hindi Thriller by Aarti Garval books and stories PDF | अवंतिका: छलावा और हकीकत - 1

Featured Books
Categories
Share

अवंतिका: छलावा और हकीकत - 1

रात के करीब बारह बज रहे थे। रामपुर गाँव सन्नाटे की एक गहरी चादर में लिपटा हुआ था। आसमान में काले बादलों का डेरा था, जिससे उठती ठंडी हवाएँ गाँव की पगडंडियों पर लगे पीपल के पेड़ों को किसी खौफनाक तरीके से झकझोर रही थीं। गाँव के किनारे पर स्थित वर्षों पुराना शिव मंदिर का खंडहर दिन में जितना उजाड़ दिखता था, इस अमावस की काली रात में उतना ही भयावह प्रतीत हो रहा था।

​खण्डहर के एक अंधेरे कोने में विक्रम हड़बड़ी में खड़ा था। उसकी सांसें फूली हुई थीं और चेहरा पसीने से तर-बतर था। वह बार-बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख रहा था और मोबाइल की स्क्रीन को स्वाइप कर रहा था। नेटवर्क का एक भी बार नहीं दिख रहा था।

​"कहाँ रह गया वो? इतनी देर कभी नहीं करता..." विक्रम ने अपनी बदहवासी में बड़बड़ाते हुए चारों तरफ नज़र दौड़ाई।

​विक्रम आज रात गाँव से हमेशा-हमेशा के लिए गायब होने की फिराक में था। वह बस उसी इंसान का इंतजार कर रहा था, जो उसे पैसों का बैग देकर यहाँ से सुरक्षित निकालने वाला था। उसके चेहरे की घबराहट बता रही थी कि मामला बेहद संगीन है और वह किसी गहरे दलदल में फँस चुका है।

​अचानक, खंडहर के सूखे पत्तों पर किसी के भारी कदमों की आहट हुई। खट... खट...

​विक्रम का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसने टॉर्च की पतली रोशनी उस दिशा में फेंकी। "कौन है? रमेश काका? या तुम हो?" विक्रम की आवाज में घबराहट साफ छलक रही थी।

​रोशनी में एक धुंधला सा साया दिखाई दिया। वह इंसान धीरे-धीरे विक्रम की तरफ बढ़ रहा था। उसने काले रंग की जैकेट पहनी हुई थी और उसका चेहरा हुड की छाया में छिपा हुआ था।

​"बड़ी देर कर दी तुमने," विक्रम ने राहत की साँस लेते हुए कहा। "पैसे लाए हो न? मुझे तुरंत यहाँ से निकलना होगा... पूरे गाँव में मेरी तलाश हो रही है।"

​सामने खड़ा शख्स कुछ नहीं बोला। वह बस शांत और भारी कदमों से विक्रम के करीब आता गया।

​"अरे, कुछ बोलते क्यों नहीं? पैसे कहाँ हैं?" विक्रम ने जैसे ही आगे बढ़कर उस शख्स का हाथ पकड़ना चाहा, उसने रोशनी के बीच एक तेज़ झिलमिलाहट देखी।

​एक धारदार, पुराना खंजर हवा में लहराया!
​इससे पहले कि विक्रम कुछ समझ पाता या चिल्ला पाता, वह खंजर पूरी ताकत के साथ उसकी छाती के बाईं ओर उतार दिया गया।

​"आहहह!" विक्रम के मुँह से केवल एक चीख निकल पाई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। दर्द की एक तीखी लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई। उसके हाथों से टॉर्च नीचे गिर गई, और उसकी रोशनी ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों को डरावने अंदाज़ में चमकाने लगी।

​कातिल ने बिना किसी रहम के खंजर को बाहर खींचा और एक बार फिर पूरे जुनून के साथ प्रहार किया। विक्रम घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी चीखें गले में ही घुटकर रह गईं। उसके मुँह से खून की पतली धार बहकर ज़मीन पर टपकने लगी।

​कातिल ने ज़मीन पर तड़पते हुए विक्रम को ठंडी नज़रों से देखा। उसने विक्रम की जेब से उसका फोन निकाला और फिर बड़ी चालाकी से अपने पास रखे एक कपड़े से खंजर की मुट्ठ को पोछा।

​जाने से ठीक पहले, उस नकाबपोश ने सबूत मिटाने के लिए आसपास की जगह को देखा और चुपचाप अंधेरे में गायब हो गया।

​विक्रम की आँखों के आगे धीरे-धीरे अँधेरा छाने लगा और उसकी आखिरी सांस भी रुक गई। खंडहर में एक बार फिर सन्नाटा पसर गया, लेकिन यह सन्नाटा अब रामपुर में आने वाले भयानक तूफ़ान की दस्तक था।