मंजिले

(156)
  • 162
  • 0
  • 155.3k

बात उन दिनों की है, एक मकान बना कर रहना, एक मिसाल और योग्यता थी। मकान अगर मंजिले हो, तो कया बात, बहुत अमीर समझे जाने वाला शक्श....." हाहाहा, "हसता हुँ, आपने पर.... ये दोगला पन ही था..... मकान या घर या कलोनी, बीस साल तक बैंक की कर्ज़ादार थी। ईटे, सिमट, सरिया, रेता, बजरी.... और मजबूती समान की, कया कहते हो साहब ------ नहीं कारीगर ही इस को मजबूत बना सकता है, कया झूठ बोल रहा हुँ। "लो कर लो बात।" शर्मा जी मकान बना रहे हो। "

1

मंजिले - भाग 1

(1) -----लम्बी कहानी एपिसोड टाइप ------ ----- मंजिले ----- बात उन दिनों की है, एक मकान बना कर रहना, एक मिसाल और योग्यता थी। मकान अगर मंजिले हो, तो कया बात, बहुत अमीर समझे जाने वाला शक्श....." हाहाहा, "हसता हुँ, आपने पर.... ये दोगला पन ही था..... मकान या घर या कलोनी, बीस साल तक बैंक की कर्ज़ादार थी।ईटे, सिमट, सरिया, रेता, बजरी.... और मजबूती समान की, कया कहते हो साहब ------ नहीं कारीगर ही इस को मजबूत बना ...Read More

2

मंजिले - भाग 2

( मोक्ष )" ------ आप को भगवान समझना बहुत कठिन है, आपकी लीला कोई नहीं जान सकता, आप खुद कारज करने वाले और कराने वाले है । ""आपकी लीला कौन जानता है " शर्मा जी ने उच्ची आवाज मे कहा।" आप ही है, जो चराचर जगत का ख़याल रखते है । " शर्मा जी आँखे मुद कर बैठे ही थे। --- कि तभी घंटी वजी, तंदरा टूटी।"कौन है भाई " ------" अंधा हुँ , बहुत मुश्किल से घंटी वजाई है। ये यात्रा बहुत मुश्किल से कर रहा ...Read More

3

मंजिले - भाग 3

(हलात ) छोटी कहानी मे मेरी ये की पसंद की जाने वाली कहानी हैँ.... इस मे कुछ हिंदू हैँ, कुछ मुस्लिम समुदाये हैँ। '2045" ---चल रहा हैँ। सोच रहे हैँ, कया करे। कयो की लोग तो बहुत पानी साफ के दुख और हवा शुद्ध के कारण ही मर गए हैँ। जयादा हत्या तो बड़े शहरो की हैँ.... कुछ गांव हैँ जो बचे हुए हैँ वो हरयाली के कारण.... पर वो हवा शुद्ध ले रहे ...Read More

4

मंजिले - भाग 4

मंजिले ---- ( देश की सेवा )मंजिले कहानी संगरे मे कुछ अटूट कहानिया जो इंसान के मर्म बन गयी। मार गयी,खत्म होने से अच्छा हैँ, लौकिक पन ढेर सारा हो। तबदीली किसे रोक पायी हैँ, इंसान को कोई नहीं मारता, हलात कभी कभी मार देते हैँ। हलात हम खुद ही ऐसे बना लेते हैँ, कि खुद ही मर जाते हैँ। सच मे कहता हुँ, मोहन दास मेरा ऐसा ही देश भगत हैँ, जो देश के लिए जान की बाज़ी लाने से भी पीछे नहीं हट सकता।सितारा कब चढ़ जाये और ...Read More

5

मंजिले - भाग 5

---- हार्ट सर्जरी ----एक कलाकार ज़ब लिखता हैँ तो कभी कभार इतना सच लिख जाता हैँ, उसे बेशक पछचाताप वो नहीं मानता, लिखो गा, तो सत्य।"चलो बाते हो गयी " मेरी माँ से कहा डॉ गयान प्रकाश ने, " बेटे को दिल की प्रॉब्लम हैँ, इमिज़ेटली डॉ सेठी से सम्पर्क करे। " माँ के पैरो से मिटी खिसक गयी।बात 1983 की हैँ। अगले दिन माँ को चेन कहा। नींद कहा। सब कुछ उसे संसार मे मैं उसका पुत्र जिसकी आयु 12 वर्ष थी.... कया करती। डॉ सेठी के पास ( स्थान नहीं बता सकूंगा ...Read More

6

मंजिले - भाग 6

------( फैसला होके रहेगा ) कहानी सगरे मे एक मर्मिक कहानी बेपरवाह कितने हो तुम, आज इसका ही फैसला ही होगा।कच्चेरियो के चक्र काट काट कर बहुत केस बोलते ही रह जाते हैँ, लेकिन सुनवाई कभी नहीं होती हैँ, तो तरीख पे तारीख मिल जानी सबाविक हैँ। बहुत दुख देती हैँ गरीब की पुकार कभी कभी... उलटे पैर मुड़ना उसकी दरगाह तक आवाज़ -----पुहच ही जाती हैँ। अमूली की पुकार बस उस परमात्मा ...Read More

7

मंजिले - भाग 7

मंजिले ----( ये वोहोती ) ----- आप पढ़ने वाले है, चलो ये कभी किसी मरा ही नहीं, आख़री दम तक" ये " पीछा ही नहीं छोड़ती। छोड़ ने को हम इसे राजी है ही नहीं। " तुम्हारे जगहा अगर ये वो होती " सुनने वाले का दिल उछल जाता है, "सोचता है ये वो होती, तो कया उखाड़ लेती।"सच मे यही सोच है सब की.... अगर गर्मी है, ओ नो गर्मी, " ये वो होती ( जानी ठंड ), तो कमबख्त जी दिसबर होता, जून नहीं होती.... कैसे ...Read More

8

मंजिले - भाग 8

------- (सच बोल रहे हो ) ---- आयो कुछ याद करा दू, जो ज़ख्म खाये है, वो और नहीं हमारे लोग है। कितना सच बोल सकते हो, बोलो। प्रयास करो, खुल कर बोलो,, बोल दो, बस।फिर देखो कैसे तोड़ दें गे तुम्हे लोग, कहे गे, एक और युधिष्ठिर पैदा हो गया है, कही जा कर ये कहो, " मैं चोर हुँ । " सच मे लोग हस पड़े गे, ये हम मे आकर चोर कयो कह रहा है, हैरानी जनक सत्य। " सच, मैं मैंने जब ...Read More

9

मंजिले - भाग 9

------खैर हो ---- चलती का नाम गाड़ी है। बेशर्म लोग कुछ नहीं समझ बस कही भी पैसे बचते है, छोड़ते नहीं है, भोजन फ्री का....चावल इतना खा गए, उस वक़्त, कि पूछो मत। चलना दुर्लभ हो गया। कड़ी चावल कही भी दिख जाए, जम कर खाये। शुदाई हो जाते है, कया करे। भंडारा चले तो खाना तो बने ही... हम जैसे नहीं खाये, तो फिर कौन खाये ---बस यही सोच के हम खा लेते है। भंडारा जो होये, हम लोगों के लिए विशेष होता है। कया समझें हो, हम कुलीन ब्राह्मण है.. ...Read More

10

मंजिले - भाग 10

मंजिले कहानी पुस्तक मे एक ऐसी भावक मर्मिक कहानी कहना चाहता हुँ, कि आप रोक नहीं सकते मुझे। लिखू भाई लिखने दे.... " वो फिर न आया " मागने वाले भिखारी कितना कुछ साथ ले जाते है। कभी सोचा, हमदर्दी, मार्मिक, ढेर सारा बुनायदि सम्मान और प्यार भावक्ता ले जाते है।एक ऐसा ही पात्र था जो मेरे शहर मे रेड़ी पे आता था... रोज मांगता था, साथ मे होंगी उसकी पत्नी जो रेहड़ी खींचती थीं। याद है मुझे साल 1981-82 की ताज़ा घटना थीं। ...Read More

11

मंजिले - भाग 11

" मैं कुछ कहना चाहता हुँ " एक पुस्तक मंजिले से संदेश तो दे ही सकता हुँ।मतलब जितनी देर पीछा करता रहेगा, हम कुछ भी करने मे असफल होते रहेंगे। ये सच है। पेट की भूख बहुत कुछ करा देती है, झूठ बोलो, " पर किसी को दबाओ नहीं, किसी को ललचार मत बनाओ, किसी को शार्ट कट समझाते हुए उसके साथ कुए मे मत कूद जाओ। मतलब एक ऐसा बिंदु है, जो आदमी को शून्य से जयादा कुछ भी नहीं देता। मतलब रखोगे, किसी के साथ भी, तो संसारिक बधन मे ही रहोगे। रखो मतलब पर, इतना ...Read More

12

मंजिले - भाग 12

मंज़िले ----- "कया यही पुण्य है " --- एक लिबास को उतार कर फेक देने को तुम बहुत बारीकी सोच के बताना, " इसमें पाप कहा था " कहानी आप पर छोड़ता हुँ, चलो बता तो सकते हो, चोर चोरी कर के पकड़े गए, तो नाम ईश्वर का ही ले रहे है, " पकड़े गए मंदिर मे धन चोरी करते। "छूट गए। माँ बीमार लोग देख कर आये, दूसरे का दुनिया मे कोई नहीं, उसने कहा "सगत मिली " अब दोनों को छोड़ा जा चूका था। माँ का आख़री सास ...Read More

13

मंजिले - भाग 13

-------------- एक कहानी " मंज़िले " पुस्तक की सब से श्रेष्ठ कहानी है। चलती हुई ट्रेन की टक टक थक... चल सो चल थी। कभी पटरी से ट्रेन के पहिये घिसते हुए टक टक टक करते गुज़ रहे थे.... फिर इज़न की कुक फिर जैसे स्पीड कम होती गयी.... लगे स्टेशन आ गया.... हाँ सच मे स्टेशन था। रूकती रूकती पांच से छे डिब्बे आगे निकल चुके थे.... जरनल डिब्बे... कम लोग उतरे , जयादा चढ़ गए। गाड़ी टुसी गयी.. भाव भर गयी, पूरी एक से एक बढ़ के।एक भिखारी और एक आमीर लगे था... बाकी पता नहीं... उसके ...Read More

14

मंजिले - भाग 14

---------मनहूस " मंज़िले " पुस्तक की सब से श्रेष्ठ कहानी है। चलती हुई ट्रेन की टक टक थक थक... सो चल थी। कभी पटरी से ट्रेन के पहिये घिसते हुए टक टक टक करते गुज़ रहे थे.... शायद कोई छोटा सा स्टेशन होगा, छूट गया... चादर थी काली रात की जैसे मसया हो... चाद डूब गया, आज जैसे भूल ही गया, सच मे, कोई खो गया लगा जैसे कोई चाद का, बहुत कुछ, हक़ीक़त मे, खुदा किसी से न करे ऐसा, कया था... एक टीस उठी, एक वेदना उठी, " मेरा भी बाप होता " सोचा एक छोटे युवक ...Read More

15

मंजिले - भाग 15

मंजिले कहानी सगरे मे एक मार्मिक कहानी.... गजलकार... पड़ोसी मै खुद एक सुरबाज का था, बदले मे बहुत कुछ सुनना पड़ा, शहर बड़ा था, और काम से थक कर आना... ये भी एक जलवा था। किसी का दर्द सुन लेना, सुरु मे.... 'वाह कभी मेरे मुँह से निकला ही नहीं। " कितना हस्तप्रभ होता था, कैसे सोच लेता है, एक दर्द इंसान... शायद उसने बहुत दुनिया देखी होंगी। अब अंत था बस। कोई किराये का मकान मेरे ...Read More

16

मंजिले - भाग 16

सची घटना कह लो या किसी का उम्र भर जिंदगी से हर दिन चलता मुक्का मारी...( बाबा जी की )मंजिले कहानी सगरे की अनुभवी मुस्कान और कहानी...पात्र एक विक्रम ------ उम्र 40 वर्ष। अनुभव उसके अंदर इतना कि पूछो मत... मैं जानता हू वो जानता है, और दुनिया तो बस मतलब की यार...अगर मैं आपको रुआ न दू तो कहना, कुछ स्वाद नहीं आया।उसकी जिंदगी अब भी डगमगा रही है, कया करे। किस्मत कहते है गाडू कया करे पाडु.... बस शुरवात करते है.... कही से कयो... घर से... बड़ा भाई.. तीन छोटे.. हाँ छोटी ही बहन। बहन की ...Read More

17

मंजिले - भाग 17

मंजिले पुस्तक की कुछ बेजोड़ नमूनो से मार्मिक कहानी भरी हुई मिलेगी.. नाम -------------- ( लफगा ) नीचे काफी आ रही सड़क की उत्तराई पे खड़ा था, पता कौन "रत्न लाल " उम्र कोई होंगी सनातनी भाई की बतिस के करीब.... जनाब के काम कुछ ऐसे थे, घर वालो ने जिसमे बाबू जी फौजी थे जंग मे आपने देश को हमेशा आज़ाद देखने वाले फौजी जिसको वतन की खातिर लड़ते देखा... हक़ के लिए लड़ते ...Read More

18

मंजिले - भाग 18

मंजिले कहानियो का किताबी सग्रह मे से एक मर्मिक कहानी... नाम प्रयागराज ) " मन की एक तृप्त करने वाली यक्त आज भी टीस देती थी " बिमला जैसे रोने लग जाती थी, मोहन लाल भी चुप हो जाता था। ये कारवा मौत का कैसे बना था। " कौन सा हम vip थे " बिमला बोली थी, " हम तो एक मामूली जनसधारण हैं। " ...Read More

19

मंजिले - भाग 19

मंज़िले कहानी सगरे मे से ------ एक मुलाक़ात )1987 की सत्य घटना, आधारित कहानी, पात्र कल्पनिक और स्थान कल्पनिक हैं। अगर सच लिख दू... तो पथर बाज़ी हो जाएगी। मारने वालो का पता नहीं, अपुन तो पक्का दोजख मे.... नहीं मै मरना नहीं चाहता... सच इतना भी मत बोलो, कि खुद संकट मे फ़स जाओ। बस यही सोच कर, मै चुप हू। कहानी के किरदार यूँ हैं... तुम जान सकते हो ...Read More

20

मंजिले - भाग 20

(वो छोकरी ) ---- एक पैदा करके छोड़ आये, दुसरीया उसको नाम नहीं दे रहे। बहुत न नंसाफी कर " टक टक टक थक थक" की आवाज़ ने लोरी मात्र जैसे चंदा को सोवा दिया था। गाड़ी चल रही थी। मथरा इसका जक्शन था। बर्थ पे कुछ मनचले बैठे उसको नेहारे जा रहे थे। उसके भरवे बदन का उसका थोड़ा दोष था? जवानी की दहलीज़ थी। सब बहक जाते हैं। मनचले भी देख कर बहक गए। ...Read More

21

मंजिले - भाग 21

मंजिले कहानी सगरहे की रोचक कहानी "वो छोकरी " चंदा पर आधारत थी। समाज और नानी की बेमिसाल उलझने। कर पढ़ कर खुश हो जाओगे, पर जो गम चंदा का, चंदा का ही रहेगा। चलो शुरू करे।" हा बाबू जी आपको जनक कहु जा बाबू जी। " चंदा थोड़े शर्मिंले दंग से बोली।" कुछ भी कहो, पर जरा प्यार से, श्याम के मंदिर दिखाने का जिमा हैं, चंदा तुम्हारा। " जनक थोड़ा चलते हुए खिसया कर बोला।" ये ...Read More

22

मंजिले - भाग 22

" चमक "कहानी सगरे की मार्मिक कहानी जो पेश हैं, जीवन की अचनाक बीती कुछ गतिविधि जो कभी सोचा नहीं था। मजदूर अब भीड़ से अकेला रहता हैं, पता कयो, आधुनिक जीवन ने उसका रोजगार छीन लिया हैं। बड़ा दुखदायी समय हैं, एक समय की अब रोटी भी नहीं जुड़ती। पता कयो ? समझ मे आता हैं कुछ, हम आधुनिक हो गए हैं, बहुत दूर तक पुलाड़ से जा चुके हैं। अब मजदूर का काम दस वाली एक मशीन अकेलाकर देती हैं, सोचे तो नथू अब बच्चों को भर पेट खाना चावल कैसे ...Read More

23

मंजिले - भाग 23

------------------------ दिल्ली दूर नहीं -------------------- दिल्ली नहीं... का मतलब ये हैं, कि हम ज़िन्दगी मे बहुत कुछ किसी की ख्वाइशो पे रख देते हैं, पर वो कभी पूरा करने मे अ- समर्थ होता हैं। ये असमर्थता कभी कभी इतनी भावक हो जाती है.. कि हम सोच भी नहीं सकते। सोचना बहुत दूर की बात हैं , कभी समझ सकना भी हमारे मन मे नहीं होता। बात 1984की हैं, मै सिख पंथ की बात करता हू। मेरा दोस्त निरंजन सिंह एयरपोर्ट गया ...Read More

24

मंजिले - भाग 24

----उड़ान ---- ये पिक्चर एक पतंग चढ़ने की, कब मेरे कैमरे कैद हो गयी, मै नहीं जानता। पतंग कड़याली पेड़ मे फ़स गयी। कया करती... खींचने से फाड़ गयी। फिर कया था, डोर टूट गयी। अलफ़ाज़ भी कुछ ऐसे ही थे, टूट गए। एक सुरत एक सास के। सोचने की तुम तैयारी तो रखो। शून्य कब तक रहोगे, जमाना हैं, ...Read More

25

मंजिले - भाग 25

---- एक अजनबी ---- वर्षो बाद किसी की याद आये.. "तो उसे आपना जान लेना, या मान लेना " बड़ी मूर्खता होती हैं। याद रखना," जो आपने हैं, वो अजनबी हैं। तो अजनबी तो फिर अजनबी से भी बदतर हुआ न।" शतरज के खिलाड़ी हो, साहब " कभी शे राजे को पेयादा दे जाता हैं। " गोली कभी चलती नहीं, आवाज करती हैं, साहब बाहुदर। " किसी के आगे कितना गिर सकते हो, मुंडी तो जमीन पर ही रहेगी, बारखुरदार। " जीना किसे ...Read More

26

मंजिले - भाग 26

सुंदर पक्ति से जुडी कहानी... काफाला....घंटी और आरती की आवज़ ने गली की सुनसमानता को तोड़ दिया था, सेठ मल ने पिछला दरवाज़ा खोला ही था, कि चुनी लाल ने आरती करते करते चुप रहने का सकेत दिया... और आपने पास बुलाने लगा, इशारे से ही, थोड़ी देर बाद एक परिदा नुकड़ से धीरे से उड़ा... और उसके पखो की आवाज़ कितनी देर हवा मे गुज़ती रही थी। कहने को जो मर्ज़ी हु... चुनी लाल का भी धयान बिलकुल भी श्री लख्मी प्रिये के चरणों मे नहीं, बल्कि मायाजाल के चक्र मे घुसे हुए था। ...Read More

27

मंजिले - भाग 27

समय मंजिले कहानी सगरहे की सर्वकोटी कहानी हैं।जो बताताती हैं सत्य की परिभाषा....मोहन दास के पोता हुआ, तो वो ढोलक पे नाचा। उम्र उसकी होंगी अस्सी के करीब... पर डील डोल उसका मजदूर का एक नंबर था। कभी उसने आराम भी नहीं किया था।कयो किस्मत मे नहीं था।छोटा सा घर इलाहबाद मे कराये से आपना बनाया। फिर मछली पकड़ के मंडी मे सस्ते कभी महगें वेचा.. फिर नल और गटर भी साफ किये.। काम को पूजा समझने वाला मोहन दास कभी निठला नहीं बना। साथी थे उसके जो अक्सर एक दो देहाड़ी लगा कर जुआ खेल लेते थे। ...Read More

28

मंजिले - भाग 28

मंजिले सगरे की मर्मिक कहानी --- सत्य कथा पर आधारत हैं।(बर्खास्त )"--वक़्त पूछे हो भाई जान --- रात होने हैं... होंगे कल वाले ही आठ के करीब " अब्दुल की बाहरी रिश्ते की बहन जो हिंदू परिवार से थी ने घड़ी पर दो चपाटी मारी थी, खींझ कर। " इस क्वाड़ को फेक कयो नहीं देती!" अब्दुल जैसे खीज कर बोला।"अच्छा नयी ला दो। " नैना ने मशकरी की।बस वो उसे भैया जान जरूर बुलाती थी। यूँ ये कह लो, उम्र के मुताबिक ज़ब माँ बाप रिश्ता नाता नहीं देखते, तो फिर लड़की भी कया करे।हिन्दू परिवार मान प्रतिष्ठा ...Read More

29

मंजिले - भाग 29

आलोचक------- मैंने जिंदगी मे बहुत आलोचक देखे है ----- पर एक आलोचक ऐसा भी था... मंजिले कहानी का सिर बाद मे धड़ कहेगे।वो आलोचक कम व्यस्त जयादा दिखा ही था, वैसे वो कभी होता नहीं था। ये कहानी हमारे देश की, पुलिस स्टेशन की यहां वो काम करता था...पढ़ाई मे पढ़ा वो पांचवी तक ही था। नाम था उसका सन्नी सिंह, जात के कुछ भी हो कया लेना... वो सामने जिस फ़ाइल को पकड़े है, बस सीधे ही मिल लो। " भूतनी वाले बात सुनते ही कहा है... " हेड फोन पे बाते कर रहा था किसी से भी, ...Read More

30

मंजिले - भाग 30

मंजिले ------ मर्मिक कहानियो की पोथी है जो जज्बाती और भावक थी। इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है कभी..... "ये " इस कहानी का शीर्षक है। ये ऐसा होता, ये ऐसा न भी होता।हमारे देश का विकास" ये" पर ही रुका हुआ है!!पूछो कैसे इनका ये ही कभी लम्बे भाषण से हटा ही नहीं.... जानते हो तरवेणी संगम मे भी ये ने खास भूमिका निभायी। ये ऐसा न भी होता, ये हो गया। हम देशवासी बेहद दुखी है, ये न होती, ऐसी भखदड़ तो सब गरीब बच जाते।ऐसा ही अहमदाबाद मे हुआ कितने ही यात्री मर गए। यहां ...Read More

31

मंजिले - भाग 31

एक जंग ------(31) ये स्टोरी मर्मिक एक कुशल युवक की सोच पर आधारित है। ये साल 1950 का पाँचवा है। डेट पर कोई खास धयान नहीं है। रुसी अधिकारी पूरी जानकारी के साथ युद्ध करने से पहले दुश्मन को जांचना चाहते है। इस लिए युवक डामिकस्तान को उस हद मे भेजा जाता है। हथियारों से लेस कर के गुप्त तरीके से, ये कहानी सत्य है। उसको एक टेंक केज़रिये वहा भेजा जाता है। स्पिनर बंदूक उसके हाथ मे होती है। उसका निशाना 40 फुट तक का होता है। वो बारूद लिए बसती मे उतरता है। कभी लड़ाई की थी ...Read More

32

मंजिले - भाग 32

आसमान मेरी मुठी मे ---------(32 ) मंजिले कहानियो मे -------- मेरी सब से लिखी सुंदर कहानी। जीवन की कड़िया एक एक कर खोलना, तब ज़ब तुम अकेले हो। सोचना विचारना अब से तब तक तुमने कया ऐसा किया, जो तुम्हे कभी कभी बहुत ही तंग करता है वो पल, जज्बाती मत होना, किसी को बताना नहीं, भेद कोई जाने न, तुम हो उस कमरे मे एक बस क्लॉक की टिक टिक करती समय की गती बस। फिर सोचना कुछ ऐसे, कि किसी को कुचल कर आगे तो नहीं निकल रहे, कानो की सरसराहट तभी होंगी... हाँ मन तभी मान ...Read More

33

मंजिले - भाग 33

मंजिले कहानी सगरहे की एक मर्मिक कहानी " रडिओ " एक यादगर कहानी। " वो तंग गली, हाँ वही गली, मुला धीरो सलायी वाली, जो घूम कर ! "एक चुरास्ते पे आ निकलती थी। "हाँ वही --- वही ।" " बम्बे की तंग सी गलियों मे गरीबो का भी समाज था, उनके भी जज्बात थे, उनका भी जीवन था, उनका भी उदास सपना था। " जो शायद कभी पूरा होना नहीं था। उसी तंग सी गलियों मे एक मदन का शहंशाह परिवार था। मंगू उसी घर का कार ड्राइवर था। जो मदन " को वकालत के वक़्त छोड़ कार ...Read More

34

मंजिले - भाग 34

मंजिले कहानी सगरहे की घुटन -----जिंदगी चरदिवारी मे बंद होकर रहे गयी.. सकून अब कहा रह गया था। जिंदगी ऊंचे दाव कोई ईमानदार कैसे खेल सकता था। खेलने के लिए बाईमान होना लाजमी होता है।जिसने कभी झूठ नहीं बोला, वो सख्श आज की तारीख मे कौन हो सकता है... बाईमान बनोगे, तो मिस्टर आमीर बन जाओगे, पर जिनका जमीर मर गया होगा वही ऐसा कर सकता है।घुटन तभी खारो जैसी चुभती है, ज़ब तुम चार दीवारों मे जकड़ लेते हो आपने आप को, सच कहता हूँ, कभी बोझ को हटाओ, फिर देखो घुटन कैसे तुमसे लाखो मील दूर भाग ...Read More

35

मंजिले - भाग 35

एक हादसा ----- ये एपिसोड लिखा जा रहा है। सच्ची घटना, समय पूछोगे तो नहीं बता सकता। मंजिले कहानी की उनमत कहानी ------"एक हादसा "समय अच्छा या बुरा नहीं होता, खुद ही हम इसको बनाने वाले है। कारसाज तो सभी को दो जेबे लगा कर ही इस धरती मे भेजता है।दो जेबे मतलब उच्चे और नीचे जाने की व्यस्त चाबी।तुम कया हो, ये जानने का अधिकार तुम को नही हो। ये लोग तुम्हे तराजू से तोलेंगे। मंत्री हो तो हर खुशखबरी तुमाहरी दिखावा होंगी। इसे सत्य मत समझ लेना। संत हो तो दुनिया से दूर होने की कोशिश करो, ...Read More

36

मंजिले - भाग 36

"-----टूटे हुए तारे -----" ये एक स्वेदनशील कहानी अति प्रिये है मेरी..... मंज़िले कहानी सगरहे मे ------वो नुकड़ वाली लाल चंद की आज 10 वजे के बाद ही खुली थी... बस स्टेण्ड के साथ वाली जो चार पांच गज की जगह मे बनी हुई थी, टीन की छत गर्मी मे खूब गर्म... ठंडी मे खूब ठंड... बर्षा के मौसम मे टिप टिप आवाज़ और धार पानी की वेह जाती लगातार... मौसम कितना सुहाना लगता उसके नीचे खडे होकर... ये कितना भावक दृश्य होता था। जयादा लोग खडे होकर ही चाये पीते थे... जिसने एक बार पी ली, वो बार ...Read More

37

मंजिले - भाग 37

एक सत्य ----- सच मे कहीन कही घटित होती है, जिंदगी की जमात की वो कहानी ---- जो तुम चाहते थे कह चुके थे।मुड़ कर वो कभी वापिस नहीं आते, चाहे कुछ भी हो। मुस्काना एक अहम भी हो सकता है.... घूलोगे, बहुत घू -लोगे तब तैयार मिलेगा पापा का वो आशेयाना। कितना टूट सकते हो, टूट जाओ, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।मेहरबानिया अक्सर तेरी याद करते है। जो तुम हिसाब किताब मे नहीं जोड़ते थे। देखा है एक ऐसा बंदा जो मेरे अंदर ही था, मै बाहर ढूढ़ता रहता था। लिख दिया तो सब्र आया। कि जिंदगी ...Read More

38

मंजिले - भाग 38

"---मतलब ----" ये एक सत्य कहानी है। जीवन को इतना तो काबिल कर लो, जो तुम्हारी काबलियत हर शक्श पता चले। दुनिया मतलबी है, बाद मे वो यही कह देती है अगर बात नहीं सुनी " किस गुमान मे है, आज कल कहा सुनता है आपनी बात " तुम्हे बस तोड़े गी। ये दुनिया, जख्मो पे नमक छिड़के गी।। मंदिर के कपाट अभी खुले ही थे, समय होगा 6 वजे का। सुबह रोज ऐसी ही चढ़ती है, ऐसे ही दिन डल जाता है। कितना आपना पन था लोगों मे, आज मोबाइल ने सब कुछ छीन लिया.... रिश्तेदार भी बस ...Read More

39

मंजिले - भाग 39

मंज़िले कहानी सगरहे मे ----एक खमोशी ---- नाम की कहानी जो सत्य पर आधारित है। वो लिखने को आजमन 81 का था। सत्य घटना पर आधारित एक खमोशी एक सदमा, एक बेचैनी इसके जयादा कुछ नहीं था।मिलिटेंट का साम्राज्य था उस वक़्त पंजाब मे, पंजाब एक गूंगी जंग मे अंधा वलीन था। कौन आपना कौन पराया था। उस घर की कहानी जो खेतो मे था। बापू का नाम साधु सिंह था। माँ थी, और भी भाई थे। वो पक्के सरदार थे। दाढ़ी जिनकी खुली रखते थे... घातरे वाले जाथेदार थे। उनका बाबा धर्मिक पुरष था।हाँ एक बात थी। मिलिटेंट ...Read More

40

मंजिले - भाग 40

ईमानदार ---------मंज़िले कहानी सगरहे की मेरी सब से सुंदर कला कृति......पांच बड़े माहल ऊपर के ऊपर.... मेरी सारी गर्दन मे ही पीछे जा टिकी। ईमानदारी से इतना बिजनेस कैसे खड़ा करते है, लोग, सोचता हूँ मैं। ईमानदारी की तो रोटी मसा चलती है। ये कैसे सब कर लेते है।सोच ही रहा था, सौ रहे वाच मैन ने कहा ---" बाबू जी कया ऊपर से नीचे, फिर नीचे से ऊपर देख रहे हो... रोज यही कयो आते हो ----? देखने वाला पाठक था। गरीब परिवार का मातड लड़का... कया बताये --- " जो बीच बैठे है सब चोर है, या ...Read More

41

मंजिले - भाग 41

किसी से लगती हो तो मै जिम्मेदारी नहीं लेता हूँ। ये कहानी किसी पर भी लग सकती है। डलिवरी बॉय एक मोहन दास की जिंदगी के कुछ पड़ाव से निकल कर आयी हुई एक सभाधान पूरक एक छोटी कथा है।सोच कर जिस बात पे रोना आता है, भूख जिस कहानी का मकसद हो पेट की भूख, वो सपने कैसे बड़े देख सकता है। बस बेरोजगार जो एक दम से अच्छा पढ़ा लिखा हो, लेकिन वजीफा सरकार से लेता हुआ फर्स्ट रहने वाला युवक डलिवरी बॉय की जॉब करे। ...Read More

42

मंजिले - भाग 42

( 42 )"पछचाताप कहानी " एक मर्मिक जज्बाती हो कर आपने लवारिस पन के गुमनाम दृश्य की यादगार डलिवरी की ही बेजोड़ तकसीम से निकली क़लम से सत्य माफिक है। किसी पे ये कहानी लगती हो तो इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहा हूँ। ये दुपहर का वक़्त था। सर्दी थी, महीना फ़रवरी की शुरवात कहिये... चावल खा रहा मोहन रविवार को छत पे बैठा था। सोच रहा था जो पैकट उसके पास था ...Read More

43

मंजिले - भाग 43

" कोवा काटे " मंजिले कहानी सगरे की 4--भी कहानी --------- जिंदगी चूर हो जाती है, जरूरी नहीं पीने से, मेहनत से थक कर भी। सोचना जरूरी हो जाता है, किस्मत मे हर पड़ाव पर सोचना। किसी का घर बर्बाद करना हो, तो अक्सर उन लोगों से रिश्ता जोड़ो, जो बहुत चुगली करते हो। झूठ की नीव पर घर बनते ही कहा है। बन गए तो फिर तमाशा लगा रहता है। हा, एक दोस्त याद आ गया, बहुत ही प्रभावशाली स्टेमना था।... ...Read More

44

मंजिले - भाग 44

(1) ( ये सत्य कहानी पर आधारत अपराध बोध की कहानी है... नाम कल्पनिक है।) " राम झूठ बोले " ये बनवारी ने कहा था। बनारस से पानीपत आ चूका मंदिर मे दस साल बाद। पहले कया था, ये तो उसका अतीत ही बता सकता है, या बनारस की वो गलियों और खुली हवेलीयों के पिछवाड़े... वक़्त उस अतीत का ज़ब वो कही भी किसी की जेब काट काट कर कुछ बना भी तो पंडित उपाराम का शगिर्द... उपराम था एक नबर का कंजूस... चाये भी ...Read More

45

मंजिले - भाग 45

------------------------मंजिले कहानी सगरहे कि सब से सुंदर क्लाकृति मेरी यही कहानी जुर्म ही बड़ी खास चर्चित है। पता कयो सच्ची कहानी है एक दम रीड की हडी की तरा "------- ताजुब है न। " (जुर्म ) सुबह की वही छटपटाट वही हर रोज की तरा दुपहर तक बिज़ी घर घर की कहानी.... कही पर चीख कही हसने की आवाजे कही मदहोशी की चुस्की चाये की, बनारस के शहर मे मंदिरो की घंटिया वजने के चल चित्र.. हर कोई आपनी लीला मे डूबा हुआ ...Read More

46

मंजिले - भाग 46

--------" कब्ज " एक हैरत अंदाज की कहानी --- " न मुराद ये बीमारी हमें ही नहीं, मेरे जिगर भी है। मेरी बेगम सलमा को भी है, और बेटी नसीबा को भी है। " जैसे नबाब पिता अब्दुल रो पड़ा। हकीम बुखारी के आगे। अब एक घर है। हेवीलिया कहा है, सरकार ने सब कुछ खो लिया। अब नबाबो की जिंदगी सिमट गयी सात या आठ मरले मे, बस। कुछ न आगे दिखता था न पीछे। नबब्यादी अब कहा थी। पेशन थी, अंग्रेजो के समय की वोही बस लगी हुई... ऊपर से ये बीमारी, पीछा कहा छोड़ती है। तीन ...Read More

47

मंजिले - भाग 47

-------------------------- कब्ज (2) ----------------"ये भोजन ले जाओ सलमा " खसम ने सिर पकड़े कहा। "पाकिस्तान का वजीर मर जाये सलमा ने कहा... " "कयो बेगम ---उसने कया कर दिया!” सलमा बोली " एक ढंग का हॉस्पिटल नहीं है, दवाई नहीं है, लोग करोने से मरे, हम कब्ज से मर रहे है। " खूब हसा, हसने वाली बात थी। " कयो हसे " सलमा ने कहा। ये भी पाबंदी है। " फिर वो लटके से मुँह से चले गयी। रात के दस वजे होंगे। बिजली घुल हो चुकी थी। " कया करता अब्दुल दुखी पिता... हुक्म चद के रूम मे ...Read More

48

मंजिले - भाग 48

ये कहानी तभी पूर्ण होती है अगर शरुवात और अंत मिल जाये... यही कहानी हर लेखनी का कमाल है... वही से... कृष्णा जी की आरती कर चुकने के बाद किंवाड़ बंद कर होंगे थे। रात पड़ चुकी थी। बनवारी ने पूछा था " अकल आप करते कया है। " वो हस कर बोले " बेटा मेरा पानीपत मे बुटो का सेल्स मैन हूँ.. बड़ा ख़फ़ायिती बिजनेस है... लाखो का लेन देन। " बनवारी की आँखे खुल गयी थी। सोच कर गुम हो गया था। फिर एक वार काँप गया... " अकल आपका नाम " बनवारी ने पूछा। " मेरा ...Read More

49

मंजिले - भाग 49

परिक्रमा की ही साथ चलती पटरी की तरा है, एक से गाड़ी उतरी दूसरे पड़ चढ़ जाये, तो कहा पता ही नहीं.... रास्ते पे--------------परीक्षा 49वी कहानी है। ये कहानी का तीसरा खंड है। शाम से पहले पहले ही वो इतने खुश वो व्यक्ति थे पूछो मत। बाके जी का प्रशाद बनवारी के लिए धोती कुड़ता नया ला कर उनके हाथ मे थमा दिया था..... बनवारी हकबका सा देख रहा था " यजमानो कया है ये। " तभी उनमे से एक बोला " पंडित जी हम सुबह वाले चोर आपके पास अरदास लगाने नहीं आये थे, हम जीत गए, पता ...Read More

50

मंजिले - भाग 50

"समाधी" बैठे कभी धयान लगा है, नहीं न, लगना भी चाहिए, योग तक़ गए हो नहीं ना... जाते कयो कोई कोई न कोई अतीत की असली कारगुजरिया की होंगी ---- भूलने देगी कभी न।छोटीया चोरिया करते करते बड़े समगलर बनते है। योग करते करते समाधी तक़ नहीं पहुचे। बहुत हैरत होती होंगी। होंगी जरूर होंगी... बनने की कोशिश नकाम कयो करते हो। जिंदगी असफलता की कुंजी है।हम लोगों ने ही सफलता पर जाना है। भगवान का नाम उचारो... फिर कुछ हो सकता है। "मागने बैठ गए तुम भाई ---" चलो मंदिर से घर तक़ सफर करते है। " ओह ...Read More

51

मंजिले - भाग 51

52----------- ( एक चोट )नसीब आदमी से कया कया नहीं कराता, आदमी कठपुतली है परमात्मा के इशारे पर चलता काटे चुने चाहे गुलाब हिस्से कया आता है ये सिर्फ ऊपर वाला जानता है। मैंने किसको कया देना है, वोही जानता है।किसे के हिस्से तख्त ताज और किसे के हाथ कोयलों की खान... बस और कया, ज़िन्दगी इसी का नाम है। ज़िन्दगी पता दे कर नहीं भेजती, पते ढूढ़ने पड़ते है, बहुत खूब... जियो जीने आये हो, किसी को चोट दे कर नहीं, मरने के समान होता, होता है ऐसा जीना... कमबख्त ज़िन्दगी अदला बदली नहीं, इसे मंजर की तरा ...Read More

52

मंजिले - भाग 52

समय ----------- मंजिले सगरहे की पुष्ट कहानी एक जबरदस्त उड़ान कभी चलते घोड़े को देखो वो किसी को पीठ बैठने नहीं देता.. पता कयो.. चलो बताओ,नहीं बता सकते, उसकी भी दुलतियां खानी पड़ती है फिर कही जा कर मालिक हो पाते हो उसके। ऐसे ही समय है.... बस फर्क इतना है ये हम पर सवार होता है।समय दुख देता है आपने किये कर्मो का.. हाथ पीछे परम पिता का होता है... सुख का पता दुख के बाद चलता है। अगर सुख मे रहो... तो सोचोगे.. यार थोड़ी तब्दीली हो... बस वो दुख है। "समय के साथ चलने वाले भी ...Read More