ये कहानी तभी पूर्ण होती है अगर शरुवात और अंत मिल जाये... यही कहानी हर लेखनी का कमाल है... शरू वही से... कृष्णा जी की आरती कर चुकने के बाद किंवाड़ बंद कर होंगे थे। रात पड़ चुकी थी। बनवारी ने पूछा था " अकल आप करते कया है। " वो हस कर बोले " बेटा मेरा पानीपत मे बुटो का सेल्स मैन हूँ.. बड़ा ख़फ़ायिती बिजनेस है... लाखो का लेन देन। " बनवारी की आँखे खुल गयी थी। सोच कर गुम हो गया था। फिर एक वार काँप गया... " अकल आपका नाम " बनवारी ने पूछा। " मेरा नाम राम रुसवाई है " बनवारी चुप कर गया। " अकल आपको सपने मे और कुछ नहीं कहा... " हसते हुए बोला बनवारी... कृष्णा जी की किर्पा से। " कृष्णा जी ने यही कहा था... हाँ वोह आप को नटखट जरूर कहते हुए गए थे " राम रुसवाई ने कहा " रोटी खाने जाते हो... " बनवारी किसी वैष्णों डाबे के अंदर गया तो अकल ने कहा... " बनवारी तुम कल मेरे साथ चलो, मै कहो तो छोड़ भी जाऊगा... " भर पेट सेवा की अकल ने सब खर्चा अकल का ही था।
" हाँ ----"बनवारी ने कहा। सुबह गुरू जी से पुछूगा, जो कहे गे, वही करना होगा..... छत पर बनवारी और चारपाई पर अकल लेट गए। बनवारी ने पूछा " अकल आप ने किसी औगड को नहीं दिखाया... " अकल की आँखो मे पानी था... बाके जी के सपने के बाद मैंने डोरी उन पर छोड़ दी। " -----" अकल आप रोयीये न " बनवारी ने पूछा, " और कौन है घर मे " अकल ने बताया " एक लड़का जो ठीक नहीं है... दूसरा एक चाचे का लड़का मैंने गोद लिया था... एक उनकी बहन जो शादी करा के सुसराल सेटल है। " बनवारी चुप कब उसकी आँख लग गयी। और जल्दी से उठा... चार के करीब टाइम होगा.. अकल सौ चूका था... मन तो किया उसका हाथ जमाई करे, पर नहीं... रहम से देखा और नीचे आ गया।
किंवाड़ खोले... मंदिर साफ किया... लेकिन मंदिर के अंदर नहा के ही दाखल होता था। फिर वो ठंडे पानी से नहा कर बाके जी की ज्योति जगाई... फिर कुछ गुलाब के इत्र से मंदिर सुगंध से भर गया। " बुडबढ़ाने लगा बाके जी के आगे... " प्रभु तेरा चोर बंदा हूँ, मुझे कुछ नहीं आता है... ये ऊपर जो बंदा है तेरा, मुझे पता नहीं कया समझ रहा है... कया लीला है तेरी प्रभु... " फिर वो चुप कर गया... तीन शक्श माथा टेकने आये थे। अदालती केस थे उनके। " नये पंडित बनवारी को कहा " पड़ित जी हमारी अरदास कर दो... हम चोर है, हमारी तारीख अगली पड़ जाये... आज फैसला न हो, हम बाके जी के लडू चढ़ाये गे, आप के लिए नये कुड़ता धोती देकर जायेगे.... " बनवारी हकाबका सा रह गया। बनवारी थोड़ा मुस्कराते बोला, जैसे उनसे डरता हो, " नाम बोलो आपने। उन्होंने नाम बोले। " बनवारी ने कहा हाज़री लग गयी आपकी। अब परिक्रमा कर लो। " उधर अकल जी देख रहे थे। वो फिर चाये लेने चले गए, कयोकि दिसबर की ठंड थी। बनवारी मस्त होकर कृष्णा राधे के सिमरन मे लगा हुआ था -----------"
परिक्रमा कहानी का तीसरा खंड अगली तारीख पे छपैगा। ( चलदा ) नीरज शर्मा 🚩