Storeys - Part 51 in Hindi Anything by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 51

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मंजिले - भाग 51

52----------- ( एक चोट )

नसीब आदमी से कया कया नहीं कराता, आदमी कठपुतली है परमात्मा के इशारे पर चलता है, काटे चुने चाहे गुलाब हिस्से कया आता है ये सिर्फ ऊपर वाला जानता है। मैंने किसको कया देना है, वोही जानता है।

किसे के हिस्से तख्त ताज और किसे के हाथ कोयलों की खान... बस और कया, ज़िन्दगी इसी का नाम है। ज़िन्दगी पता दे कर नहीं भेजती, पते ढूढ़ने पड़ते है, बहुत खूब... जियो जीने आये हो, किसी को चोट दे कर नहीं, मरने के समान होता, होता है ऐसा जीना... कमबख्त ज़िन्दगी अदला बदली नहीं, इसे मंजर की तरा मत काटो। जीना इसी का नाम है हस कर जिओ। चाहे लाख गम हो। कोई बात नहीं....

                              " किसी को मारना कठन है तुम कहते हो " मै तो हसता हुँ। पूछो कयो, किसी को मार देना एक बुझ उतार देना, जो जन्मों का साथ चल रहा हो, उसे बेसब्री से काट लेना, बहुत नाजुक कड़िओ का जन्म होता है, वह कही टूट न जाये बस यही सोच होती है। हर किसी की बकवास मे कुछ जरूर होता है। समझो।

                  उसे कैसे मरोगे, प्रश्न चिन लगा हुआ मिलेगा... शक न हो, कोई गुमराह न करे। बहुत कठन परिस्थिति है। समझे ? दुश्मनी आज की नहीं बचपन की, जिसने मेरी प्यारी चीजों को छुआ ( न नहीं लुगा आप समझे ) ये चमड़ी त्वचा की बात कर रहा हुँ, उसे कैसे बक्श सकता हुँ आज मै 45 का हुँ.. कैसे दुश्मनी छोड़ दू, जैसे तैसे भी मैंने रिवालवर 32 बोर का लिया, एक और छोटा हथियार.. रिवाल्वर के साथ बारा बूल्ट लिए... ये जर्नी ही थी मेरी सब चीजों को ले कर आना,

                     बहुत कठिन तरिके से पहुंचा ही था। पूछो मत अब एक नक्शा घर मे बैठे ही बना लिया, कैसे अब 68 साल और 35 को साल के बंदे को मारा जाये.. हाँ वो भी शादी शुदा तीन बच्चे थे उसके। जो दूसरा था वो कुंवारा ही था शायद। जिसने मेरे साथ ही गलत सबंध बनाये थे, उन्हें कैसे छोड़ता... अब समान भी आ गया।

जलधर से दूर शहर ( नाम नहीं लुगा ) रेकी करने के लिए गया कोई दस साल बाद। ये सुन कर हैरान रह गया... एक बड़ा जो 68 साल का था शुगर की बीमारी से मर गया था... जो छोटा था ठेकेदारी करता था, पता नहीं कहा... ढूढ़ने को ढूंढ सकता था.. पर कैसे। चलो सोचते है। 

कैसे ये पिस्टल चलेगी.. बूल्ट निकलेगी.. फिर। ये सोच रहा था, सोचने मे कौनसा पैसे लगते है। चलो मैंने कहा घर चले आपने, या उनके.... टास रुपए की डाली।

कमबखत उनके घर की ही आयी टेल... घर गया तीन घर बनाये थे उन्हों ने चार भाई थे... माँ बाप तो गुजर चुके थे बड़ा भाई भी छोटा भी, अब रह गए दो भाई, बस। पता लिया उसका ठेका छोटी भरजायी से लिया वो करपुथले ठेके का काम करता था... चलो फिर मिल कर घर को वापसी। 

सोच रहा था रोज प्रार्थना दुश्मन की करता हुँ भगवान के आगे... ज़ब उसको काम सौपा हुआ है तो फिर कत्ल कयो ?  फिर छत को मै घूरता रहा। मकड़ी खुद मर गयी ज़ब वह पीले भूड़ की चाल मे फ़स गयी।

----------------"नीरज शर्मा " 

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