Storeys - Part 46 in Hindi Short Stories by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 46

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मंजिले - भाग 46

--------" कब्ज " एक हैरत अंदाज की कहानी --- " न मुराद ये बीमारी हमें ही नहीं, मेरे जिगर को भी है। मेरी बेगम सलमा को भी है, और बेटी नसीबा को भी है। " जैसे नबाब पिता अब्दुल रो पड़ा। हकीम बुखारी के आगे। अब एक घर है। हेवीलिया कहा है, सरकार ने सब कुछ खो लिया। अब नबाबो की जिंदगी सिमट गयी सात या आठ मरले मे, बस। कुछ न आगे दिखता था न पीछे। नबब्यादी अब कहा थी। पेशन थी, अंग्रेजो के समय की वोही बस लगी हुई... ऊपर से ये बीमारी, पीछा कहा छोड़ती है। तीन तीन दिन अहसास ही नहीं होता, ये रोग जान लेना बना हुआ था। बुखारी ने पता नहीं कितने जुलाब की दवाई दे दी थी... बस सब बेकार थी। 
                      फिर देसी इलाज छोड़ा। अंग्रेजी किया.. डॉ ने कबाब बंद हमेशा के लिए कर दिया। दूध के साथ दो दिन बाद कब्ज आराम से टूट जाया करती.. शुक्र किया। पर रोज पेट साफ होना असब्व प्रतीत होता था। नबाब भी कहता , " कयो मरना है, रहने दो ।"----एक ही बात थी, बैठना कठन हो जाता। उम्र होंगी कोई उनकी सत्र प्जत्र के लगभग। दुःख का कारण बनी हुई ये न मुराद बीमारी... उनके जिगर को जो हुक्म राये था, खूब कबाब खा कर शराब पीता तो कब्ज़ का नामो निशान न था। नसीबा जयादा चुप ही रहती। बेगम सलमा तो खुद एक पेग पी लेतीं और बस पेट साफ। कितनी दफा नसीबा को कहा वो माने तो फिर ही। हाँ ---- नबाब इतना जरूर कहता " ये न मुराद बीमारी !" फिर रुक कर बोलता " किसी न मुराद को भी न ये दुश्मन को भी ना हो जाये। " सच ही कहता था। कहने को और बहुत कुछ था।
                      एक दिन अल्ला मेहरबान हुआ। अख़बार मे मुफ्त इलाज, हिंदुस्तान से कही से भी... यकीन ना आये, महाशला उसको। इसभगोल रोज गर्म दूध के साथ... सब लेते वारी  वारी... कितनी कितनी। सब खुश। ज़ब भी दरवाजा खटके ---" नबाब साहब घर पर है। " 
उधर से आवाज आती " नहीं मिया --- रौशनी करने गए है। " ये कमबख्त रौशनी कया है। यही सोच कर सब चुप कर जाते। इसी लजता भरी जिंदगी से 35 साल की नसीबा का देहात हो गया। " जयादा पी ली थी शराब... पेट पर हाथ रखे मर गयी... तौबा ऐसी मौत के भी। ---"  एक खस्मा बोली " कुछ कहना चाहती थी... कह न सकी.. पेट को पकड़े ही मर गयी। -- आख़र कोई गम सीने मे देहकते शोले की तरा होगा " हकीम बोला " वही पुरानी गिरफ्तारी... रोग की। " 
                           हमने ऐसे ही इसे दफना देना है, वहा पर बगैरा मौलवी का छोटा छोटा भाई इसकी इफाजत करे। "  सलमा ने आपने लखते जिगर को कहा " इसकी इज़त आपनी घर की इज़त है, कब्रों तक भी इज़त है इसकी... "  लखते जिंगर ने बोल के कहा " पी हुई थी हमने भी, बेशुमार। इंतज़ार बाकी है अभी ---" नबाब सुन कर आग बूंना हो गए। शायरी सूज रही है कमबख्त को। "इधर जवान घर का ज़ी चला गया... " सलमा ने भी कहा। " शमशानगीर तू मेरी बात सुनता नहीं है या सुनना चाहता नहीं है...तुझे मैंने बोला दफन हो गयी मेरी बेटी... खुदा..... पहरा इस पर खूब हो। " उसने भी हाँ बोल कर कहा सिर हिला दिया... कब्ज कहानी का दूसरा पार्ट (2) आप को एक मिनान से सुनाऊंगा... इंतज़ार करे।