शब्द और सत्य

(14)
  • 201
  • 0
  • 4.2k

1.प्रेम या व्यापार? जिसे तुम प्रेम कहते हो, ज़रा उसकी तह में जाकर देखो, क्या वो रूह का मिलन है, या बस एक गहरा समझौता? तुमने जिसे अपना कहा, क्या उसे सच में जाना है? या अपनी अधूरी हसरतों को, उसके कंधों पर लादना है? एक 'मैं' है, एक 'तू' है, और बीच में भारी दीवार है, दो भूखे मन मिल गए, तो कहते हो कि प्यार है। ये प्यार नहीं, ये एक-दूसरे को खाने की तैयारी है, ये साथ नहीं, ये एक-दूसरे की आज़ादी पर भारी है। तुम चाहते हो वो वैसा हो, जैसा तुम्हारी पसंद है, तो तुमने उसे प्यार कहाँ किया? वो तो तुम्हारी पसंद में बंद है। अगर वो बदल जाए ज़रा सा, तो तुम्हारी दुनिया हिलती है, ये प्रेम नहीं है साहिब, ये तो बस स्वार्थ की खेती है। सच्चा प्रेम तो वो है, जो तुम्हें खुद से आज़ाद कर दे, जो तुम्हारे 'अहंकार' के किलों को, पूरी तरह बर्बाद कर दे। जहाँ 'पाने' की कोई चाह नहीं, बस 'होने' का उल्लास है, जहाँ दूरी होकर भी लगे, कि सत्य बिल्कुल पास है। वो जो तुम्हें बांध ले, वो मोह की एक ज़ंजीर है, वो जो तुम्हें मुक्त कर दे, वही असली पीर है। देह के पार जो देख सके, उस चेतना का नाम प्रेम है, बाकी जो है इस दुनिया में, वो बस मन का एक वहम है। जिस दिन तुम खुद के लिए, पर्याप्त और पूरे हो जाओगे, उस दिन तुम किसी को पाने के लिए, कभी न हाथ फैलाओगे। तभी जन्म लेगा वो प्रेम, जो न कभी मरता है, न घटता है, वो सूरज जैसा होता है, जो बस अपनी मस्ती में चमकता है।

1

शब्द और सत्य - भाग 1

Part :11.प्रेम या व्यापार?जिसे तुम प्रेम कहते हो, ज़रा उसकी तह में जाकर देखो,क्या वो रूह का मिलन है, बस एक गहरा समझौता?तुमने जिसे अपना कहा, क्या उसे सच में जाना है?या अपनी अधूरी हसरतों को, उसके कंधों पर लादना है?एक 'मैं' है, एक 'तू' है, और बीच में भारी दीवार है,दो भूखे मन मिल गए, तो कहते हो कि प्यार है।ये प्यार नहीं, ये एक-दूसरे को खाने की तैयारी है,ये साथ नहीं, ये एक-दूसरे की आज़ादी पर भारी है।तुम चाहते हो वो वैसा हो, जैसा तुम्हारी पसंद है,तो तुमने उसे प्यार कहाँ किया? वो तो तुम्हारी पसंद में ...Read More

2

शब्द और सत्य - भाग 2

4: लक्ष्य: कहीं पहुँचना या सब कुछ छोड़ना?जिसे तुम 'लक्ष्य' कहते हो, वो बस मन का एक नया ठिकाना से भागने का, एक नया और सुंदर बहाना है।तुमने सोचा कि मिल गया पद, पैसा और जग में सम्मान,तो पूरा हो गया जीवन तुम्हारा, और मिल गया तुम्हें निर्वाण?नहीं! जिसे तुम जीत समझते हो, वो बस अहंकार की एक नई ऊँचाई है,सत्य की राह पर ये तरक्की नहीं, बल्कि रूह की गहरी खाई है।पशु भी पेट भरता है, और सुरक्षा में ही सो जाता है,अगर तुमने भी बस यही किया, तो तेरा जन्म व्यर्थ हो जाता है।जीवन का लक्ष्य कोई ...Read More

3

शब्द और सत्य - भाग 3

7: कृष्ण कहाँ हैं?तुमने ढूँढा उसे मूर्तियों में, और मंदिरों की दीवारों में,तुमने खोजा उसे मंत्रों में, और काशी गलियारों में।पर वो तो बैठा है तेरे भीतर, एक मौन साक्षी बनकर,और तुम भटक रहे हो बाहर, हाथों में माला लेकर।'सबमें कृष्ण' कहने का मतलब, कोई देह की पूजा नहीं,इसका अर्थ है—उस सत्य को जानना, जिसके सिवा दूजा नहीं।वो चींटी की तड़प में भी है, और हाथी की हुंकार में,वो उस बछड़े की आँखों में है, जिसे तुम काटते हो बाज़ार में।अगर 'कण-कण में कृष्ण' हैं, तो फिर ये कैसी हिंसा है?अगर हर जीव में वो बैठा, तो फिर ये ...Read More

4

शब्द और सत्य - भाग 4

("इस संग्रह की कविताएँ किसी व्यक्ति, धर्म या समुदाय की भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं, बल्कि प्रचलित और अज्ञान पर आत्म-चिंतन के उद्देश्य से लिखी गई हैं। सत्य का मार्ग अक्सर असहज करने वाला होता है।")10. दूध का रंग लाल हैजिसे तुम 'सफेद' समझते हो, ज़रा गौर से उसका रंग देखो,उस अमृत की धार के पीछे, छिपा हुआ वो जंग देखो।वो दूध नहीं, वो लहू है—जो ममता से निचोड़ा गया है,एक माँ का आँचल, ज़बरदस्ती मरोड़ा गया है।तुम कहते हो ये 'पवित्र' है, ये तो देवों का भोग है,पर सच तो ये है कि ये, एक बेजुबान ...Read More

5

शब्द और सत्य - भाग 5

(ये कविताएँ आहत करने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए हैं।कुरीतियों और अज्ञान पर प्रश्न उठाना ही इनका है।सत्य कभी-कभी असहज होता है।)13. आज़ादी: लिबास की या रूह की?जिसे तुम आज़ादी कहती हो, क्या वो बस मनमानी है?या पुराने पिंजरे को छोड़, नई बेड़ियाँ पहचानी हैं?तुमने पुरुषों जैसा चोला पहन, सोचा कि तुम मुक्त हुई,पर ध्यान से देखो! तुम तो बस एक और सांचे में नियुक्त हुई।सच्ची स्वतंत्रता बाहर नहीं, वो तो भीतर की एक क्रांति है,कि तुम 'मांस का लोथड़ा' नहीं हो, ये सबसे बड़ी भ्रांति है।जब तक तुम खुद को 'बेटी, पत्नी या माँ' में ही ...Read More

6

शब्द और सत्य - भाग 6

16.एक ही गर्भ, एक ही लहूतुम ऊँचे सिंहासन पर बैठे, खुद को 'विधाता' मानते हो?क्या चींटी और क्या हाथी, तुम सबको अपना जानते हो?सब एक ही माँ की कोख से जन्मे, एक ही मिट्टी के पुतले हैं,बस तुम्हारी आँखों पर अहंकार के, हज़ारों परदे धुलने हैं।मछली का तड़पना 'स्वाद' तुम्हारा, और गाय का रुदन 'व्यापार' है,भूल गए? उस निरीह के भीतर भी, उसी चेतना का विस्तार है।तुम जिसे 'पशु' कह कर काटते हो, वह माँ का लाड़ला बच्चा है,सिर्फ इंसान ही श्रेष्ठ नहीं, ये दावा तुम्हारा कच्चा है।प्रकृति के आँगन में सब बराबर, कोई छोटा-बड़ा नहीं होता,जो अपनी ही ...Read More

7

शब्द और सत्य - भाग 7

19.मित्र वही, जो सत्य दिखाएदोस्त वो नहीं, जो तुम्हारी 'हाँ' में अपनी 'हाँ' मिलाए,असली मित्र वो है, जो तुम्हारे पर कोड़े बरसाए।जो तुम्हारे साथ बैठकर, महज़ वक्त को न बर्बाद करे,वो मित्र है जो तुम्हारी चेतना को, अज्ञान से आज़ाद करे।अगर वो तुम्हारी बुराइयों पर, चुप रहकर मुस्कुराता है,तो समझो वो दोस्त नहीं, तुम्हें गर्त की ओर ले जाता है।भीड़ का हिस्सा जो बने, वो तो बस एक सौदागर है,जो तुम्हें अकेला छोड़ सके सत्य के लिए, वही असली रहबर है।चापलूसी की चाशनी से, जो तुम्हारे अहंकार को पालेगा,वो तुम्हें उजाले में नहीं, और गहरे अंधेरे में डालेगा।मित्र वो—जो ...Read More

8

शब्द और सत्य - भाग 8

22.कमजोरी का मोह छोड़ोकमजोरी कोई मजबूरी नहीं,यह तुम्हारा चुना हुआ एक बहाना है,ताकि सत्य के सामने खड़ा न होना खुद को बदलने का श्रम न करना पड़े।तुम कहते हो 'मैं असहाय हूँ',पर सच तो यह है कि तुम डरे हुए हो,अपनी ही बनाई हुई बेड़ियों से,अपनी ही छोटी-सी पहचान को पकड़े हुए हो।जिसे तुम विनम्रता कहते हो,वो अक्सर तुम्हारी कायरता होती है,जो लड़ने से कतराता है खुद के ही झूठ से,उसी के भीतर कमजोरी की जड़ें गहरी होती हैं।उठो! और देखो इस मन के खेल को,शक्ति बाहर से कहीं उधार नहीं आएगी,जिस क्षण तुम 'बेचारे' बनने का सुख त्याग ...Read More

9

शब्द और सत्य - भाग 9

25.खुद को मत बेचोसजी हुई इन बाज़ारों में,तुम अपनी कीमत मत लगवाना,रिश्तों के, रिवाजों के नाम पर,तुम खुद को मत रख जाना।तुम देह नहीं, तुम चेतना हो,पर तुम्हें 'सुंदरता' में बाँध दिया,एक रंग, एक रूप, एक जेवर देकर,तुम्हें वस्तु की तरह छाँट दिया।किसी की 'इज्ज़त' का भार लिए,किसी की 'पसंद' का श्रृंगार लिए,तुम कब तक सड़कों पर चलोगी,एक पराया, झूठा संसार लिए?मत बेचो अपनी बुद्धिमत्ता को,कि कोई तुम्हें 'घरेलू' कहे,मत मारो अपनी उस आवाज़ को,कि कोई तुम्हें बस 'कोमल' कहे।प्यार के नाम पर जो मांगता है समर्पण,वो अक्सर बस तुम्हारा शिकार करता है,जो तुम्हारी चेतना को न जगा सके,वो ...Read More

10

शब्द और सत्य - भाग 10

28.सच्चा बेटा कौन?बेटा वह नहीं जो बस 'वंश' चलाए,या बुढ़ापे की लाठी बनने का लालच दिखाए,सच्चा बेटा तो वह जो मोह के जालों को काटे,और परिवार में 'परंपरा' नहीं, 'बोध' को बांटे।सिर्फ सेवा करना ही धर्म नहीं है तुम्हारा,अंधभक्ति में डूबा रहना कर्म नहीं है तुम्हारा,यदि पिता गलत हैं, तो उन्हें टोकना ही प्रेम है,सत्य के साथ खड़े होना, सबसे बड़ा 'क्लेम' है।मत बनो ऐसा बेटा जो बस आज्ञाकारी है,क्योंकि अक्सर आज्ञाकारिता ही सबसे बड़ी बीमारी है।जिसमें खुद का विवेक नहीं, वो क्या साथ निभाएगा?जो खुद ही सोया है, वो औरों को क्या जगाएगा?आदर्श बेटा वह, जो खुद को ...Read More