Shabd aur Satya - 5 in Hindi Poems by Shivraj Bhokare books and stories PDF | शब्द और सत्य - भाग 5

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शब्द और सत्य - भाग 5

(ये कविताएँ आहत करने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए हैं।
कुरीतियों और अज्ञान पर प्रश्न उठाना ही इनका उद्देश्य है।
सत्य कभी-कभी असहज होता है।)

13. आज़ादी: लिबास की या रूह की?

जिसे तुम आज़ादी कहती हो, क्या वो बस मनमानी है?
या पुराने पिंजरे को छोड़, नई बेड़ियाँ पहचानी हैं?
तुमने पुरुषों जैसा चोला पहन, सोचा कि तुम मुक्त हुई,
पर ध्यान से देखो! तुम तो बस एक और सांचे में नियुक्त हुई।

सच्ची स्वतंत्रता बाहर नहीं, वो तो भीतर की एक क्रांति है,
कि तुम 'मांस का लोथड़ा' नहीं हो, ये सबसे बड़ी भ्रांति है।
जब तक तुम खुद को 'बेटी, पत्नी या माँ' में ही पाती हो,
तब तक तुम सत्य से दूर, बस रिश्तों के बोझ को ढोती हो।

समाज ने तुम्हें 'देवी' कहा, ताकि तुम्हें बांध सके,
सम्मान का ये मीठा ज़हर, तेरी रूह को फाँद सके।
कभी चूल्हे में झोंका तुझे, कभी बाज़ारों में परोसा है,
पर तेरी चेतना को जगाने का, किसने यहाँ भरोसा है?

आज़ादी का अर्थ है—अपनी 'वित्तीय और मानसिक' शक्ति को पाना,
किसी सहारे की तलाश छोड़, खुद अपना आकाश बन जाना।
मत पूछो दुनिया से कि तुम्हारी सीमा कहाँ तक है,
उठो और देखो! कि तुम्हारी चेतना ही ब्रह्मांड का सच है।

जिस दिन तुम्हारी आँखों में, मोह नहीं 'विवेक' होगा,
उस दिन तेरे सामने खड़ा, हर बंधन फीका और नेक होगा।
तुम कोई 'भोग की वस्तु' नहीं, तुम तो जलती हुई मशाल हो,
अपनी पहचान खुद ढूँढो, तुम ही अपना भविष्य और काल हो।

वही स्त्री आज़ाद है, जिसे अब किसी का 'डर' नहीं,
जिसका ठिकाना सत्य है, बस ईंटों का कोई 'घर' नहीं।
देह से ऊपर उठो, और अपनी 'चित्त' की शक्ति को जानो,
तुम 'ब्रह्म' की ही अभिव्यक्ति हो—इस सच को अब पहचानो।

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14. नकाब या निखार?

चेहरे की झुर्रियां तो छुपा लीं, पर मन की सिलवटों का क्या?
बाहर तो रंग चढ़ा लिया, पर भीतर के उन दागों का क्या?
तुमने जिसे 'सुंदरता' समझा, वो बस शीशे का एक धोखा है,
खुद को खुद से ही छुपाने का, ये कितना बड़ा मौका है।

महँगे लेपों के पीछे, क्या कोई डरा हुआ चेहरा है?
जो चाहता है कि दुनिया की नज़रों पर, बना रहे एक पहरा है?
तुमने समझा कि निखर गई तुम, पाउडर और इन रंगों से,
पर रूह तो अब भी वैसी है—मलिन, अज्ञान के संगों से।

श्रृंगार बुरा नहीं, पर अगर वो 'अनिवार्यता' बन जाए,
तो समझो कि तुम्हारी आज़ादी, अब बाज़ारों में बिक जाए।
तुम 'वस्तु' नहीं हो साहिब, जो विज्ञापन तय करेंगे,
कि तुम्हारे होंठों और आँखों पर, कौन से रंग उभरेंगे।

सच्चा श्रृंगार तो 'बोध' है, जो आँखों में चमक लाता है,
वो जो तुम्हें तुम्हारी देह से, थोड़ा ऊपर उठाता है।
वो मुस्कान असली है, जो सत्य की समझ से आती है,
जो किसी क्रीम या लोशन की, कभी मोहताज न होती है।

जिस दिन तुम खुद को, जैसा है वैसा स्वीकार करोगे,
उस दिन तुम दिखावे के इन, बोझिल गहनों को उतार दोगे।
आत्मा का कोई रंग नहीं, न कोई उसका रूप है,
वही सबसे सुंदर है यहाँ, जो सत्य की खिली धूप है।

बाहर का ये श्रृंगार तो, बस ढलती एक कहानी है,
भीतर का जो नूर है, वही शाश्वत और असली जवानी है।
मत बनो खिलौना विज्ञापन का, अपनी गरिमा को पहचानो,
तुम 'चेतना' हो कोई 'चेहरा' नहीं—इस बात को अब जानो।

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15. पिंजरे की सोच

तूने पूरी कायनात को, रसोई के कोने में समेट लिया,
अनंत होने का हक़ था तेरा, पर तूने खुद को 'मर्यादा' में लपेट लिया।
तेरे विचार क्या हैं? बस वही जो समाज ने तुझमें भरे हैं,
तू अपनी मर्ज़ी से नहीं जीती, तेरे भीतर सदियों के डर डरे हैं।

तू साड़ियों के रंग चुनती है, पर अपनी नियति का चुनाव नहीं,
तेरे पास दुनिया भर की बातें हैं, पर 'स्व' का कोई भाव नहीं।
जेवरों की चमक में तूने, अपनी बुद्धि को गिरवी रखा है,
और कहती है कि तूने, इस घर को खुशियों से चखा है।

तू ही सिखाती है अपनी बेटी को, कि 'सहना' ही उसका गहना है,
तू ही बेटे को बताती है, कि उसे बस 'मालिक' बनकर रहना है।
जो ज़ंजीरें तेरे पैरों में थीं, तूने वही विरासत में बाँटी हैं,
तूने अपने ही हाथों से, अपनी मुक्ति की फसलें काटी हैं।

संकुचित है वो मन, जो बस 'मेरा-तेरा' और 'ममता' में बंधा है,
सत्य की आँखों के सामने, ये मोह तो बिल्कुल अंधा है।
तू देह नहीं, तू चित्त है, तू सत्य की एक चिंगारी है,
फिर क्यों तूने ये छुद्र और छोटी सोच, अपने सिर पर धारी है?

उठ! कि धर्म कोई व्रत-कथा नहीं, जीवन का रूपांतरण है,
ये रूढ़ियाँ और रस्में नहीं, अज्ञान का ही व्याकरण है।
अपने विचारों को पंख दे, इस छोटे दायरे से बाहर निकल,
तू सिर्फ एक 'रिश्ता' नहीं, तू ही है इस सृष्टि का असली बल।

जिस दिन तू परंपराओं से नहीं, 'विवेक' से सवाल करेगी,
उस दिन तू अपनी ही नहीं, इस पूरे जग की मति बदलेगी।
सोच को विराट कर, और सत्य की ऊँचाई को पहचान,
तभी सफल होगा तेरा ये जीवन, और तेरा ये स्त्री का मान।

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मेरी कविताएँ आचार्य प्रशांत के विचारों से प्रेरित हैं।
कड़वी हैं, पर सच हैं।
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