Words and Truth - Part 8 in Hindi Poems by Shivraj Bhokare books and stories PDF | शब्द और सत्य - भाग 8

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शब्द और सत्य - भाग 8

22.कमजोरी का मोह छोड़ो

कमजोरी कोई मजबूरी नहीं,
यह तुम्हारा चुना हुआ एक बहाना है,
ताकि सत्य के सामने खड़ा न होना पड़े,
ताकि खुद को बदलने का श्रम न करना पड़े।

तुम कहते हो 'मैं असहाय हूँ',
पर सच तो यह है कि तुम डरे हुए हो,
अपनी ही बनाई हुई बेड़ियों से,
अपनी ही छोटी-सी पहचान को पकड़े हुए हो।

जिसे तुम विनम्रता कहते हो,
वो अक्सर तुम्हारी कायरता होती है,
जो लड़ने से कतराता है खुद के ही झूठ से,
उसी के भीतर कमजोरी की जड़ें गहरी होती हैं।

उठो! और देखो इस मन के खेल को,
शक्ति बाहर से कहीं उधार नहीं आएगी,
जिस क्षण तुम 'बेचारे' बनने का सुख त्याग दोगे,
उसी क्षण तुम्हारी असली सामर्थ्य जाग जाएगी।

मत कहो कि तुम निर्बल हो,
तुम बस सत्य से विमुख और आलसी हो,
कमजोरी एक रोग है जिसे तुमने पाला है,
ताकत वह स्वभाव है जिसे तुमने नकारा है।

हटाओ ये 'बेचारगी' का नकाब,
आत्मा कभी कमजोर नहीं होती,
कमजोर होता है वह झूठा 'मैं',
जो बिना बैसाखियों के खड़ा नहीं हो सकता।
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23.मोटिवेशन का भ्रम

ढूँढ रहे हो बाहर जिसे तुम,
वो बस एक क्षणिक उबाल है,
मोटिवेशन तो एक नशा है दोस्त,
जो मन का ही बिछाया जाल है।

भीतर सड़न और बाहर पॉलिश,
कब तक खुद को तुम बहलाओगे?
दूसरे की आग से तप कर,
तुम कितनी दूर तक जाओगे?

आज सुना, आज उबल पड़े,
कल फिर वही ढर्रा पुराना होगा,
जब तक बोध नहीं जागेगा भीतर,
हर जोश बस एक बहाना होगा।

भूखे को मोटिवेशन नहीं चाहिए,
उसे तो बस पेट की आग चलाती है,
सत्य जिसे साफ दिख जाता है,
उसे किसी भाषण की ज़रूरत नहीं भाती है।

मत माँगो उधार की ऊर्जा तुम,
समझो कि तुम क्यों रुके हुए हो,
किन झूठी मान्यताओं के नीचे,
तुम कंधा झुकाए झुके हुए हो।

हटाओ ये मोटिवेशन का चश्मा,
चीजों को वैसे देखो जैसी वे हैं,
जहाँ 'बोध' की सूरज उगता है,
वहाँ आलस के अंधेरे कहाँ रहते हैं?

स्वयं को जानना ही असली शक्ति है,
बाकी सब बस मनोरंजन है,
जाग जाओ कि तुम सो रहे हो,
यही एकमात्र सच्चा आमंत्रण है।
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24.शांति पाई नहीं जाती

तुम खोज रहे जिसे मरुस्थल में,
वो मृगतृष्णा, वो पानी नहीं,
शांति कोई वस्तु नहीं है बाहर,
जो माँग कर लानी है।

मन शांत कैसे हो? यह प्रश्न ही गलत है,
पूछो कि ये अशांत क्यों है?
किन कूड़ा-करकट यादों को,
पकड़े हुए यह मौन नहीं है?

तुम शांति चाहते हो 'अहं' को बचाकर,
पर अशांति का बीज ही 'मैं' है,
जहाँ 'मैं' है, वहाँ भय और लालच है,
वहाँ शांति का सदा क्षय है।

मत बैठो आँखें मूँद कर तुम,
खुली आँखों से जगत को देखो,
जिन्हें सुख समझ कर पकड़ रखा है,
उन दुखों के पर्वत को देखो।

जिस पल गिर जाएगा झूठ तुम्हारा,
शांति स्वयं ही छा जाएगी,
वो कहीं बाहर से नहीं आएगी,
वो तुम्हारे भीतर से ही जाग जाएगी।

शांति का अर्थ आलस नहीं,
न ही कोई गहरा सन्नाटा है,
शांति तो वो युद्ध है दोस्त,
जिसने अज्ञान को बीच से काटा है।

मुक्त हो जाओ इस 'पाने' की दौड़ से,
जो बचा रहेगा, वही सत्य है,
मन का विसर्जन ही शांति है,
बाकी सब बस मिथ्या कृत्य है।
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 कविताएँ सिर्फ शब्द नहीं, मेरे एहसासों की आवाज़ हैं। अगर इन पंक्तियों में आपको अपने दिल की धड़कन, अपनी कहानी या अपने जज़्बात महसूस हुए हों, तो इस सफर में मेरे साथ जुड़े रहिए। अभी कई अनकही कविताएँ बाकी हैं… जो शायद सीधे आपके दिल तक पहुँचें।.....

मेरी कविताएँ मधुर भ्रम नहीं, कड़वे सत्य का दर्पण हैं। वे Acharya Prashant की स्पष्टता से प्रेरित हैं—चुभ सकती हैं, पर झूठा सुकून नहीं देतीं। अगर आप सच सुनने का साहस रखते हैं, तो मेरे शब्दों के साथ जुड़े रहिए