("इस संग्रह की कविताएँ किसी व्यक्ति, धर्म या समुदाय की भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं, बल्कि प्रचलित कुरीतियों और अज्ञान पर आत्म-चिंतन के उद्देश्य से लिखी गई हैं। सत्य का मार्ग अक्सर असहज करने वाला होता है।")
10. दूध का रंग लाल है
जिसे तुम 'सफेद' समझते हो, ज़रा गौर से उसका रंग देखो,
उस अमृत की धार के पीछे, छिपा हुआ वो जंग देखो।
वो दूध नहीं, वो लहू है—जो ममता से निचोड़ा गया है,
एक माँ का आँचल, ज़बरदस्ती मरोड़ा गया है।
तुम कहते हो ये 'पवित्र' है, ये तो देवों का भोग है,
पर सच तो ये है कि ये, एक बेजुबान का शोक है।
क्या देखा तुमने उस बछड़े को, जिसे भूखा छोड़ दिया गया?
सिर्फ तुम्हारी चाय की खातिर, जिसका नाता माँ से तोड़ दिया गया।
मशीनों की उस क्रूरता में, जब थन से खून रिसता है,
तब जाकर तुम्हारी विलासिता का, ये सफ़ेद झूठ बिकता है।
वो गाय जिसे 'माँ' कहा, वो आज बस एक 'मशीन' है,
तुम्हारे लालच के आगे, उसकी हर साँस गमगीन है।
जब तक वो दूध देगी, तुम उसे 'मैया' पुकारोगे,
और जब सूख जाएगी कोख उसकी, तो कसाई के हवाले उतारोगे।
तो बताओ! उस दूध की हर बूँद में, क्या उस कत्ल की महक नहीं?
क्या उस मासूम की सिसकी की, उसमें कोई गूँज नहीं?
आचार्य कहते हैं—सफेद रंग, बस आँखों का धोखा है,
ये मांस उद्योग को पालने का, सबसे बड़ा मौका है।
अगर करुणा ही धर्म है, तो इस शोषण को पहचानो,
दूध का रंग 'लाल' है—इस कड़वे सच को अब जानो।
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11.धरती की चिता: विकास या विनाश?
जिसे तुम 'प्रगति' कहते हो, वो इस धरती का कफन है,
तुम्हारी विलासिता की आग में, झुलस रहा ये चमन है।
एसी (AC) के कमरों में बैठकर, तुम ठंडक की बात करते हो,
पर बाहर जलती हरियाली को, तुम धुएँ से भरते हो।
ये पिघलते ग्लेशियर नहीं, ये कुदरत के आँसू हैं,
जो बता रहे हैं कि अब, तुम्हारे ही दिन कमज़ोर और बेबस हैं।
तुमने पहाड़ों को खोद डाला, नदियों का रास्ता मोड़ दिया,
कंक्रीट के इस जंगल में, तुमने जीवन का नाता तोड़ दिया।
विकास का जो नशा है, वो असल में एक गहरी बीमारी है,
ज़मीन को तुम नोच रहे, अब कुदरत के इंतकाम की बारी है।
हवा ज़हरीली हो गई, और पानी भी अब मौत बाँटता है,
जो बीज तुमने बोया ज़हर का, उसे अब हर कोई काटता है।
आचार्य कहते हैं—जब तक 'उपभोग' ही तुम्हारा धर्म रहेगा,
तब तक इस जलती भट्टी में, न कोई जीव सुरक्षित बचेगा।
तुम कारें बदलते हो, फोन बदलते हो, और घर बदलते हो,
पर अपनी उस 'वृत्ति' को क्यों नहीं, जिससे तुम हर पल जलते हो?
धरती को बचाना है तो, मशीनों से नहीं, 'बोध' से काम लो,
अपने बढ़ते हुए लालच की, अब ज़रा तुम लगाम लो।
प्रदूषण बाहर नहीं है साहिब, वो तुम्हारे 'अहंकार' का मैल है,
अगर मन शुद्ध न हुआ, तो ये तबाही का ही खेल है।
वो दिन दूर नहीं जब, सांसों का भी व्यापार होगा,
और सोना-चाँदी रखने वाला, प्यास से बेहाल होगा।
उठो! कि अभी भी वक़्त है, अपनी आदतों को सुधारो,
वरना इस जलते गोलक पर, बस अपनी ही मौत को पुकारो।
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12.इंसान और कुत्ता: वफादारी बनाम मक्कारी
वो गली का कुत्ता जिसे तुम 'दुत्कार' कर भगाते हो,
और घर के उस पत्थर को तुम 'भगवान' बताते हो।
पत्थर कभी भूखा नहीं होता, न उसे कभी प्यास लगती है,
पर उस ज़िंदा जीव की सिसकी, तुम्हें क्यों नहीं खलती है?
वो दुम हिलाता है क्योंकि उसमें 'छल' का कोई वास नहीं,
उसकी वफादारी में स्वार्थ का, कोई गंदा लिबास नहीं।
तुम हाथ बढ़ाओ तो वो जान तक वार देता है,
और तुम? तुम उसे बस अपनी 'झूठन' और दुत्कार देता है।
तुमने उसे 'नीच' कहा, क्योंकि वो सड़कों पर सोता है,
पर क्या देखा कभी, कि वो अपनों के दुख में कैसे रोता है?
इंसान तो अपनों का भी गला, लालच में काट देता है,
कुत्ता तो सूखी रोटी को भी, हज़ारों खुशियों में बाँट देता है।
वो जो भौंकता है, वो पहरेदारी है—कोई शोर नहीं,
उसके जैसा निष्पाप और भोला, इस जहाँ में कोई और नहीं।
आचार्य कहते हैं—उसकी आँखों में देखो, वहाँ 'कृष्ण' मिलेंगे,
अगर करुणा जागी तेरे भीतर, तो ही तेरे भाग्य खिलेंगे।
तुम कुत्तों की नस्लें खरीदते हो, लाखों का सौदा करते हो,
पर अपनी उस 'पशुता' से, तुम क्यों नहीं ज़रा डरते हो?
इंसान होना गौरव नहीं, अगर तुम में 'प्रेम' का अकाल है,
एक कुत्ता तुमसे श्रेष्ठ है, अगर तेरा मन मैला और बेहाल है।
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मेरी कविताएँ आचार्य प्रशांत के विचारों से प्रेरित हैं।
ये थोड़ी कड़वी ज़रूर हैं,
पर इनमें छुपा सच ही इनकी असली पहचान है।
अगर ये शब्द आपको छू जाएँ,
तो आगे की इस यात्रा के लिए मुझे follow करना न भूलें।