7: कृष्ण कहाँ हैं?
तुमने ढूँढा उसे मूर्तियों में, और मंदिरों की दीवारों में,
तुमने खोजा उसे मंत्रों में, और काशी के गलियारों में।
पर वो तो बैठा है तेरे भीतर, एक मौन साक्षी बनकर,
और तुम भटक रहे हो बाहर, हाथों में माला लेकर।
'सबमें कृष्ण' कहने का मतलब, कोई देह की पूजा नहीं,
इसका अर्थ है—उस सत्य को जानना, जिसके सिवा दूजा नहीं।
वो चींटी की तड़प में भी है, और हाथी की हुंकार में,
वो उस बछड़े की आँखों में है, जिसे तुम काटते हो बाज़ार में।
अगर 'कण-कण में कृष्ण' हैं, तो फिर ये कैसी हिंसा है?
अगर हर जीव में वो बैठा, तो फिर ये कैसा मांसाहार है?
तुम पत्थर को तो पूजते हो, पर ज़िंदा कृष्ण को मारते हो,
और फिर बेशर्मी से तुम, कृष्ण-कृष्ण पुकारते हो।
कृष्ण का अर्थ है—विवेक, जो तुम्हारे भीतर सो रहा,
कृष्ण का अर्थ है—प्रकाश, जो अज्ञान के अंधेरे में खो रहा।
उसे बाँसुरी और माखन में नहीं, अपने 'बोध' में तलाश करो,
अपनी पशुवत वृत्तियों का, तुम खुद ही अब विनाश करो।
वो सुदामा के प्रेम में है, और अर्जुन के रण-क्षेत्र में,
वो तुम्हारे हर सही निर्णय में है, और सत्य के हर नेत्र में।
जब तक तुम 'अहंकार' में हो, तब तक कृष्ण से दूर हो,
जिस दिन 'मैं' मिटेगा तेरा, उस दिन तुम कृष्ण-नूर हो।
सच्ची भक्ति वही है, जो हर जीव में उसे देख सके,
जो अपनी स्वार्थ की खातिर, किसी का लहू न फेंक सके।
कृष्ण बाहर नहीं मिलेंगे, वो तो बस अंतर्मन की गहराई है,
सबमें कृष्ण को देख लेना ही, असली अद्वैत की पढ़ाई है।
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8: भक्ति: समर्पण या समझ?
तुमने समझा कि माला जपना और सर झुकाना भक्ति है,
मंदिर के कोनों में जाकर, आँसू बहाना भक्ति है।
पर भक्ति तो वो आग है, जो तुम्हारे झूठ को जला दे,
जो तुम्हारे 'अहंकार' को, जड़ से ही हिला दे।
भक्ति कोई भावुकता नहीं, वो तो गहरा 'बोध' है,
अपने ही भीतर बैठे रावण के खिलाफ, एक विद्रोह है।
तुम झुकते तो बहुत हो, पर तुम्हारी अकड़ नहीं जाती,
तुम्हारी प्रार्थनाओं में भी, बस अपनी मुराद है आती।
सच्चा भक्त वो नहीं, जो बस 'राधे-राधे' गाता है,
सच्चा भक्त वो है, जो सत्य की खातिर, सब कुछ छोड़ पाता है।
अगर तुम पशु का मांस खाते हो, और कृष्ण को पूजते हो,
तो तुम भक्त नहीं, तुम बस ढोंग की गलियों में घूमते हो।
भक्ति का अर्थ है—सत्य से 'इश्क' और असत्य से 'बैर',
चाहे इसके बदले में, गँवाना पड़े तुम्हें अपना शहर।
ये डरपोक का काम नहीं, ये तो शूरवीरों की राह है,
जहाँ अपनी ही गर्दन कटाने की, एक अजब सी चाह है।
जिसे तुम 'भगवान' कहते हो, वो कोई आसमान में नहीं बैठा,
वो तो तुम्हारी ही चेतना का शुद्ध रूप है, जो अब तक नहीं प्रकटा।
उस शुद्धता की ओर बढ़ना ही, असली इबादत है,
और अपनी वृत्तियों से लड़ना ही, असली शहादत है।
भक्ति का मतलब है—अपनी मर्ज़ी को, सत्य की मर्ज़ी बना देना,
अपने क्षुद्र स्वार्थ को, विराट के चरणों में मिटा देना।
जब 'मैं' नहीं बचता, तभी 'वह' प्रकट होता है,
वही क्षण असली भक्ति का, और असली मुक्ति का होता है।
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9.थाली में मौत, या धर्म का ढोंग?
जिसे तुम 'भोजन' कहते हो, वो किसी की चीख का हिस्सा है,
तुम्हारी क्षण भर की जिह्वा का स्वाद, किसी की मौत का किस्सा है।
तुम मंदिर में सर झुकाते हो, और बाहर लहू बहाते हो,
क्या पत्थर के उस ईश्वर को, तुम इतना मूर्ख पाते हो?
सफ़ेद लिबास पहन कर तुम, 'अहिंसा' की बात करते हो,
पर उसी बेजुबान के मांस से, तुम अपना पेट भरते हो।
वो बच्चा था अपनी माँ का, जिसे तुमने 'प्रोटीन' कहा,
क्या उसके प्राणों का मूल्य, बस तेरे स्वाद तक ही रहा?
तुम कहते हो ये 'परंपरा' है, ये तो 'शास्त्रों' में लिखा है,
पर क्या तुमने अपनी करुणा को, बाज़ारों में बेचा है?
शास्त्र तो 'आत्म-बोध' के थे, तूने उन्हें स्वाद का जरिया बनाया,
पशु को काटकर तूने, अपनी ही रूह को मुर्दा पाया।
वो गाय, वो बकरी, वो मुर्गा—क्या तुम्हें 'वस्तु' दिखते हैं?
या अपनी भूख मिटाने के, सस्ते सामान दिखते हैं?
आचार्य कहते हैं—करुणा बिना, हर ज्ञान अधूरा है,
जो निर्दोष का गला काटे, वो अधर्मी पूरा है।
जब तक तुम्हारी थाली में, किसी की लाश सजेगी,
तब तक इस धरती पर, शांति की घंटी कभी न बजेगी।
तुम जो बो रहे हो आज, वही कल तुम काटोगे,
इस लहू सने अनाज को, तुम कैसे अपनों में बाँटोगे
जागो! कि इंसान होना, बस एक जैविक पहचान नहीं,
जो दूसरे का दर्द न समझे, वो पत्थर है, इंसान नहीं।
त्याग दो ये मांसाहार, यही असली प्रायश्चित है,
वरना इस घोर हिंसा में, तेरा पतन ही निश्चित है।
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मेरी कविताएँ आचार्य प्रशांत के विचारों से प्रेरित हैं।
ये थोड़ी कड़वी ज़रूर हैं,
पर इनमें छुपा सच ही इनकी असली पहचान है।
अगर ये शब्द आपको छू जाएँ,
तो आगे की इस यात्रा के लिए मुझे follow करना न भूलें।