28.सच्चा बेटा कौन?
बेटा वह नहीं जो बस 'वंश' चलाए,
या बुढ़ापे की लाठी बनने का लालच दिखाए,
सच्चा बेटा तो वह है, जो मोह के जालों को काटे,
और परिवार में 'परंपरा' नहीं, 'बोध' को बांटे।
सिर्फ सेवा करना ही धर्म नहीं है तुम्हारा,
अंधभक्ति में डूबा रहना कर्म नहीं है तुम्हारा,
यदि पिता गलत हैं, तो उन्हें टोकना ही प्रेम है,
सत्य के साथ खड़े होना, सबसे बड़ा 'क्लेम' है।
मत बनो ऐसा बेटा जो बस आज्ञाकारी है,
क्योंकि अक्सर आज्ञाकारिता ही सबसे बड़ी बीमारी है।
जिसमें खुद का विवेक नहीं, वो क्या साथ निभाएगा?
जो खुद ही सोया है, वो औरों को क्या जगाएगा?
आदर्श बेटा वह, जो खुद को पहले पहचान ले,
जीवन की व्यर्थता और सत्य को जो जान ले।
जो धन कमाने की मशीन मात्र न बन जाए,
बल्कि अपने साथ पूरे कुल की चेतना बढ़ाए।
कुल का दीपक वह नहीं जो दीवाली पर जलता है,
बेटा वह है जिसके होने से अज्ञान पिघलता है।
न वह गुलाम है, न वह स्वामी होने का दंभ पाले,
वह तो बस एक मुसाफिर है, जो सत्य की मशाल संभाले।
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29.पति: एक सहयात्री
पति वह नहीं जो बस घर चलाता हो,
या अपनी मर्दानगी का रोब जमाता हो,
सच्चा पति तो वह है जो 'सखा' बन जाए,
और पत्नी को उसके अपने सत्य से मिलाए।
मत बनो उसके रक्षक, कि वह कमज़ोर पड़ जाए,
ऐसी छाया मत बनो, कि उसका व्यक्तित्व ही मर जाए।
उसे आज़ादी दो—देह की नहीं, बल्कि विचार की,
यही कसौटी है तुम्हारे सबसे गहरे प्यार की।
प्यार का मतलब केवल साथ जीना-मरना नहीं,
एक-दूसरे के विकारों को ढोते रहना नहीं।
यदि वह गलत है, तो उसे आईना दिखाना,
और तुम गलत हो, तो अपनी हार मान जाना।
वह कोई 'वस्तु' नहीं जो तुम्हारे घर आई है,
वह भी एक चेतना है, जो सत्य की परछाई है।
उसे चूल्हे-चौखट तक सीमित मत रहने देना,
उसके पंखों को भी आसमान में बहने देना।
रिश्ता वही सुंदर, जहाँ 'अहं' का टकराव न हो,
जहाँ एक-दूसरे पर श्रेष्ठता का भाव न हो।
साथ मिलकर जो 'बोध' की ओर बढ़ते हैं,
वही सच्चे साथी, असल में जीवन गढ़ते हैं।
मत माँगना उससे 'समर्पण' अपनी सेवा के लिए,
समर्पण तो बस सत्य को हो, रूह की मेवा के लिए।
वही पति श्रेष्ठ है, जो स्वयं भी जागृत हो,
और जिसके साथ से साथी का जीवन भी सार्थक हो।
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30 . पिता: एक प्रकाश स्तंभ
पिता वह नहीं जो बस सुविधाओं का ढेर लगा दे,
अपनी ही इच्छाओं का बोझ बच्चे के सिर सजा दे।
सच्चा पिता तो वह है, जो मोह की बेड़ियाँ काटे,
और अपनी संतान को दुनिया नहीं, 'विवेक' बांटे।
मत बनाओ उसे अपनी बुढ़ापे की लाठी तुम,
उसे खुद की जमीन और अपनी ही माटी दो।
सुरक्षा के नाम पर उसे डरपोक मत बनाना,
असली सुरक्षा है—उसे जीवन का सत्य सिखाना।
अगर वह गिरे, तो उसे उठाने नहीं, उठना सिखाना,
अपनी ही परछाईं में उसे कभी मत दुबकाना।
अनुशासन का अर्थ डंडा चलाना नहीं होता,
पिता वह है जो अज्ञान के अंधेरे को धोता।
वह 'कलेक्टर' या 'इंजीनियर' बने, ये ज़िद क्यों है?
वह एक 'जागृत मनुष्य' बने, क्या ये कम है?
पिता का धर्म है बच्चे को 'मुक्त' कर देना,
उसके मन में खुद के प्रति भी आसक्ति न रहने देना।
मर्यादा पुरुषोत्तम वही, जो खुद भी जागृत हो,
जिसके आचरण से सत्य का मार्ग मार्गदर्शक हो।
पिता वह शीतल छांव है, जो पंख नहीं काटता,
बल्कि आसमान की अनंतता का साहस है बांटता।
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मेरी कविताएँ ताली पाने के लिए नहीं, नींद तोड़ने के लिए लिखी जाती हैं। वे Acharya Prashant की तरह कड़वा सच कहती हैं—जो चुभता है, मगर इंसान को जगाता भी है।