gazal kavita sher by Kota Rajdeep in Hindi Poems PDF

ग़ज़ल, कविता, शेर

by Kota Rajdeep in Hindi Poems

प्रेम-जल बरशा बादल से,दरख़्त की हर पत्तियां सुनहरी हों चली हैं।अंगड़ाई लिए नई कोंपलेंउठती हैं, जमीं कितनी ताज़ा हो चली हैं।___Rajdeep Kotaएक रोज़ शादाब शामों से दूर जाना होगा।ज़िन्दगी का फ़िर कहां ठौर-ठिकाना होगा।रात की बर्फ़पोश टेहनी पर पिछले ...Read More